गुजरात सरकार ने खेती की जमीन संबंधी 70 साल पुराने कानून को बदलते हुए पूरे राज्य में जमीन की न्यूनतम इकाई को एक समान कर दिया है। इससे पहले राज्य में खेती की जमीन को अलग सर्वे नंबर पाने यानी किसी जमीन का अलग मालिकाना हक पाने के लिए उसका कम से 0.50 एकड़ का होना आवश्यक था, लेकिन अब 0.25 एकड़ के लिए भी अलग सर्वे संख्या मिल सकती है।
सरकार के मुताबिक, करीब 70 साल पुराने कानून में किए गए ये बदलाव मौजूदा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और जमीन के बदलते इस्तेमाल को ध्यान में रखते हुए किए गए हैं। इसका उद्देश्य ‘कृषि हितों और राज्य की विकास संबंधी जरूरतों के बीच संतुलन’ बनाना है।
गौरतलब है कि किसी जमीन के रिकॉर्ड के लिए उसे एक निश्चित क्षेत्रफल और पहचान संख्या दी जाती है, जिसे ‘सर्वे नंबर’ कहा जाता है। अब पूरे गुजरात में एक सर्वे नंबर के लिए 10 गुंठा या 1,012 वर्ग मीटर जमीन का मानक तय किया गया है।
पहले राज्य के अलग-अलग हिस्सों में यह मानक अलग था। कहीं यह 20 गुंठा यानी 2,000 वर्ग मीटर से कुछ ज्यादा था, तो कहीं यह 3 एकड़ (12,140 वर्ग मीटर) तक था।
एक गुंठा जमीन की पारंपरिक माप है, जो करीब 101 वर्ग मीटर के बराबर होता है। नए नियम के तहत 10 गुंठा करीब एक चौथाई एकड़ (0.25 एकड़) के बराबर है। खेती की जमीन को इससे छोटे हिस्से में बांटकर अलग जमीन के रूप में दर्ज नहीं किया जा सकेगा।
सरकार ने जुलाई में गुजरात प्रिवेंशन ऑफ फ्रैगमेंटेशन एंड कंसोलिडेशन ऑफ होल्डिंग्स एक्ट, 1947 में बदलाव के लिए अध्यादेश जारी किया था। इसके बाद राजस्व विभाग ने 12 अगस्त को दो अधिसूचनाएं जारी कीं।
सरकार को उम्मीद है कि इस अध्यादेश की जगह स्थायी कानून लाने के लिए विधानसभा के तीन दिवसीय मानसून सत्र में विधेयक पेश किया जाएगा। विधानसभा का यह सत्र बुधवार से शुरू हो रहा है। यह कानून 14 जुलाई 2026 से लागू माना गया है।
गुजरात में खेती की जमीन के मालिकाना हक की क्या स्थिति है?
कृषि जमीन को छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटने से रोकने के लिए यह कानून उस समय बनाया गया था, जब गुजरात बॉम्बे प्रांत का हिस्सा था। इसका मकसद कृषि जमीन को छोटे हिस्सों में बंटने से रोकना और जरूरत पड़ने पर जमीन को एक साथ जोड़ना था, ताकि खेती बेहतर तरीके से हो सके और जमीन का सही प्रबंधन किया जा सके।
अगर कोई व्यक्ति इस कानून के नियमों का उल्लंघन करते हुए जमीन बेचता है या उसका बंटवारा करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
गुजरात में 2015-16 में हुई आखिरी कृषि जनगणना के मुताबिक, राज्य में करीब 99.7 लाख हेक्टेयर जमीन पर खेती होती थी और कुल 53.2 लाख जमीन मालिक थे।
इनमें बड़े जमीन मालिकों की संख्या केवल 0.75 फीसदी थी और उनके पास कुल कृषि जमीन का 5.91 फीसदी हिस्सा था।
सबसे ज्यादा जमीन मध्यम से कुछ छोटे स्तर के किसानों के पास थी। ऐसे किसान कुल जमीन मालिकों का करीब 21 फीसदी थे और उनके पास कुल कृषि जमीन का 31.7 फीसदी हिस्सा था। यह जानकारी राज्य के पिछले बजट के साथ जारी की गई सामाजिक-आर्थिक समीक्षा में दी गई है।
जमीन की न्यूनतम इकाई क्यों घटाई गई?
गुजरात में कृषि जमीन की न्यूनतम मानक इकाई पहले हर जगह एक जैसी नहीं थी। अलग-अलग इलाकों और जमीन के प्रकार के हिसाब से यह 20 गुंठा यानी आधा एकड़ से लेकर 3 एकड़ तक थी।
उदाहरण के लिए, ‘जिरायत’ यानी बारिश पर निर्भर जमीन और ‘बागायत’ यानी कुएं, नहर आदि से सिंचाई वाली जमीन के लिए अलग-अलग मानक थे।
सरकार के मुताबिक 1947 का कानून सात दशक से ज्यादा समय से लागू है। इस दौरान राज्य की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों, जमीन के इस्तेमाल और खेती के तरीकों में काफी बदलाव आया है। इसलिए कानून के कुछ प्रावधानों की समीक्षा करना जरूरी हो गया था, ताकि वे आज की जरूरतों के मुताबिक काम कर सकें।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कृषि जमीन को तय मानक से भी छोटे हिस्सों में बांट दिया जाए तो उसकी उत्पादकता और लंबे समय तक खेती करने की क्षमता कम हो सकती है।
गुजरात शायद देश का पहला या इकलौता ऐसा राज्य है जिसने सभी तरह की कृषि जमीन के लिए एक ही न्यूनतम मानक तय किया है। महाराष्ट्र में कानून में बदलाव कर बागायत जमीन के लिए 0.25 एकड़ और जिरायत जमीन के लिए 0.5 एकड़ का मानक तय किया गया है।
गुजरात में बढ़ता शहरीकरण
नया नियम केवल ग्रामीण इलाकों में लागू होगा। सरकार ने अधिसूचना जारी कर शहरी क्षेत्रों को इस नियम से बाहर रखा है। यानी शहरों में जमीन का नया सर्वे नंबर बनाने के लिए 10 गुंठा की न्यूनतम सीमा लागू नहीं होगी।
2011 की जनगणना के मुताबिक गुजरात की करीब 42 फीसदी आबादी शहरों में रहती थी। माना जा रहा है कि इसके बाद यह आंकड़ा और बढ़ा है।
सरकार ने नौ स्थानीय निकायों को अपग्रेड किया है। इसके बाद राज्य में नगर निगमों की संख्या बढ़कर 17 हो गई है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक राज्य का शहरी क्षेत्र अब 50 फीसदी से ज्यादा हो गया है।
गुजरात सरकार ने 2024-25 के बजट में 2047 तक राज्य की 75 फीसदी आबादी को शहरी क्षेत्रों में लाने का लक्ष्य रखा है।
सरकार का कहना है कि शहरों और नगर निकायों के विस्तार के साथ उनके आसपास की कई खेती की जमीनें भी शहरी क्षेत्रों का हिस्सा बन गई हैं। इन जमीनों का इस्तेमाल अब आवासीय, व्यावसायिक और औद्योगिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है, जिससे इनकी खरीद-बिक्री भी बढ़ी है। लेकिन पुराने कानून के कारण ऐसी जमीनों के लेन-देन को लेकर कई कानूनी अड़चनें बनी हुई थीं। इसके चलते जमीन के मालिक अपनी जमीन का गैर-कृषि इस्तेमाल शुरू करने के लिए जरूरी मंजूरी नहीं ले पा रहे थे।
सरकार का कहना है कि इस समस्या को दूर करने के लिए कानून में बदलाव जरूरी था, ताकि मौजूदा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और जमीन के बदलते इस्तेमाल के मुताबिक नियम बनाए जा सकें और कृषि हितों तथा विकास की जरूरतों के बीच संतुलन बनाया जा सके।
शहरीकरण के अलावा बढ़ती आबादी को भी कृषि जमीन के छोटे-छोटे हिस्सों में बंटने की एक बड़ी वजह माना जा रहा है।
खत्म होंगे पुराने कानूनी मामले
अध्यादेश में 29 जनवरी 1948 से 31 मार्च 2026 के बीच कानून का उल्लंघन करके किए गए जमीन के बंटवारे या हस्तांतरण को नियमित करने का प्रावधान किया गया है।
इस अवधि में कानून का उल्लंघन करके किए गए ऐसे जमीन सौदों पर जुर्माना लगाया जाता था और जिलाधिकारी के स्तर पर कार्रवाई होती थी।
अध्यादेश के जरिए कानून में जोड़ा गया नया प्रावधान कहता है कि 29 जनवरी 1948 से 31 मार्च 2026 के बीच कानून के नियमों के खिलाफ किया गया जमीन का कोई भी हस्तांतरण या बंटवारा बिना जुर्माना या अतिरिक्त शुल्क लिए नियमित माना जाएगा। साथ ही, ऐसे मामलों से जुड़ी किसी अधिकारी या प्राधिकरण के सामने चल रही सभी कार्यवाहियां खत्म हो जाएंगी।
इसका सीधा मतलब है कि इस अवधि में कानून के कथित उल्लंघन को लेकर राजस्व विभाग में चल रहे मामले खत्म हो जाएंगे और संबंधित जमीन के लेन-देन को नियमित कर दिया जाएगा। हालांकि इसके लिए यह जरूरी होगा कि जमीन का बंटवारा या हस्तांतरण अध्यादेश में तय न्यूनतम मानक के अनुरूप हो।
विरासत में जमीन बांटने की समस्या होगी आसान
राजस्व विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि राज्य की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव को देखते हुए कानून में तय जमीन की न्यूनतम इकाई को बदलना जरूरी हो गया था।
अधिकारी ने इसके पीछे एक व्यावहारिक उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि मान लीजिए किसी व्यक्ति के तीन बेटे हैं और उसके पास 30 गुंठा जमीन है। राज्य के कुछ हिस्सों में पुराने नियमों के कारण तीनों बेटों के नाम अलग-अलग सर्वे नंबर नहीं बनाए जा सकते थे। अब ऐसा किया जा सकेगा। अधिकारी के मुताबिक, नई तकनीक और सिंचाई की सुविधाओं के कारण छोटे खेतों में भी अच्छी पैदावार के साथ खेती करना संभव है।
अधिकारी ने कहा कि अलग-अलग सर्वे नंबर बनने से किसान के बेटे या बेटियों को उनके हिस्से की जमीन पर अलग मालिकाना हक मिल सकेगा। वे अपनी जमीन बेचने या उसके बदले बैंक से कर्ज लेने जैसे फैसले खुद कर सकेंगे। इसके लिए उन्हें दूसरे हिस्सेदारों की सहमति पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
एक अन्य अधिकारी ने बताया कि शहरी क्षेत्रों को इस कानून से बाहर रखने के पीछे कई कारण हैं। इनमें शहरों में खेती का कम व्यावहारिक रह जाना और विकास की दूसरी जरूरतों के कारण छोटे से छोटे जमीन के टुकड़ों की कीमत का काफी बढ़ जाना शामिल है।
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