केंद्र सरकार की नई ‘सेमीकॉन 2.0’ योजना देश में चिप डिजाइन करने वाली कंपनियों को निर्मित करने , जरूरी सेमीकंडक्टर तकनीक विकसित करने और बनी हुई चिप को बाजार तक पहुंचाने की तीन-स्तरीय योजना है।

आज लैपटॉप, फोन और एआई (AI) जैसी तकनीक बनाने के लिए सेमीकंडक्टर का डिजाइन और उत्पादन करना बहुत जरूरी है। यह योजना भारत के सेमीकंडक्टर मिशन की एक बहुत बड़ी कमी को पूरा करने के लिए लाई गई है।

भले ही भारत चिप-डिजाइन करने वाले इंजीनियरों का एक बड़ा वैश्विक केंद्र बन चुका है, लेकिन हमारे इंजीनियर ज्यादातर विदेशी कंपनियों के लिए काम करते हैं। आइए समझते हैं कि सेमीकॉन 2.0 का असली मकसद क्या है।

चिप डिजाइन के लिए सरकार क्या मदद दे रही है?

सेमीकॉन 2.0 का मुख्य मकसद भारत की अपनी बौद्धिक संपदा (IP) बनाना और अधिक से अधिक ‘फैबलेस’ कंपनियां तैयार करना है। ये ऐसी कंपनियां होती हैं जो चिप डिजाइन तो खुद करती हैं, लेकिन उनके निर्माण (फैब्रिकेशन) का काम दूसरी कंपनियों से करवाती हैं।

31 अगस्त को जारी किए गए नए नियमों में चिप डिजाइन को खास प्राथमिकता दी गई है। पूरी योजना के छह प्रमुख हिस्सों में पहला हिस्सा पूरी तरह चिप डिजाइनिंग पर केंद्रित है। इसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी चिपों, व्यावसायिक सेमीकंडक्टर उत्पादों और नए विकसित चिपों को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग ट्रैक बनाए गए हैं। इनमें डिप्लॉयमेंट-लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) भी शामिल है, जिसका उद्देश्य नई चिप तकनीकों के विकास और उनके वास्तविक उपयोग को प्रोत्साहित करना है।

पहला ट्रैक राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के लिए जरूरी सेमीकंडक्टर तकनीक पर केंद्रित है। इसके तहत सरकार खुद तय करेगी कि किन चिप, मेमोरी, सेंसर और नेटवर्क से जुड़े सिस्टम को विकसित और तैयार किया जाना है।

इस कैटेगरी में हिस्सा लेने वाली कंपनियों का भारत में पंजीकरण होना, उनका मुख्यालय भारत में होना, बड़े पैमाने पर काम और कर्मचारी भारत में होना और उनका मालिकाना हक भारतीय नागरिकों के पास होना जरूरी है। हालांकि, वे दुनिया की दूसरी कंपनियों या शोध संस्थानों के साथ मिलकर काम कर सकती हैं।

आईटी मंत्रालय के तहत काम करने वाली संस्था ‘सी-डैक’ (C-DAC) इन परियोजनाओं के लिए टेंडर निकालेगी और कंपनियों को आर्थिक मदद के साथ-साथ डिजाइनिंग टूल्स भी मुहैया कराएगी। इससे बनने वाली डिजाइन पर सी-डैक और उस कंपनी का मिलकर अधिकार होगा।

दूसरा ट्रैक व्यावसायिक चिप-डिजाइन कंपनियों के लिए है। इसके तहत सरकार कंपनियों को महंगे इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (EDA) टूल्स और वेफर फैब्रिकेशन जैसी जरूरी सुविधाओं तक पहुंच उपलब्ध कराएगी, ताकि वे नई और उन्नत सेमीकंडक्टर तकनीकों को विकसित कर सकें। सिलिकॉन की पतली प्लेट (वेफर) पर चिप के सर्किट और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक हिस्से तैयार करने की प्रक्रिया को वेफर फैब्रिकेशन कहते हैं।

शुरुआती चरण के स्टार्टअप और छोटी कंपनियों (MSMEs) को उनके काम के आधार पर 15 करोड़ रुपये तक की आर्थिक मदद मिलेगी। यह सहायता प्रोजेक्ट की कुल लागत का अधिकतम 50% होगी।

वहीं, बड़ी कंपनियां रॉयल्टी मॉडल चुन सकती हैं। इसके तहत उन्हें सरकार से मिली सहायता की 1.5 गुना राशि वापस होने तक अपनी बिक्री का 5% हिस्सा सरकार को देना होगा।

इस श्रेणी में प्रवासी भारतीयों (OCIs) की कंपनियों को भी शामिल होने की छूट दी गई है, बशर्ते उनकी कंपनी भारत में ही पंजीकृत हो और मुख्यालय भारत में हो तथा सारा काम-काज भारत से ही चले। उनकी डिजाइन और फाइलें भारत में ही रहनी चाहिए।

विशेषज्ञों का कहना है कि इससे देश में भारी निवेश आएगा। इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन (IESA) के अध्यक्ष अशोक चांडक के मुताबिक, “सेमीकॉन 2.0 से अगले 5 से 7 सालों में 5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निजी निवेश आ सकता है।”

एचसीएल (HCL) के सह-संस्थापक और एपिक (EPIC) फाउंडेशन के चेयरमैन अर्जुन मल्होत्रा ने कहा, “यह बहुत अच्छा फैसला है कि इस बार योजना को प्रवासी भारतीयों (OCIs) के लिए भी खोल दिया गया है। उनके पास दुनिया भर का बेहतरीन अनुभव है जो भारत में उन्नत चिप कंपनियां बनाने में मदद करेगा।”

भारतीय चिप को खरीदार कैसे मिलेंगे?

चिप को सफलतापूर्वक डिजाइन करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कंपनियां विदेशी चीप को छोड़कर इस नई भारतीय चिप को खरीदें।

इसके लिए सरकार ने ‘डिप्लॉयमेंट-लिंक्ड इंसेंटिव’ (DLI) योजना शुरू की है। इसके तहत योजना लागू होने के बाद लॉन्च होने वाली भारतीय चिप की बिक्री पर सरकार 5 साल तक 9% तक की प्रोत्साहन राशि वापस करेगी। एक कंपनी को अलग-अलग उत्पादों के लिए कुल मिलाकर 120 करोड़ रुपये तक की मदद मिल सकती है।

यह फायदा नई कंपनियों के लिए बहुत काम का है, क्योंकि उन्हें इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं को विदेशी चिप छोड़कर नई भारतीय चिप्स अपनाने के लिए राजी करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है।

पूरे सेमीकंडक्टर माहौल पर क्या ध्यान है?

इस योजना का एक बड़ा लक्ष्य सेमीकंडक्टर की पूरी आपूर्ति श्रृंखला की कमियों को दूर करना भी है।

इसके तहत चिप बनाने वाली मशीनरी, शोध केंद्र, जरूरी रसायन और गैस, जांच प्रयोगशालाएं और वेफर बनाने वाले संयंत्र लगाने वाली कंपनियों को कुल लागत का 30% तक सरकारी सहयोग मिलेगा। मशीनरी बनाने वाली कंपनियों को देश में बने सामान का इस्तेमाल करने पर 5 साल तक अतिरिक्त प्रोत्साहन (PLI) भी दिया जाएगा।

बड़े सिलिकॉन वेफर संयंत्र लगाने पर 40%, जबकि उन्नत चिप पैकेजिंग सुविधाएं स्थापित करने पर 35% तक सरकारी सहायता मिलेगी। हालांकि, 2021 में शुरू की गई पहली योजना में मिलने वाली 50% सहायता के मुकाबले इस बार सहायता की सीमा कम है।

पहली योजना के तहत 12 बड़ी सेमीकंडक्टर निर्माण परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी। इनमें माइक्रोन की जांच सुविधा और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स का वेफर संयंत्र प्रमुख हैं। इनमें से माइक्रोन, केन्स सेमीकॉन और सीजी सेमी ने व्यावसायिक उत्पादन भी शुरू कर दिया है।

टैलेंट और नौकरियों का क्या होगा?

सेमीकॉन 2.0 में कुशल लोगों और प्रशिक्षित कर्मचारियों को तैयार करने के लिए अलग प्रावधान किया गया है। सरकार का लक्ष्य सिर्फ चिप बनाने वाले विशेषज्ञ तैयार करना नहीं है, बल्कि कारखानों में काम करने वाले इंजीनियरों, शोधकर्ताओं और तकनीशियनों को भी प्रशिक्षण देना है।

केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, भारत ने 10 साल में 85,000 सेमीकंडक्टर इंजीनियर तैयार करने का लक्ष्य सिर्फ 4 साल में हासिल कर लिया है। अब सरकार ने 1 लाख और इंजीनियर तैयार करने का नया लक्ष्य रखा है। छोटे शहरों के छात्रों ने अब तक 250 से ज्यादा चिप डिजाइन किए हैं। इस पूरे क्षेत्र के विकास से देश में 50,000 से 60,000 सीधे रोजगार पैदा होने की उम्मीद है।

चिप डिजाइन की पढ़ाई करने वाले छात्रों को आधुनिक उपकरणों और प्रयोगशालाओं की सुविधा दी जाएगी। वहीं, चिप बनाने से जुड़े प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण केंद्रों और प्रयोगशालाओं को मजबूत किया जाएगा। इसके लिए पात्र परियोजनाओं को कुल लागत का 75% तक सरकारी सहायता मिल सकती है।

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