प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को ‘सेमीकॉन इंडिया 2026’ के पांचवें संस्करण के उद्घाटन समारोह में कहा कि सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का तेजी से विस्तार हो रहा है। यह नवाचार, निवेश और विकास के लिए नए अवसर खोल रहा है।
17 से 19 सितंबर तक चलने वाले इस तीन दिवसीय सम्मेलन और प्रदर्शनी की थीम ‘सिलिकॉन टू सिस्टम्स: बिल्डिंग द इकोसिस्टम’ है। इसमें सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स की पूरी आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी भारतीय और दुनिया की बड़ी कंपनियां शामिल होंगी। इनके अलावा नीति निर्माता, निवेशक, शोधकर्ता, स्टार्टअप और शिक्षण संस्थान भी एक मंच पर जुटेंगे।
सम्मेलन में भारत में सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने, निवेश लाने, नई तकनीक विकसित करने और कुशल लोगों को तैयार करने पर चर्चा होगी। इसके साथ ही डिस्प्ले उद्योग में हो रही नई प्रगति पर भी सत्र होंगे। अलग-अलग देशों के साथ सहयोग और संयुक्त उपक्रम की संभावनाएं तलाशने के लिए छह ‘कंट्री राउंडटेबल’ भी आयोजित किए जाएंगे। महिलाओं की नेतृत्व क्षमता पर भी एक सत्र होगा।
प्रधानमंत्री ने बुधवार को दुनिया की प्रमुख चिप कंपनियों के प्रमुखों के साथ बैठक की। इसमें माइक्रोन टेक्नोलॉजी, एएसएमएल, इन्फिनियन टेक्नोलॉजीज, एप्लाइड मैटेरियल्स, टोक्यो इलेक्ट्रॉन, एएमडी, इंटेल और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक, बैठक में पीएम मोदी ने सरकार और सेमीकंडक्टर उद्योग के बीच करीबी सहयोग की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि भारत के पास प्रतिभाशाली लोग, नई तकनीक अपनाने की क्षमता और जरूरी बुनियादी ढांचा है। उन्होंने उद्योगों से कुशल लोगों को तैयार करने, नई तकनीक पर काम करने और उभरती तकनीकों के विकास में अधिक भागीदारी करने को कहा।
भारत का चिप मिशन: अपने दम पर चिप डिजाइन करने पर जोर
यह सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है, जब केंद्र सरकार ने करीब दो महीने पहले सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे चरण यानी सेमीकॉन 2.0 की घोषणा की है। इसके लिए 1.27 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस बार सरकार का खास जोर भारत में चिप डिजाइन की क्षमता बढ़ाने और सेमीकंडक्टर उद्योग से जुड़ी पूरी आपूर्ति श्रृंखला को देश में विकसित करने पर है। इसमें चिप बनाने वाली कंपनियों के साथ-साथ मशीन, खास तरह की गैस और रसायन बनाने वाली कंपनियां भी शामिल हैं।
पहले चरण की योजना के तहत भारत 12 सेमीकंडक्टर निर्माण और असेंबली परियोजनाएं लाने में सफल रहा। इनमें टाटा समूह की ओर से लगाई जा रही चिप निर्माण इकाई भी शामिल है।
आज लैपटॉप, मोबाइल फोन से लेकर एआई तक, लगभग हर आधुनिक तकनीक के लिए सेमीकंडक्टर जरूरी है। इसलिए भारत की नई योजना में चिप डिजाइन पर खास ध्यान दिया गया है। सरकार का मानना है कि यही वह क्षेत्र है, जहां भारत को अभी अपनी क्षमता और मजबूत करने की जरूरत है।
सेमीकॉन 2.0 का एक बड़ा लक्ष्य ऐसी भारतीय कंपनियां तैयार करना है, जो खुद चिप का डिजाइन और उससे जुड़ी बौद्धिक संपदा विकसित करें। इसमें ‘फैबलेस’ सेमीकंडक्टर कंपनियां भी शामिल हैं। ये कंपनियां चिप का डिजाइन और बिक्री करती हैं, लेकिन चिप बनाने का काम किसी दूसरी कंपनी से करवाती हैं।
योजना के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा और जरूरी बुनियादी ढांचे के लिए महत्वपूर्ण मानी जाने वाली सेमीकंडक्टर तकनीकों पर भी काम किया जाएगा। सरकार यह तय करेगी कि किन तरह के चिप, सिस्टम-ऑन-चिप, मॉड्यूल और दूसरी तकनीकों को विकसित करने की जरूरत है। इनमें कंप्यूटिंग, मेमोरी, रेडियो फ्रीक्वेंसी, पावर, नेटवर्किंग और सेंसर से जुड़ी तकनीकें शामिल हैं।
इसके अलावा व्यावसायिक स्तर पर चिप डिजाइन करने वाली कंपनियों को महंगे इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (EDA) टूल, मल्टी-प्रोजेक्ट वेफर फैब्रिकेशन और दूसरी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
इस योजना का लाभ अब भारतीय मूल के व्यक्ति (OCI) की स्वामित्व या नियंत्रण वाली कंपनियां भी उठा सकेंगी। हालांकि इसके लिए कंपनी का भारत में पंजीकृत होना और उसका मुख्यालय भारत में होना जरूरी है। साथ ही, उसके कारोबार और कर्मचारियों की बड़ी मौजूदगी भारत में होनी चाहिए। चिप से जुड़ी बौद्धिक संपदा और डिजाइन व विकास से जुड़ी फाइलें भी भारत में ही रखनी होंगी।
चिप की पूरी आपूर्ति श्रृंखला भारत में तैयार करने की कोशिश
सेमीकॉन 2.0 का जोर सिर्फ चिप बनाने तक सीमित नहीं है। सरकार सेमीकंडक्टर उद्योग से जुड़ी पूरी सप्लाई चेन में मौजूद कमियों को दूर करना चाहती है।
सेमीकंडक्टर उपकरणों के लिए रिसर्च और डेवलपमेंट सेंटर लगाने वाली कंपनियों के साथ-साथ वेफर, फोटोमास्क, फोटोरेजिस्ट, सब्सट्रेट, रसायन और गैस बनाने वाली इकाइयों को भी सरकारी मदद मिलेगी। सेमीकंडक्टर की टेस्टिंग और उपकरण व उनके हिस्से बनाने वाली इकाइयां भी इसके दायरे में होंगी। ऐसी परियोजनाओं को अपनी पूंजीगत लागत का 30% तक सरकारी सहयोग मिल सकता है।
उपकरण बनाने वाली कंपनियों को इसके अलावा उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन राशि (PLI) भी मिलेगी। यह प्रोत्साहन पांच साल में धीरे-धीरे 10% से घटकर 2% रह जाएगा। इसकी गणना देश में खरीदे गए कच्चे माल और दूसरे जरूरी सामान की कीमत के आधार पर होगी।
बड़े सिलिकॉन वेफर बनाने वाले संयंत्रों को अपनी पूंजीगत लागत का 40% तक सरकारी सहयोग मिल सकता है। वहीं कंपाउंड सेमीकंडक्टर, फोटोनिक्स, सेंसर और डिस्क्रीट सेमीकंडक्टर बनाने वाली इकाइयों को 35% तक मदद मिलेगी।
एडवांस्ड चिप पैकेजिंग इकाइयों को 35% और पुरानी पैकेजिंग तकनीक वाली इकाइयों को 25% तक सहायता दी जाएगी। यह सहायता 2021 में शुरू की गई पहली सेमीकंडक्टर योजना से कम है। उस योजना में सरकार ने सेमीकंडक्टर का पूरा इकोसिस्टम तैयार करने के लिए परियोजनाओं की पूंजीगत लागत का 50% तक देने का प्रावधान किया था।
सेमीकंडक्टर क्षेत्र के लिए कुशल लोगों को तैयार करना
सेमीकॉन 2.0 में प्रतिभाशाली और कुशल लोगों को तैयार करने को भी एक अलग प्राथमिकता दी गई है। सरकार सिर्फ चिप डिजाइन करने वाले इंजीनियर तैयार नहीं करना चाहती, बल्कि चिप बनाने और पैकेजिंग प्लांट के लिए जरूरी इंजीनियर, शोधकर्ता, तकनीशियन और उत्पादन इकाइयों में काम करने वाले कर्मचारियों को भी प्रशिक्षित करना चाहती है।
आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पहले कहा था कि भारत ने 10 साल में 85,000 सेमीकंडक्टर इंजीनियर तैयार करने का लक्ष्य सिर्फ चार साल में हासिल कर लिया। अब सरकार ने एक लाख और इंजीनियर तैयार करने का नया लक्ष्य रखा है।
वैष्णव के मुताबिक, देश के टियर-2 और टियर-3 शहरों के छात्र अब तक 250 से ज्यादा चिप डिजाइन कर चुके हैं। भारत में तैयार हो रहे सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम से 50,000 से 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की उम्मीद है।
चिप निर्माण के क्षेत्र में प्रशिक्षण के लिए अलग बुनियादी ढांचा तैयार किया जाएगा। इसके अलावा मौजूदा नैनोफैब्रिकेशन और चिप निर्माण से जुड़ी प्रयोगशालाओं को भी मजबूत किया जाएगा। पात्र परियोजनाओं को राज्य सरकारों की ओर से मिलने वाली मदद समेत उनकी कुल लागत का 75% तक सरकारी सहयोग मिल सकता है।
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केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को भारत के बड़े सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे वर्शन को मंजूरी दे दी, जिसमें 1.27 लाख करोड़ रुपये का खर्च आएगा। इस नई स्कीम का खास फोकस चिप बनाने के आस-पास की सप्लाई चेन को सब्सिडी देना होगा ताकि गैस और प्रोडक्शन प्रोसेस में इस्तेमाल होने वाले केमिकल जैसी चीजें बनाने वाली कंपनियों को आकर्षित किया जा सके। इस स्कीम का समय छह साल है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।
