31 अगस्त को पहली तिमाही की GDP वृद्धि के आंकड़े जारी होने के बाद पूर्व अधिकारी सुभाष चंद्र गर्ग इसपर चल रही बहस के केंद्र में आ गए हैं। अप्रैल से जून की अवधि में देश की GDP वृद्धि 7.8 फीसदी रही। इसे उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन माना गया। खास बात यह है कि यह आंकड़ा ऐसे समय आया है, जब दुनिया ईरान युद्ध के असर से जूझ रही थे।
हालांकि, गर्ग ने दावा किया है कि इस दौरान महंगाई के असर को मिलाकर नॉमिनल जीडीपी वृद्धि केवल 2.6% होनी चाहिए थी और ‘वास्तविक संदर्भ में शून्य के करीब’ थी। गर्ग की इस आलोचना का इंटरनेट पर जमकर प्रसार हुआ और कई विपक्षी नेताओं, राजनीतिक दलों तथा अर्थशास्त्रियों ने इसका समर्थन किया। इसके बाद सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने छह बिंदुओं का जवाब जारी कर स्पष्ट किया कि GDP गणना के तरीके और सोमवार को जारी आंकड़े पूरी तरह सही थे।
गर्ग वित्त सचिव रह चुके हैं। वित्त सचिव केंद्रीय वित्त मंत्रालय के छह सचिवों में सबसे वरिष्ठ अधिकारी का पद होता है। हालांकि, GDP के आंकड़ों को लेकर उनकी मौजूदा टिप्पणी कोई पहला विवाद नहीं है। इससे पहले भी वे कई विवादों में रह चुके हैं।
समय से पहले लिया था रिटायरमेंट
राजस्थान कैडर के 1983 बैच के आईएएस अधिकारी गर्ग 2014 में केंद्र सरकार में आए और उन्हें विश्व बैंक में कार्यकारी निदेशक बनाया गया। वह जून 2017 में वित्त मंत्रालय के तहत आर्थिक मामलों के विभाग (DEA) में सचिव बनने तक इस पद पर रहे।
मार्च 2019 में उन्हें पदोन्नत करके वित्त सचिव बना दिया गया। जुलाई 2019 में ऊर्जा मंत्रालय में तबादला होने के ठीक एक दिन बाद, गर्ग ने अक्टूबर 2020 में होने वाली अपनी तय सेवानिवृत्ति से एक साल से भी पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के लिए आवेदन कर दिया।
RBI के साथ टकराव
गर्ग ने रिजर्व बैंक के आर्थिक पूंजी ढांचे (Economic Capital Framework) की समीक्षा कराने में अहम भूमिका निभाई थी। इसका उद्देश्य RBI के रिजर्व में मौजूद कुछ रकम को सरकार के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराना था। इस मुद्दे पर वित्त मंत्रालय और RBI के बीच गंभीर मतभेद देखने को मिले थे।
2018 के मध्य में गर्ग के नेतृत्व वाले आर्थिक मामलों के विभाग ने RBI के आर्थिक पूंजी ढांचे को लेकर केंद्रीय बैंक के साथ आंतरिक बातचीत शुरू की थी। विभाग ने अनुमान लगाया कि RBI के पास करीब 3.6 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी है, जिसे केंद्र सरकार को दिया जा सकता है।
इसके बाद यह मुद्दा बड़ा विवाद बन गया। अक्टूबर 2018 में RBI के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने सरकार को चेतावनी दी कि केंद्रीय बैंक के रिजर्व का इस्तेमाल करने की कोशिश के गंभीर नुकसान हो सकते हैं। उनका तर्क था कि अगर सरकार केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती है, तो आगे चलकर उसे वित्तीय बाजारों के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है।
गर्ग ने आचार्य की टिप्पणी का जवाब उस समय ट्विटर (X) पर दिया। उन्होंने बाजार के आंकड़ों का हवाला देते हुए सवाल किया कि जब रुपया 73 रुपये प्रति डॉलर से मजबूत स्तर पर कारोबार कर रहा है, कच्चे तेल की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल से नीचे है, बाजार एक सप्ताह में 4 फीसदी से ज्यादा ऊपर है और बॉन्ड यील्ड 7.8 फीसदी से नीचे है, तो ‘बाजारों का गुस्सा कहां है?’
यह मतभेद आगे भी जारी रहा। तत्कालीन RBI गवर्नर उर्जित पटेल भी कई मांगों पर सहमत होते नहीं दिखे। इनमें RBI के पूंजी भंडार पर चर्चा, कुछ सरकारी बैंकों को Prompt Corrective Action (PCA) ढांचे से बाहर निकालना और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के लिए ‘विशेष लिक्विडिटी विंडो’ उपलब्ध कराना शामिल था।
इसके बाद वित्त मंत्रालय ने 1934 के RBI Act की धारा 7 का इस्तेमाल किया। इस प्रावधान के तहत सरकार RBI को कुछ मामलों में निर्देश दे सकती है। आजादी के बाद यह पहली बार था जब इस धारा का इस्तेमाल किया गया। इसके जरिए RBI को सरकार के साथ बातचीत शुरू करने के लिए कहा गया।
बाद में उर्जित पटेल ने स्वास्थ्य कारणों से RBI गवर्नर के पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह शक्तिकांत दास को RBI गवर्नर बनाया गया। इसके बाद सरकार और RBI के बीच संबंधों में कुछ सुधार आया।
आर्थिक मामलों के सचिव रहते हुए गर्ग का काम करने का तरीका अक्सर नियामकों और संस्थाओं के साथ टकराव की स्थिति पैदा करता था। सरकार के भीतर भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनके मतभेद रहे। इनमें राजकोषीय लक्ष्य और आर्थिक विकास के बीच संतुलन का मुद्दा भी शामिल था।
गर्ग उस समय भी वित्त सचिव थे, जब 2019-20 के केंद्रीय बजट में विदेशों में विदेशी मुद्रा में सरकारी बॉन्ड यानी सॉवरेन बॉन्ड जारी करने का प्रस्ताव रखा गया था। सरकार के कुछ हिस्सों ने इसका विरोध किया। अंत में सरकार इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ा सकी।
वित्त मंत्री से मतभेद और किताबों में खुलासे
नवंबर 2020 में गर्ग ने अपने एक ब्लॉग में लिखा कि उन्होंने सरकारी सेवा से समय से पहले रिटायर होने का फैसला इसलिए किया क्योंकि आम चुनाव के बाद सरकार का तेज आर्थिक विकास और सुधारों का एजेंडा कमजोर पड़ता दिख रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ उनके ‘कामकाजी संबंध अच्छे’ नहीं थे। गर्ग ने कहा कि सीतारमण के साथ कई महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दों पर उनके गंभीर मतभेद थे। उनके मुताबिक, जून 2019 में वित्त मंत्री बनने के एक महीने के भीतर ही सीतारमण ने वित्त मंत्रालय से उनका तबादला कराने पर जोर दिया था।
बाद में, 2023 में गर्ग ने अपनी किताब ‘वी ऑल्सो मेक पॉलिसी: एन इनसाइडर्स अकाउंट ऑफ हाउ द फाइनेंस मिनिस्ट्री फंक्शंस’ जारी की, जिसके बाद 2025 में उनकी अगली किताब ‘नो, मिनिस्टर: नेविगेटिंग पावर, पॉलिटिक्स एंड ब्यूरोक्रेसी विद अ स्टीली रिज़ॉल्व’ आई।
अपनी 2023 की किताब में गर्ग ने लिखा कि 14 सितंबर 2018 को अर्थव्यवस्था की स्थिति की समीक्षा के लिए एक बैठक हुई थी। उस समय आर्थिक हालात मुश्किल थे और सरकार तथा RBI के बीच भी काफी तनाव था। गर्ग के मुताबिक, इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तत्कालीन RBI गवर्नर उर्जित पटेल से नाराज हो गए थे और उनकी तुलना पैसे के भंडार पर बैठे सांप से की थी।
गर्ग ने तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) अरविंद सुब्रमण्यम के शोध को लेकर सरकार की चिंताओं का भी जिक्र किया था। गर्ग ने लिखा कि सरकार चाहती थी कि CEA की रिपोर्ट में अर्थव्यवस्था की तस्वीर ज्यादा सकारात्मक दिखाई जाए।
2017 की आर्थिक समीक्षा का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा कि आखिरकार वह अरविंद सुब्रमण्यम को FRBM से जुड़े असहमति नोट को हटाने और GDP का अनुमान बेहतर करने के लिए राजी करने में सफल रहे।
गर्ग ने लिखा कि अरविंद सुब्रमण्यम इस बात से लगातार परेशान हो रहे थे। एक समय उन्होंने कहा था कि अगर आर्थिक समीक्षा में इस तरह बदलाव किए गए तो वह सरकार में बने रहने के बजाय इस्तीफा देना पसंद करेंगे।
गर्ग ने अपनी सबसे तीखी आलोचना निर्मला सीतारमण को लेकर की। उनकी 2023 की किताब की शुरुआत उनके पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली को समर्पित एक सकारात्मक संदेश से होती है। लेकिन किताब के अंत में उन्होंने अपनी समय से पहले सेवानिवृत्ति के लिए सीतारमण को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने लिखा कि ‘निर्मला सीतारमण इस किताब के बनने की मुख्य वजह हैं।’ उनके मुताबिक, वित्त मंत्रालय में सीतारमण के साथ उनके मतभेदों के कारण ऐसी परिस्थितियां बनीं, जिनमें उन्हें अक्टूबर 2019 में IAS से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का फैसला करना पड़ा।
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भारतीय अर्थव्यवस्था ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल-जून 2026 की अवधि में देश की जीडीपी वृद्धि दर 7.8% रही। ये आंकड़ें पिछले साल की इसी तिमाही के 6.9% के मुकाबले 0.8% ज्यादा है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।
