प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में फिर से ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का प्रयोग किया। मोदी ने कहा कि उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में इस शब्द का प्रयोग ‘होमियोपैथी की गोली’ की तरह किया था और ‘दिमागी नक्सलों’ ने इस पर प्रतिक्रिया देकर अपना असली चेहरा उजागर कर दिया है।

मोदी के भाषण के बाद हुए विवाद पर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजु ने स्पष्ट किया कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द विपक्ष के नेताओं के लिए नहीं है, बल्कि उनके लिए है जो ‘नक्सलियों, अलगाववादियों, अनुच्छेद 370 और पूर्वोत्तर में अलगाववाद का समर्थन करते हैं तथा संविधान को नकारते हैं।’

नक्सली कौन हैं?

‘नक्सली’ शब्द पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव से आया है, जहां मई 1967 में माओ त्से तुंग के नेतृत्व वाली चीनी कम्युनिस्ट क्रांति की तर्ज पर किसानों का विद्रोह हुआ था।

समय के साथ भारत में नक्सली आंदोलन से जुड़ी सोच में काफी बदलाव आया है। अब इसे मुख्य रूप से सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह और मोटे तौर पर बिना सोचे-समझे की जाने वाली हिंसा के रूप में देखा जाता है। हालांकि इसकी शुरूआत न्याय और असमानता के सवालों पर हुई थी, जो कि इसके लोकप्रिय नारे में स्पष्ट झलकता है-‘जो ज़मीन जोते, ज़मीन उसी की।’

गुरुग्राम की बीएमएल मुंजाल यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज के प्रोफेसर तनवीर फज़ल ने रेखांकित किया कि ‘जो ज़मीन जोते, ज़मीन उसी की’ की मांग राष्ट्रीय आंदोलन का भी हिस्सा थी, हालांकि वह इस पर कायम नहीं रह सका।

नक्सली, माओवादी और मार्क्सवादी एक-दूसरे से अलग कैसे हैं?

चारू मजूमदार के नेतृत्व में 22 अप्रैल 1969 को गठित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी भाकपा(माले) ने नक्सली आंदोलन को संगठित और संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत में नक्सली आंदोलन को मोटे तौर पर ‘माओवादी आंदोलन’ भी कहा जाता है और अक्सर दोनों शब्दों का इस्तेमाल एक-दूसरे की जगह किया जाता है।

हालांकि नक्सलबाड़ी को भारत में माओवाद का जन्मस्थान माना जाता है, लेकिन 1948 में भाकपा के ही एक गुट ने तेलंगाना में ‘चीनी मुक्ति संग्राम’के विचारधारा को औपचारिक रूप से अपनाया था।

जोनाथन कैनेडी और सुनील पुरुषोत्तम ने अपने शोध पत्र ‘बियॉन्ड नक्सलबाड़ी: ए कंपेरेटिव एनालिसिस ऑफ माओइस्ट इंसर्जेंसी एंड काउंटरइंसर्जेंसी इन इंडिपेंडेंट इंडिया’ में इस आंदोलन के इतिहास को खंगालने का प्रयास किया है। उन्होंने इसका मूल तेलंगाना के किसान आंदोलन (1946) में तलाशा है, जहाँ किसान जमींदारों के खिलाफ विद्रोह कर रहे थे। बाद में जब निजाम ने भारतीय संघ में शामिल होने से इनकार कर दिया तो यह आंदलोन और तेज हो गया।

हालांकि 1948 में सैन्य कार्यवाही के बाद जब हैदराबाद को भारतीय संघ में शामिल कर लिया गया तो फिर इन विद्रोहियों को केंद्र सरकार की कड़ी कार्रवाई का समाना करना पड़ा। इनमें से कुछ पहाड़ों में चले गए, जहाँ किसान/आदिवासी आंदोलन ने माओवादी आंदोलन का रूप ले लिया। यह विद्रोह 1951 तक चलता रहा, जबतक कि भाकपा ने पहले आम चुनाव हिस्सा लेने का ऐलान नहीं कर दिया। इस घोषणा के साथ ही उसने इस आंदोलन के खत्म करने की भी घोषणा कर दी।

1964 में माकपा में विभाजन हुआ और इस तरह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का जन्म हुआ, जो सोवियत मॉडल के केंद्रीकृत और राज्य-संचालित विकास के बजाय किसानों को एकजुट करने और क्रांतिकारी संघर्ष पर जोर देने वाले चीनी कम्युनिस्ट दृष्टिकोण से अधिक जुड़ी हुई थी।

माकपा के कार्यकर्ताओं को ही भारत में विशेष रूप से मार्क्सवादी कहा जाता है, हालांकि दोनों पार्टियां अपने विचारधारा को मार्क्सवादी सिद्धांत पर ही आधारित बताती हैं।

नक्सलबाड़ी के बाद, 1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के दशक में आंध्र प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और आज के झारखंड तथा महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में भी इसी तरह के विद्रोह देखे गए।

बिहार जमींदारी उन्मूलन अधिनियम (1948) और भूमि सीमा अधिनियम (1961) के काफी हद तक विफल रहने के बाद नक्सलियों ने जमीन कब्जाने और हत्याओं का सहारा लेना शुरू कर दिया। राजेश कुमार नायक अपने शोघपत्र ‘नक्सलिज्म, प्राइवेट कास्ट बेस्ड मिलिशियास एंड वायलेंस इन सेंट्रल बिहार’में कहते हैं कि बाद में यह काफी संवेदनशील हो गया, क्योंकि इसने ‘ऊंची और निचली’ जातियों के बीच लड़ाई का रूप ले लिया।

1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक के दौरान भूस्वामियों ने इन गतिविधियों को ऊंची जाति के खिलाफ निचली जाति का विद्रोह बताना शुरू कर दिया, और इसे कुचलने के लिए अपनी निजी जाति-आधारित सेनाएं बना लीं।

रजत कुमार कुजुर अपने शोघपत्र ‘लेफ्ट एक्सट्रीमलिज्म इन इंडिया: नक्सल मूवमेंट इन छत्तीसगढ़ एंड उड़ीसा’में कहते हैं कि छत्तीसगढ़ और ओडिशा (तब उड़ीसा) में आदिवासियों की उपेक्षा ने नक्सलवाद के फैलने में योगदान दिया। हालांकि बाद में आदिवासियों में ही इस आंदोलन की आलोचना होने लगी थी। कुजुर अपने शोधपत्र में कहते हैं कि नक्सलवादियों से लड़ने के लिए ही छत्तीसगढ़ में ‘सेलवा जुडूम’का गठन हुआ था।

धीरे-धीरे भाकपा (माले) भी कई गुटों में बंट गई। अविभाजित आंध्र प्रदेश में सक्रिय इसकी एक प्रमुख सशस्त्र शाखा ‘पीपुल्स वार ग्रुप’ ने 2004 में बंगाल और बिहार में सक्रिय ‘माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया’ के साथ मिलकर भाकपा (माओवादी) का गठन किया। इससे पहले माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया ने पंजाब के रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (माओवादी) को अपने साथ मिला लिया था। भाकपा (माओवादी) ने सशस्त्र संघर्ष के जरिए सरकार को सत्ता से हटाने का लक्ष्य रखा।

दूसरी ओर, भाकपा (माले) लिबरेशन ने 1992 में हथियार छोड़कर चुनावी राजनीति का रास्ता अपना लिया। आज लोकसभा में इसके दो सांसद हैं और दोनों बिहार से चुने गए हैं।

राज्य नक्सलवाद को कैसे देखता है?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज के सहायक प्रोफेसर आमिर अली ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से कहा कि आम लोगों के बीच अब नक्सलवाद को असमानता खत्म करने के समाधान के रूप में नहीं देखा जाता है। यह इस पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण हो जाता है कि गृह मंत्री ने अमित शाह दावा कर रहे हैं कि नक्सली विचारधारा को ‘पूरी तरह खत्म’ कर दिया गया है।

तनवीर फजल अपने शोध-पत्र ‘पीस टॉक्स ऐज स्ट्रैटेजिक डिप्लॉयमेंट: द स्टेट, माओइस्ट्स एंड पॉलिटिकल वायलेंस इन इंडिया’ में कहते हैं कि सरकारों ने शुरु से ही नक्सलियों को कानून-व्यवस्था की समस्या के तौर पर देखा है। वह कहते हैं कि 2004 में सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत शुरू हुई थी। लेकिन बातचीत ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी, क्योंकि केंद्र सरकार लगातार इस बात पर जोर देती रही कि माओवादी पहले हथियार छोड़ें।

2010 में एक बार फिर बातचीत की कोशिश हुई। इस बार माओवादी सरकार की मांग पर संघर्ष विराम के लिए तैयार हो गए थे। लेकिन शांति वार्ता का नेतृत्व कर रहे भाकपा (माओवादी) के नेता आजाद की हत्या के बाद यह प्रक्रिया रुक गई।

इसके कुछ साल बाद 2011 में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और नक्सलियों के बीच चल रही बातचीत भी किशनजी के कथित फर्जी एनकाउंटर के बाद खत्म हो गई। 2008 में TMC ने लालगढ़ में पुलिस और पुलिस कैंपों के खिलाफ नक्सलियों के आंदोलन का समर्थन किया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद पार्टी ने नक्सलवाद को देखने का अपना नजरिया बदल लिया।

ऐसे में सवाल उठता है कि जब सुरक्षा बल नक्सलियों के मजबूत इलाकों में उन्हें पीछे धकेल रहे हैं और आम लोगों के बीच ‘नक्सलवाद’ शब्द का अर्थ भी बदलता जा रहा है, तो असमानता और अन्याय के खिलाफ संघर्ष के रूप में इस आंदोलन की ऐतिहासिक जड़ों की बात कौन कर रहा है?

तनवीर फजल के मुताबिक, कांग्रेस इस मुद्दे पर चुप है क्योंकि ‘मोटे तौर पर वह इस मामले में बीजेपी की राय से सहमत है।’ उनका कहना है कि कम्युनिस्ट दलों की चुप्पी के पीछे ‘रणनीतिक वजहें’ हो सकती हैं। या फिर आसान शब्दों में कहें तो माओवादी खुद को बाकी सभी से अलग कर चुके हैं, क्योंकि वे हर दूसरे व्यक्ति या संगठन को क्रांति के उद्देश्य से विश्वासघात करने वाला बताने लगते हैं।

आमिर अली के मुताबिक, वामपंथी दलों की चुप्पी की एक बड़ी वजह उनका ‘आंतरिक बिखराव’ और इस समस्या को स्पष्ट और प्रभावी तरीके से सामने रखने में उनकी असमर्थता है।

यह भी पढ़ें-कुख्यात नक्सली हिडमा मारा गया, एक करोड़ रुपये का था इनामी

सुरक्षा बलों ने मंगलवार सुबह कुख्यात नक्सली माडवी हिडमा (51) सहित छह को आंध्र प्रदेश में एक मुठभेड़ में मार गिराया। हिडमा उर्फ संतोष अपनी पत्नी और अन्य साथियों के साथ छत्तीसगढ़ से भाग रहा था। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।