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Shraddha Murder Case: क्या होता है लिव-इन रिलेशनशिप, भारत में इसे लेकर क्या है कानून?

Court Ruling On Live-In Relationship: भारतीय संसद ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कोई कानून तो नहीं बनाया है लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत ने कई मौकों पर इसे लेकर महत्वपूर्ण फैसला ज़रूर सुनाया है।

Shraddha Murder Case: क्या होता है लिव-इन रिलेशनशिप, भारत में इसे लेकर क्या है कानून?
आफताब पूनावाला का नार्को टेस्ट (फोटो : पीटीआई)

राजधानी दिल्ली में हुए श्रद्धा वालकर हत्याकांड (Shraddha Walker Murder Case) मामले के बाद लिव-इन रिलेशनशिप एक बार फिर चर्चा में है। श्रद्धा के लिव इन पार्टनर आफताब पूनावाला पर आरोप है कि उसने श्रद्धा की हत्या कर उसके शव को टुकड़ों में बांटकर अलग-अलग जगह फेंक दिया। मीडिया में इस घटना की चर्चा के बाद लिव-इन रिलेशनशिप पर बहस छिड़ गई। कोई इसे अनैतिक बता रहा है और कोई गैर-कानूनी (Is live-in relationship legal?)।

आइए जानते हैं क्या है लिव-इन रिलेशनशिप (What does live-in relationship means?) और भारत में इसे लेकर क्या कानून है? (live-in relationship in india)

क्या होता है लिव-इन रिलेशनशिप? (What is live-in relationship?)

प्रेमी जोड़े का शादी किए बिना लंबे समय तक एक घर में साथ रहना लिव-इन रिलेशनशिप कहलाता है। लिव-इन रिलेशनशिप की कोई कानूनी परिभाषा अलग से कहीं नहीं लिखी गई है। आसान भाषा में इसे दो व्यस्कों (Who is eligible for live-in relationship?) का अपनी मर्जी से बिना शादी किए एक छत के नीचे साथ रहना कह सकते हैं।

कई कपल इसलिए लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं, ताकि यह तय कर सकें कि दोनों शादी करने जितना कंपैटिबल हैं या नहीं। कुछ इसलिए रहते हैं क्योंकि उन्हें पारंपरिक विवाह व्यवस्था कोई दिलचस्पी नहीं होती है।

लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चार दशक पहले 1978 में बद्री प्रसाद बनाम डायरेक्टर ऑफ कंसोलिडेशन (Badri Prasad vs Director Of Consolidation) के केस में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता दी थी। यह माना गया था कि शादी करने की उम्र वाले लोगों के बीच लिव-इन रिलेशनशिप किसी भारतीय कानून का उल्लंघन नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कपल लंबे समय से साथ रह रहा है, तो उस रिश्ते को शादी ही माना जाएगा। इस तरह कोर्ट ने 50 साल के लिव-इन रिलेशनशिप को वैध ठहराया था।

मौलिक अधिकारों (Fundamental rights) में ही है लिव-इन रिलेशनशिप की जड़

न्यायपालिका से संबंधित खबरों को आसान भाषा में बताने वाले मीडिया संस्थान लाइव लॉ की मानें, तो लिव-इन रिलेशनशिप की जड़ कानूनी तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 में मौजूद है। अपनी मर्जी से शादी करने या किसी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने की आजादी और अधिकार को अनुच्छेद 21 से अलग नहीं माना जा सकता।

साल 2001 में पायल शर्मा बनाम नारी निकेतन केस में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि एक आदमी और औरत को अधिकार है अपनी मर्जी से एक-दूसरे के साथ बिना शादी किए लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि हालांकि हमारा समाज लिव-इन रिलेशनशिप को अनैतिक मानता है, मगर कानून के हिसाब से न तो ये गैर-कानूनी है और न ही अपराध है।

विवाहित दंपति की तरह लिव-इन पार्टनर्स पर भी लागू होता है घरेलू हिंसा का कानून

इंदिरा शर्मा बनाम वी.के. शर्मा केस में सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 की धारा 2F में डोमेस्टिक रिलेशनशिप की जो परिभाषा है, उसमें लिव-इन रिलेशनशिप भी शामिल है। यानी जिस तरह इस एक्ट की मदद से शादीशुदा कपल खुद को घरेलू हिंसा से बचा सकता है, उसी तरह लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे कपल पर भी यह एक्ट लागू होता है।

CRPC की धारा 125 के तहत भरण पोषण का अधिकार

जस्टिस मलिमथ की कमेटी के सुझाव पर पत्नी की परिभाषा की पुनर्व्याख्या के लिए CRPC की धारा 125 में संशोधन किया गया था। समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों का पालन करते हु्ए यह सुनिश्चित किया गया था कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएं या वो महिलाएं जिन्हें उनके पार्टनर ने छोड़ दिया है, उन्हें वाइफ (पत्नी) का दर्जा मिले।

संपत्ति के उत्तराधिकार का अधिकार

जिस तरह पति की मृत्यु के बाद पत्नी का दिवंगत पति की संपत्ति पर अधिकार होता है। ठीक उसी तरह एक महिला के लिव-इन पार्टनर की मृत्यु के बाद उसके पार्टनर की inherited property (विरासत में मिली संपत्ति) पर उस महिला का अधिकार होता। धनूलाल बनाम गणेश राम के केस में अदालत ने माना था कि अगर एक लिव-इन रिलेशनशिप लंबे समय तक चलता है, तो उसे एक शादी की तरह ही माना जाएगा।

लिव-इन रिलेशनशिप में पैदा हुए बच्चों का क्या?

Tulsa & Ors vs Durghatiya केस में सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में पैदा हुए एक बच्चे को राइट टू प्रॉपर्टी (संपत्ति का अधिकार) दिया था। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा था कि ऐसे बच्चों को नाजायज नहीं माना जाएगा, जब उसके माता-पिता काफी समय से साथ रह रहे थे।

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भारतीय समाज का नजरिया बहुत सकारात्मक नहीं रहा है। लेकिन न्यायिक फैसलों ने कई मौकों पर लिव-इन रिलेशनशिप की वैधता (What are the rules of live-in relationship?) को साबित किया है। अदालत ने लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं के अधिकार को कानूनी दर्जा भी दिया है।

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First published on: 16-11-2022 at 09:00:54 pm
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