दलित लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता नागुलारापु वारा प्रसाद को उनकी किताब ‘कल्पित नायकुडु’ (कल्पित नायक) में कथित तौर पर डॉ. भीमराव आम्बेडकर के बारे में ‘आपत्तिजनक’ बातें लिखने के कारण पुलिस ने हिरासत में ले लिया है और किताब की प्रतियों को जब्त कर लिया है।
18 सितंबर को तेलुगु भाषा में लिखे इस किताब का विमोचन होने वाला था, लेकिन उससे एक दिन पहले ही तेलंगाना पुलिस ने हमारा प्रसाद के नाम से मशहूर नागुलारापु को गिरफ्तार कर लिया।
कई जिलों में किताब के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के बाद हैदराबाद के सेंट्रल क्राइम थाना पुलिस ने यह कार्रवाई की। पुलिस ने लेखक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196 (समूहों के बीच दुश्मनी बढ़ाना), 350 (जानबूझकर अपमान या उकसाना), 353(2) (डर या चिंता पैदा करने वाले बयान) और 61(2) (आपराधिक साजिश) के तहत मामला दर्ज किया है।
मामला क्या है?
आरोप है कि 600 पन्ने के इस किताब में डॉ. भीमराव आम्बेडकर के खिलाफ आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं और इससे विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी फैल सकती है।
हमारा प्रसाद नाम से मशहूर लेखक ने 10 सितंबर को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में लिखा था, “किताब कल्पित नायकुडु (झूठ की बुनियाद पर बने एक नेता- राष्ट्र विरोधी, हिंदू विरोधी और अलगाववादी) को 900 रुपये में खरीदने के लिए प्री-बुकिंग की जा सकती है।” इससे पहले 20 अगस्त की एक पोस्ट में कहा था कि किताब पूरी हो चुकी है। सभी से इसे साझा करना न भूलें।
विमोचन से पहले ही किताब को लेकर तेलंगाना के विभिन्न जिलों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। पुलिस ने विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी फैलने की आशंका को देखते हुए लेखक को हिरासत में ले लिया।
इससे पहले एक याचिकाकर्ता चंद्रमौली ने तेलंगाना हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर किताब के विमोचन पर रोक लगाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने किताब की सामग्री, शीर्षक और कवर पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि किताब के कुछ हिस्से आम्बेडकर के अनुयायियों के बीच दुश्मनी बढ़ा सकते हैं। उन्होंने किताब के पीडीएफ संस्करणों के प्रसार पर रोक लगाने की भी मांग की।
कोर्ट ने जब राज्य सरकार से पूछा कि प्रशासन ने क्या कदम उठाए हैं, तब सरकार की ओर से पेश हुए वकील ने बताया कि पुलिस ने लेखक को हिरासत में ले लिया है। साथ ही किसी अप्रिय घटना को रोकने के लिए किताब की प्रतियां जब्त कर ली गई हैं।
किताब को प्रसाद के खुद के प्रकाशन गृह ‘हमारा प्रसाद प्रकाशन’ ने छापा है और उनके ही एक पोस्ट के अनुसार, 18 सितंबर से बिक्री के लिए उनके वेबसाइट पर उपलब्ध था। हालांकि लेख लिखे जाने तक उनके वेबसाइट का लींक नहीं खुल रहा है।
प्रसाद ने 13 अगस्त के एक पोस्ट में कहा था, “चार साल की शोध और पांच महीने की कड़ी मेहनत के बाद मैंने 600 पन्नों की एक किताब लिखी है। इसमें 135 किताबों के संदर्भ दिए गए हैं। उन 135 किताबों की सूची किताब के अंत में दी गई है। यह पूरी तरह प्रमाणों के साथ लिखी गई एक अद्भुत किताब है, जो पूरे देश को हिला देगी…”
पहले उपलब्ध वेबसाइट पर किताब के बारे में लिखा था कि यह पहला खंड लेखक के उन राजनीतिक और ऐतिहासिक विचारों को सामने रखता है, जो आम तौर पर प्रचलित कथाओं पर सवाल उठाते हैं। यह किताब पाठकों को इतिहास, समाज और राष्ट्रीय पहचान से जुड़ी स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाने और उन पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
प्रसाद के वेबसाइट के अनुसार, उनकी संस्था ऐसी रचनाओं को बढ़ावा देती है जो सवाल उठाती हैं, जानकारी देती हैं और लंबे समय तक प्रासंगिक रहती हैं। लेखक ने अपनी पुरानी कई पोस्टों में कहा है कि वह देश के ‘वास्तविक इतिहास’ को सामने रखते हैं। उनका काम व्यक्तिपूजा की राजनीति को चुनौती देना है।
पहले भी रहे हैं विवादों में
राष्ट्रीय दलित सेना के संस्थापक होने का दावा करने वाले प्रसाद पहले भी विवादों में रह चुके हैं। 2023 में भी पुलिस ने उन्हें तब गिरफ्तार किया था, जब उनका एक विवादित विडियो सामने आया था। विडियो में उन्होंने कहा था कि अगर आम्बेडकर उनके सामने होते तो वह उन्हें उसी प्रकार गोली मार देते, जैसे गोडसे ने गांधी को मारा था।
यह भी पढ़ें-शब्दयात्री: जब कवि अज्ञेय कलम लेकर सूखे बिहार में उतर गए, साथ थे रेणु
किसी लेखक का नाम उसकी पहचान होता है। किताब के कवर पर वही नाम पाठक को लेखक तक ले जाता है। लोग उसी नाम से उसकी रचनाएं खोजते हैं और उसी नाम से उसे याद करते हैं। लेकिन हिंदी साहित्य के एक बड़े लेखक की कहानी कुछ उलटी तरह से शुरू हुई थी। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।
