जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने पुंछ के एक निवासी को जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA) के तहत हिरासत में रखने के आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्या हो सकते हैं, लेकिन इनके आधार पर किसी व्यक्ति को एहतियातन हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) में लेने जैसी असाधारण शक्ति का इस्तेमाल सही नहीं है।

न्यायमूर्ति संजय धर की पीठ ने पुंछ के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से जारी हिरासत के आदेश को रद्द करते हुए कहा, “ऐसा लगता है कि हिरासत का आदेश जारी करते समय संबंधित अधिकारी ‘लोक व्यवस्था’ और ‘कानून-व्यवस्था’ के बीच के अंतर को समझने में नाकाम रहे।”

पीठ ने कहा कि जब किसी स्थिति से निपटने के लिए सामान्य आपराधिक कानून पर्याप्त है, तब एहतियाती हिरासत का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

मामला क्या है

पुंछ जिले के निवासी मोहम्मद यूसुफ को अप्रैल 2026 में PSA के तहत हिरासत में लिया गया था। पुंछ के जिला मजिस्ट्रेट ने कहा था कि उसे इस आशंका के कारण हिरासत में रखना जरूरी है कि वह ऐसा कोई काम कर सकता है, जिससे ‘लोक व्यवस्था बनाए रखने पर प्रतिकूल असर’ पड़े।

यूसुफ की पत्नी ने उच्च न्यायालय में इस हिरासत को चुनौती दी। उनका कहना था कि यूसुफ पर लगाए गए आरोप इतने गंभीर नहीं हैं कि उसके खिलाफ एहतियाती हिरासत का इस्तेमाल किया जाए।

प्रशासन ने यूसुफ के खिलाफ 2018 से 2026 के बीच दर्ज चार एफआईआर का हवाला दिया था। इनमें पंचायत के एक कर्मचारी के साथ विवाद, पुरानी दुश्मनी से जुड़ा एक विवाद, शादी समारोह में हुआ झगड़ा और मारपीट का एक मामला शामिल था, जिसमें एक व्यक्ति घायल हुआ था।

राज्य सरकार का कहना था कि इन मामलों से यूसुफ के व्यवहार का एक पैटर्न सामने आता है और इसलिए उसकी हिरासत जरूरी थी। वहीं, यूसुफ की ओर से कहा गया कि ये सभी अलग-अलग और निजी विवाद थे, जिनसे सामान्य आपराधिक कानून के तहत निपटा जा सकता है।

कानून क्या कहता है?

संविधान का अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और हिरासत के मामलों में कई सुरक्षा उपाय देता है। इसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी का कारण बताया जाना चाहिए और उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है। हालांकि, इसी अनुच्छेद में एहतियाती हिरासत से जुड़े कानून के तहत गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए व्यक्ति के लिए अलग प्रावधान है।

PSA भी ऐसा ही एक कानून है। इसके तहत सरकार किसी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए हिरासत में रख सकती है, अगर उसे लगता है कि ऐसा करना उस व्यक्ति को ‘राज्य की सुरक्षा या लोक व्यवस्था बनाए रखने के खिलाफ’ काम करने से रोकने के लिए जरूरी है।

इस कानून के तहत जिला मजिस्ट्रेट और संभागीय आयुक्त हिरासत का आदेश जारी कर सकते हैं। हालांकि, इसके लिए सरकार की मंजूरी और सलाहकार बोर्ड की समीक्षा जरूरी होती है। लोक व्यवस्था से जुड़े मामलों में किसी व्यक्ति को अधिकतम एक साल और राज्य की सुरक्षा से जुड़े मामलों में अधिकतम दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता है।

हालांकि, उच्चतम न्यायालय कई बार साफ कर चुका है कि हर आपराधिक मामला या शांति भंग की हर घटना को लोक व्यवस्था से जुड़ी समस्या नहीं माना जा सकता।

उच्चतम न्यायालय ने राम मनोहर लोहिया बनाम बिहार राज्य मामले में कहा था कि कोई घटना कानून-व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह लोक व्यवस्था को भी प्रभावित करे।

न्यायालय ने कानून-व्यवस्था, लोक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा को तीन एक-दूसरे के भीतर बने गोल घेरों के रूप में समझाया था। सबसे बड़ा घेरा कानून-व्यवस्था का है, उसके भीतर लोक व्यवस्था और सबसे छोटे घेरे में राज्य की सुरक्षा आती है। यानी कोई घटना कानून-व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है, लेकिन लोक व्यवस्था को नहीं। इसी तरह कोई घटना लोक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा हो।

उच्चतम न्यायालय ने अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य (2023) मामले में कहा था कि अगर यह संदेह हो कि हिरासत का आदेश जारी करने वाले अधिकारी ने अपनी कानूनी शक्तियों की सीमा को ही गलत समझ लिया है, तो अदालत उस आदेश की जांच कर सकती है। न्यायालय ने कहा था कि ऐसे मामलों में वह यह देख सकती है कि अधिकारी ने अपनी शक्तियों को सही तरीके से समझा या नहीं, भले ही वह हिरासत के लिए उपलब्ध सामग्री की पर्याप्तता की जांच न करे।

उच्च न्यायालय ने क्या कहा?

इन कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए हाई कोर्ट ने पाया कि यूसुफ के खिलाफ जिन चार एफआईआर का हवाला दिया गया था, वे सभी निजी विवादों और अलग-अलग लोगों के साथ हुए झगड़ों से जुड़ी थीं। कोर्ट ने कहा कि ये घटनाएं ‘निजी दुश्मनी तक सीमित’ थीं और उनका स्वरूप ‘व्यक्तिगत’ था।

कोर्ट ने माना कि यूसुफ के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज होना अपने आप में एहतियाती हिरासत का आधार नहीं बन सकता। इन मामलों का असर कुछ निजी व्यक्तियों तक था और ऐसा कोई सबूत नहीं था कि इन घटनाओं से आम लोगों की जिंदगी प्रभावित हुई हो या पूरे समुदाय के लिए कोई खतरा पैदा हुआ हो।

अदालत ने कहा, “याचिकाकर्ता की ओर से इसी तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति अपने आप में समुदाय के सामान्य जीवन को प्रभावित नहीं करेगी।” अदालत ने कहा कि यूसुफ के खिलाफ लगाए गए आरोपों से निपटने के लिए सामान्य आपराधिक कानून पर्याप्त है। एहतियाती हिरासत एक ‘असाधारण शक्ति’ है और ऐसी स्थिति में इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जो केवल ‘कानून-व्यवस्था की समस्या’ पैदा करती हो।

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