राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण विधेयक, 2026 को दोबारा विचार के लिए लौटा दिया है। इस विधेय को आम तौर पर ‘एंटी-गुंडा बिल’ कहा जा रहा है। केंद्र सरकार ने इस विधेयक को लेकर आपत्ति जताई थी कि इसके कुछ प्रावधान पहले से मौजूद केंद्रीय कानून से मेल खाते हैं।

एंटी-गुंडा बिल पश्चिम बंगाल की नई भाजपा सरकार की ओर से विधानसभा में पेश किए गए शुरुआती विधेयकों में से एक था। विधानसभा ने इसे 29 जून को पारित किया था। यह बिल ‘गुंडों’ और ‘असामाजिक गतिविधियों’ पर रोक लगाने के लिए एहतियाती हिरासत का प्रावधान करता है।

केंद्र सरकार ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि इसके कुछ प्रावधान स्वापक ओषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार सुरक्षा/निवारण अधिनियम (PITNDPS), 1988 में मौजूद प्रावधानों से मेल खाते हैं। इससे नशीली दवाओं से जुड़ी गतिविधियों के मामलों में एहतियाती हिरासत की दो समान व्यवस्थाएं बन सकती हैं।

लेकिन सवाल यह है कि राज्य का यह विधेयक राष्ट्रपति के पास गया ही क्यों? यह बिल विवादों में क्यों है? और अब राष्ट्रपति द्वारा इसे लौटाए जाने के बाद आगे क्या होगा?

बंगाल का एंटी-गुंडा बिल क्या है?

पश्चिम बंगाल में 1970 के दशक से ही एहतियाती हिरासत से जुड़ा एक कानून मौजूद है। लेकिन मौजूदा विधेयक का दायरा उससे कहीं ज्यादा व्यापक है।

इस विधेयक के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए अधिकतम 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। इसके अलावा, किसी व्यक्ति को ‘असामाजिक’ गतिविधियों से रोकने के लिए उसे अधिकतम 12 महीने तक किसी खास ‘इलाके, जिले या जिलों’ में जाने से भी रोका जा सकता है।

विधेयक में ‘गुंडा’ और ‘असामाजिक गतिविधि’ की व्यापक परिभाषा दी गई है। इसमें गुंडा ऐसे व्यक्ति को माना गया है, जिसकी आम तौर पर समुदाय के लिए ‘बेहद खतरनाक’ माना गया है, वह किसी भी हद तक जा सकता है या फिर ‘आदतन अपराधी’ हो।

‘असामाजिक गतिविधि’ में ऐसे काम शामिल हैं, जिनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लोगों में ‘डर या असुरक्षा’ का भाव पैदा होता हो। जिससे जान या संपत्ति को खतरा हो, लोक व्यवस्था में बाधा उत्पन्न होता हो। किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से गैरकानूनी तरीके से बेदखल करना भी इस दायरे में आता है। अवैध खनन, पत्थर खनन, बालू खनन या अवैध तरीके से की जाने वाली कोई भी गतिविधि जिससे सरकारी खजाने को नुकसान होता है ये सब असामाजिक गतिविधियाँ हैं।

विधेयक में तलाशी और जब्ती की भी अनुमति दी गई है। इसके अलावा, हिरासत में लिए गए या किसी इलाके से बाहर किए गए व्यक्ति को शरण देने पर सजा का प्रावधान है। अधिकारियों को सद्भावना से किए गए कामों के लिए कानूनी सुरक्षा दी गई है। इन अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाया गया है।

कई राज्यों में गुंडा कानून मौजूद हैं। इनमें गुजरात का प्रिवेंशन ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज एक्ट, 1985 प्रमुख है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) में भी संगठित अपराध से निपटने के प्रावधान हैं।

संविधान का अनुच्छेद 22 कुछ सुरक्षा उपायों के साथ एहतियाती हिरासत की अनुमति देता है। ऐसे कानून ‘लोक व्यवस्था’ से जुड़े मामलों में बनाए जा सकते हैं और ‘लोक व्यवस्था’ राज्य का विषय है।

विधेयक को लेकर विवाद क्यों है?

विधेयक पेश किए जाने के बाद से ही इसके प्रावधानों को लेकर कई विवाद सामने आए। इसके व्यापक प्रावधानों को चुनौती देते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय में तीन जनहित याचिकाएं दायर की गईं। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि इस कानून का इस्तेमाल राजनीतिक बदले की भावना से किया जा सकता है।

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधीकारी ने खुद दावा किया था कि ‘गुंडा दमन बिल’ को राज्यपाल की मंजूरी मिल चुकी है और यह कानून बन गया है। उन्होंने विधानसभा में यह भी कहा था कि 24 जुलाई को कोलकाता के एस्प्लेनेड में हुए प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने के आरोपियों के खिलाफ इस ‘कानून’ का इस्तेमाल किया गया है।

लेकिन अब राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय को बताया है कि यह विधेयक अभी राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार कर रहा है और इसलिए अभी कानून नहीं बना है। इसका मतलब है कि मुख्यमंत्री का दावा सही नहीं था।

इसके बाद उच्च न्यायालय ने ऊपर बताई गई तीनों जनहित याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि ये याचिकाएं समय से पहले दायर की गई थीं, क्योंकि विधेयक को अभी राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली थी और इसलिए यह कानून नहीं बना था।

क्या किसी राज्य के विधेयक का राष्ट्रपति के पास जाना असामान्य है?

नहीं। आम तौर पर किसी राज्य विधानसभा से पारित होने वाले विधेयक को कानून बनने के लिए राज्यपाल की मंजूरी की जरूरत होती है। लेकिन संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि वह किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए भेज सकता है।

अनुच्छेद 200 के अनुसार, जब किसी राज्य विधानसभा से कोई बिल पारित होता है, तो उसे राज्यपाल के पास भेजा जाता है। राज्यपाल या तो उसे मंजूरी दे सकते हैं, मंजूरी रोक सकते हैं या राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकते हैं।

आमतौर पर यह फैसला राज्यपाल के विवेक पर निर्भर करता है। लेकिन एक ऐसी स्थिति भी है, जिसमें राज्यपाल के लिए विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजना जरूरी होता है।

अनुच्छेद 200 में कहा गया है कि अगर राज्यपाल को लगता है कि कोई विधेयक कानून बनने के बाद उच्च न्यायालय की शक्तियों को इस हद तक कम कर देगा कि उसकी संवैधानिक भूमिका ही खतरे में पड़ जाएगी, तो राज्यपाल उस विधेयक को मंजूरी नहीं दे सकते। उन्हें उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजना होगा।

सरल शब्दों में, अगर किसी राज्य का विधेयक उच्च न्यायालय की शक्तियों को इतना कम करता है कि उसकी संवैधानिक भूमिका प्रभावित होने का खतरा हो, तो राज्यपाल को वह विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजना जरूरी है।

राज्यपाल किसी विधेयक को वापस विधानसभा के पास भी भेज सकते हैं, बशर्ते वह धन विधेयक न हो। अगर विधानसभा उस विधेयक को दोबारा पारित कर देती है, चाहे उसमें कोई बदलाव किया गया हो या नहीं, तो राज्यपाल को उसे मंजूरी देनी पड़ती है।

विधेयक वापस क्यों किया गया?

यह साफ नहीं है कि यह विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा ही क्यों गया था। लेकिन विधेयक लौटाए जाने से पहले केंद्र सरकार ने अपनी टिप्पणी में इसके कुछ प्रावधानों और केंद्रीय कानून के बीच समानता की ओर इशारा किया था।

केंद्र सरकार ने कहा कि बिल में ‘गुंडा’ की परिभाषा के तहत ऐसे व्यक्ति को भी शामिल किया गया है, जो NDPS Act, 1985 के तहत किसी अपराध को करता है, करने की कोशिश करता है, किसी को उकसाता है, उसे बढ़ावा देता है, उसके लिए पैसा मुहैया कराता है या उसकी मदद करता है।

केंद्र के मुताबिक, यह प्रावधान PITNDPS Act, 1988 में मौजूद एहतियाती हिरासत की व्यवस्था से टकरा सकता है। PITNDPS अधिनियम नशीली दवाओं की अवैध तस्करी में शामिल लोगों की एहतियाती हिरासत से जुड़ा केंद्रीय कानून है।

केंद्र ने कहा कि प्रस्तावित प्रावधान नशीली दवाओं/ड्रग्स से जुड़ी गतिविधियों के मामलों में एहतियाती हिरासत की एक समानांतर व्यवस्था बना सकता है। इससे संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत कानूनों के टकराव का सवाल उठ सकता है।

इसी वजह से केंद्र ने सुझाव दिया कि विधेयक की संबंधित धारा से NDPS अधिनियम, 1985 के तहत आने वाले अपराधों का संदर्भ हटा दिया जाए, ताकि मौजूदा केंद्रीय कानून के साथ दोहराव और टकराव से बचा जा सके।

राष्ट्रपति द्वारा विधेयक लौटाए जाने के बाद अब क्या होगा?

जब किसी राज्यपाल की ओर से कोई विधेयक राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजा जाता है, तो राष्ट्रपति या तो उसे मंजूरी दे सकते हैं या मंजूरी रोक सकते हैं। पश्चिम बंगाल के इस विधेयक के मामले में राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी देने के बजाय वापस भेज दिया है।

राज्य प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि यह सरकार के लिए झटका है। हालांकि, अधिकारी ने कहा कि विधेयक में जिन प्रावधानों का केंद्रीय कानून से टकराव या दोहराव है, उनमें जरूरी बदलाव करके इसे दोबारा विधानसभा में पेश करने का प्रावधान है।

अनुच्छेद 201 के मुताबिक, राज्य विधानसभा को राष्ट्रपति का संदेश मिलने के बाद विधेयक पर दोबारा विचार करने के लिए छह महीने का समय मिलता है।

अगर विधानसभा उस विधेयक को दोबारा पारित कर देती है, चाहे उसमें बदलाव किया गया हो या नहीं, तो उसे फिर से राष्ट्रपति के विचार और मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

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