केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया है। इसमें केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ व्यवस्था लागू करने की मांग का विरोध किया है। सरकार ने कहा कि एससी-एसटी समुदायों ने वर्षों तक सामाजिक भेदभाव और अन्याय झेला है। उनकी स्थिति की तुलना केवल आर्थिक पिछड़ेपन से नहीं की जा सकती। सरकार ने यह भी कहा कि आरक्षण के नियम बदलने का अधिकार सिर्फ संसद के पास है, अदालत के पास नहीं।
याचिका क्यों दायर हुई है
केंद्र सरकार, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर अपना जवाब दे रही थी। याचिका में कहा गया है कि एससी और एसटी वर्गों के भीतर आर्थिक रूप से संपन्न परिवार आरक्षण का ज्यादातर लाभ ले रहे हैं। इससे आरक्षण का लाभ इन्हीं परिवारों तक सीमित हो रहा है और सबसे अधिक वंचित लोगों को शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।
याचिका में एससी, एसटी, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) समेत सभी आरक्षित श्रेणियों में आय आधारित प्राथमिकता (Income-based preference) लागू करने की मांग की गई है।
याचिका में अगस्त 2024 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी हवाला दिया गया है जिसमें एससी और एसटी के भीतर उप-वर्गीकरण (Sub-classification) की अनुमति दी गई थी। उस संविधान पीठ के सात में से चार जजों ने अपने फैसले में एससी और एसटी पर भी क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू करने का सुझाव दिया था।
इन्हीं टिप्पणियों का हवाला देते हुए याचिका में सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके लोगों को आरक्षण के लाभ से बाहर करने की मांग की गई है। उपाध्याय का कहना है कि जो लोग पहले ही सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें आरक्षण देना सकारात्मक भेदभाव (Affirmative Action) के उद्देश्य के विपरीत है।
भेदभाव बनाम आर्थिक स्थिति
अपने जवाबी हलफनामे में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि एससी और एसटी की पहचान के आधार और ओबीसी की पहचान के आधार अलग-अलग हैं। सरकार ने कहा कि एससी समुदाय छुआछूत (Untouchability) जैसी ऐतिहासिक सामाजिक बुराइयों के कारण लंबे समय तक वंचित रहा है। वहीं एसटी समुदाय की पहचान उनकी खास संस्कृति, भौगोलिक अलगाव और पिछड़ेपन के आधार पर की जाती है।
इसके उलट ओबीसी की पहचान मुख्य रूप से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर की जाती है। सरकार ने कहा कि एससी और एसटी को आरक्षण देने का मुख्य उद्देश्य सामाजिक समानता और न्याय स्थापित करना, ऐतिहासिक भेदभाव को समाप्त करना तथा सार्वजनिक जीवन में उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित करना है।
हलफनामे में कहा गया है कि समानता की इस व्यापक अवधारणा को ध्यान में रखते हुए यह समझना जरूरी है कि इन समुदायों के खिलाफ भेदभाव आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं होता।
कानूनी मिसालें
केंद्र सरकार ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया है। सरकार ने 1992 के इंद्रा साहनी (मंडल आयोग) मामले का जिक्र करते हुए कहा कि उस फैसले में क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू किया गया था लेकिन अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यह सिद्धांत केवल ओबीसी पर लागू होगा और इसका एससी तथा एसटी से कोई संबंध नहीं है।
सरकार ने 2008 के अशोक कुमार ठाकुर मामले का भी हवाला दिया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत एससी और एसटी पर लागू नहीं होता। इसके अलावा सरकार ने 2005 के ई.वी. चिनैया मामले का भी जिक्र किया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि भविष्य में कभी एससी वर्ग से क्रीमी लेयर को बाहर करने की जरूरत महसूस होती है तो इसके लिए केवल संसद ही कानून बना सकती है।
सरकार ने दिया क्या हवाला
केंद्र सरकार ने अपने बचाव में संविधान में शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का भी हवाला दिया। केंद्र सरकार ने कहा कि संविधान के मुताबिक सरकार, संसद और अदालत के अधिकार अलग-अलग तय हैं। इसलिए आरक्षण नीति में बदलाव का फैसला अदालत नहीं बल्कि संसद ही कर सकती है।”
हलफनामे में कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत राष्ट्रपति एससी और एसटी की प्रारंभिक सूची अधिसूचित करते हैं। एक बार सूची अधिसूचित होने के बाद उसमें किसी भी तरह का समावेश या बहिष्कार केवल संसद के कानून के जरिए ही किया जा सकता है।
सरकार ने कहा कि राज्य सरकारों, अदालतों, न्यायाधिकरणों या किसी अन्य प्राधिकरण को इन सूचियों में संशोधन या बदलाव करने का अधिकार नहीं है।
केंद्र ने कहा कि याचिका में रिट ऑफ मैंडमस (Writ of Mandamus) जारी करने की मांग की गई है यानी अदालत सरकार को किसी विशेष तरीके से कार्य करने का आदेश दे। लेकिन सरकार का कहना है कि आरक्षण नीति बनाना या उसमें आय आधारित व्यवस्था लागू करना एक व्यापक नीति का विषय है जिसके लिए तथ्यों, आंकड़ों और विधायी प्रक्रिया की आवश्यकता होती है।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अदालतें केवल इस आधार पर कार्यपालिका को कोई विशेष नीति अपनाने का निर्देश नहीं दे सकतीं कि कोई दूसरा विकल्प अधिक बेहतर, न्यायसंगत या समझदारी भरा है।
हलफनामे में कहा गया है कि न्यायपालिका सार्वजनिक नीति तय करने के मामले में विधायिका की भूमिका नहीं निभा सकती। केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई योग्य नहीं है क्योंकि इसमें किसी भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन को नहीं दिखाया गया है।
सरकार ने याचिका को ‘गलत धारणा पर आधारित (Misconceived) और गुण-दोष से रहित (Devoid of Merit)’ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से इसे खारिज करने की मांग की है।
एससी-एसटी एक्ट के तहत केवल हिन्दू, सिख और बौद्ध दर्ज करा सकते हैं मुकदमा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें हिन्दू से ईसाई बनने वाली व्यक्ति द्वारा एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया गया था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि एससी का दर्जा केवल हिन्दू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए है। इनके अलावा किसी अन्य धर्म में कनवर्ट होने वालों का एससी का दर्जा खत्म हो जाता है।
