गोवा मंत्रिमंडल ने पिछले हफ़्ते ‘गोवा गैर-कानूनी धर्म परिवर्तन रोकथाम विधेयक, 2026’ को मंज़ूरी दी थी, जिसे सोमवार से शुरू हुए विधानसभा के मानसून सत्र में पेश किया जाना था।

हालाँकि, भाजपा विधायकों समेत कई विधायकों के कड़े विरोध के बाद इस बात की संभावना कम ही है कि यह विधेयक इस सत्र में पेश किया जाएगा। इन विधायकों ने सोमवार की सुबह मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत के साथ हुई एक बैठक में इस ‘विवादित’ कानून का विरोध किया था।

मसौदे में क्या-क्या प्रस्ताव थे?

मसौदे में जबरन, प्रभाव में लाकर, लालच देकर, धोखे से या शादी के ज़रिए कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन पर कड़ी सज़ा का प्रावधान था। इसमें उम्रकैद, कम से कम 50,000 रुपये जुर्माना और पीड़ित को 5 लाख रुपये तक का मुआवज़ा देने का प्रस्ताव शामिल था।

इसमें यह भी कहा गया था कि अगर कोई शादी केवल गैर-कानूनी धर्म परिवर्तन के मकसद से की गई है, तो उसे रद्द माना जाएगा। गैर-कानूनी धर्म परिवर्तन कराने में शामिल पादरी, कर्मकांडी, मौलवी या मुल्ला जैसे धार्मिक गुरुओं को 3 से 10 साल तक की जेल की सज़ा का प्रावधान था।

मसौदे के मुताबिक, जो लोग अपनी मर्जी से धर्म बदलना चाहते हैं, उन्हें कम से कम 60 दिन पहले जिलाधिकारी या अपर जिला अधिकारी के पास एक घोषणा पत्र जमा करना होगा। इसमें यह बताना होगा कि वे बिना किसी दबाव के अपनी इच्छा से धर्म बदल रहे हैं। मसौदे में लिखा गया था कि सीधे-सादे लोगों को धोखे, बल, लालच या दबाव में धर्म परिवर्तन से बचाने के लिए सरकार ने यह सख्त कानून बनाने का फैसला किया है।

चर्च संस्थाओं का क्या कहना है?

‘काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस एंड पीस’ और ‘कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ गोवा’ ने इस विधेयक को वापस लेने की माँग की है। उनका कहना है कि यह विधेयक संवैधानिक स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द के लिए बड़ा ख़तरा है।

एक संयुक्त बयान में उन्होंने कहा, “यह प्रस्तावित कानून आपसी भरोसे की जगह शक और भाईचारे की जगह डर का माहौल पैदा करेगा, जिससे हमारे समाज के ताने-बाने को गहरा नुकसान पहुँचेगा।”

बयान में कहा गया, “सरकार को दबाव रोकने के नाम पर लोगों की व्यक्तिगत मान्यताओं पर नज़र रखने, अंतर-धार्मिक संबंधों पर पाबंदी लगाने या धार्मिक शिक्षा और सामाजिक सेवाओं को अपराध घोषित करने का काम नहीं करना चाहिए। हमें डर है कि इस कानून से राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंसा और इसके प्रावधानों का गलत इस्तेमाल बढ़ेगा। इससे ‘सांप्रदायिक माफिया’ जैसी ताकतों को बढ़ावा मिलेगा जो धर्म और कानून की आड़ में अल्पसंख्यकों को परेशान करेंगी, जैसा कि देश के अन्य राज्यों में देखा गया है।”

संस्थाओं का कहना है कि गोवा में बड़े पैमाने पर जबरन धर्म परिवर्तन का कोई पुख्ता सबूत सामने नहीं आया है। केवल इसलिए कि भाजपा शासित अन्य राज्यों में ऐसे कानून बने हैं, गोवा को भी ऐसा विभाजनकारी कानून लागू नहीं करना चाहिए। इसके प्रावधान भाई को भाई से और पड़ोसी को पड़ोसी से लड़ा देंगे। इससे रिश्तेदार, राजनीतिक कार्यकर्ता और उपद्रवी गुट लोगों के निजी रिश्तों पर नज़र रखेंगे और प्रार्थना सभाओं में खलल डालेंगे।

विधायकों का क्या रुख है?

विपक्षी विधायकों ने इस विधेयक का ज़ोरदार विरोध किया है। उनका कहना है कि 2027 के चुनाव से पहले राज्य में सांप्रदायिक तनाव भड़काने के लिए यह सब किया जा रहा है।

कांग्रेस विधायक कार्लोस अल्वारेस फरेरा ने कहा कि जब राज्य में धर्म परिवर्तन का एक भी मामला दर्ज नहीं है, तो ऐसे कानून की क्या ज़रूरत है? फरेरा ने कहा, “जब राज्य में धर्म परिवर्तन का कोई मामला ही नहीं है, तो ऐसा कानून लाने की क्या मजबूरी है? यह भाजपा सरकार का वह एजेंडा है जिसके ज़रिए लोगों के बीच नफ़रत के बीज बोए जा सकें और उन्हें जेल भेजा जा सके। चुनाव से ठीक पहले ऐसा विभाजनकारी कानून लाना यह दिखाता है कि भाजपा अपनी ज़मीन खो रही है।”

‘गोवा फॉरवर्ड पार्टी’ के विधायक विजय सरदेसाई ने कहा कि यह विधेयक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने और गोवा के लोगों के धार्मिक अधिकारों में दखल देने वाला है। उन्होंने कहा, “गोवा की अपनी एक अलग पहचान और इतिहास है। हमें दूसरे भाजपा शासित राज्यों के विभाजनकारी कानूनों की अंधी नकल नहीं करनी चाहिए। हम इसका पुरज़ोर विरोध करेंगे।”

सरकार का समर्थन कर रहे निर्दलीय विधायक अलेक्सो रेजिनाल्डो लोरेन्को ने बताया कि सोमवार को मुख्यमंत्री के साथ हुई बैठक में यही सहमति बनी थी कि विधेयक को विधानसभा में पेश नहीं किया जाएगा।

लोरेन्को ने कहा, “मेरी राय में गोवा में कोई धर्म परिवर्तन नहीं हो रहा है। इसके न तो कोई आँकड़े हैं और न ही कोई सबूत। फिर इसकी ज़रूरत क्या है? गोवा एक शांत राज्य है जहाँ लोग भाईचारे से रहते हैं। इस शांति को क्यों भंग किया जाए? मैं सरकार के साथ हूँ, लेकिन इस बिल का समर्थन नहीं कर सकता।”

विधायक ने कहा, “जो एकाध मामले दर्ज भी हुए थे, उनमें कोर्ट में चार्जशीट दाखिल नहीं हो सकी और या तो मामले खारिज हो गए या क्लोजर रिपोर्ट लगा दी गई। हमारी धार्मिक और अल्पसंख्यक संस्थाएं समाज के कमज़ोर वर्ग की मदद करती हैं। इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इससे धर्म परिवर्तन हुआ है।”

वहीं कलंगूट से भाजपा विधायक माइकल लोबो ने कहा कि कैबिनेट ने विधेयक को मंजूरी देने में जल्दबाज़ी की। उन्होंने कहा, “हमें पहले इसका अध्ययन करना होगा और सभी को विश्वास में लेना होगा। फिलहाल इस सत्र में यह बिल पेश नहीं हो रहा है।”

गौरतलब है कि 2025 के मानसून सत्र में मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने राज्य में ‘जबरन’ धर्म परिवर्तन से निपटने के लिए ऐसे कानून की ज़रूरत बताई थी। उन्होंने कहा था, “उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जबरन धर्म परिवर्तन पर रोक का कानून है। हमें भी ऐसे कानून की ज़रूरत है ताकि राज्य में ‘लव-जिहाद’ जैसी घटनाओं को रोका जा सके।”

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अपनी ही पार्टी के विधायकों और सहयोगी नेताओं के कड़े विरोध के बाद गोवा की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने जारी मानसून सत्र में ‘धर्मांतरण विरोधी विधेयक’ पेश न करने का फैसला किया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें