पिछले सप्ताह जम्मू में सार्वजनिक साइनबोर्डों पर हिंदी के लिए इस्तेमाल होने वाली देवनागरी और अंग्रेजी के लिए इस्तेमाल होने वाली रोमन लिपि के अलावा एक और लिपि में क्षेत्रों के नाम लिखे थे।
यह जम्मू में ही बोली जाने वाली डोगरी भाषा की लिपि- ‘नामे डोगरा आखर’ थी। डोगरी लंबे समय से देवनागरी में लिखी जाती रही है और इसकी अपनी लिपि का उपयोग समाप्त हो गया था। अब, जम्मू प्रशासन प्रमुख स्थानों और संस्थानों में साइनबोर्ड लगाकर इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा है।
डोगरी क्या है?
डोगरी भारतीय-यूरोपीय भाषा परिवार की एक प्रमुख भाषा है। हिंदी, बांग्ला और पंजाबी भी इसी परिवार से जुड़ी भाषाएं हैं। डोगरी इस भाषा परिवार के पश्चिमी पहाड़ी समूह का हिस्सा है, जिसमें पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में बोली जाने वाली कई भाषाएं शामिल हैं।
डोगरी मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर के जम्मू संभाग में रहने वाले डोगरा समुदाय द्वारा बोली जाती है। इसके अलावा पंजाब और हिमाचल प्रदेश के आसपास के इलाकों के साथ-साथ पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी इसे बोलने वाले छोटे-छोटे समुदाय हैं।
2011 की जनगणना के अनुसार, डोगरी भारत में लगभग 26 लाख लोगों की प्राथमिक भाषा थी। इसे 2003 में आठवीं अनुसूची के तहत भारत की 22 अनुसूचित भाषाओं में से एक के रूप में मान्यता दी गई थी तथा 2020 में जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश की आधिकारिक भाषाओं में से एक घोषित किया गया था।
‘नामे डोगरा आखर’ क्या है?
नामे डोगरा आखर डोगरी भाषा की मूल लिपि टाकरी का एक संशोधित रूप है। टाकरी का उपयोग महाराजा गुलाब सिंह के शासनकाल में किया जाता था।
गुलाब सिंह जम्मू और कश्मीर के पहले डोगरा शासक थे, जिसमें उस समय गिलगित, स्कर्दू और हुंजा जैसे क्षेत्र भी शामिल थे जो वर्तमान में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हैं। चूंकि उन्होंने अपनी ऊर्जा अपने साम्राज्य की सीमाओं को तिब्बत तक बढ़ाने में लगा दी, इसलिए उनके पास टाकरी लिपि को बढ़ावा देने और विकसित करने के लिए बहुत कम समय बचा। खराब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने 1846 में सिंहासन त्याग दिया।
नामे डोगरा आखर अस्तित्व में कैसे आया?
गुलाब सिंह के बाद उनके पुत्र रणबीर सिंह 1856 में सिंहासन पर बैठे। वह संस्कृत और फारसी भाषाओं के विद्वान थे। इन्होंने ही प्रसिद्ध रणबीर दंड संहिता में दीवानी और आपराधिक कानूनों के संकलन सहित कई सुधार पेश किए थे। उनके शासन के दौरान, यह महसूस किया गया कि स्वर चिह्नों (मात्राओं) की अनुपस्थिति के कारण टाकरी लिपि में आधिकारिक आदेशों और अन्य दस्तावेजों का लिप्यंतरण संभव नहीं था। इसे सुधारने के लिए, उन्होंने लेखकों से देवनागरी से स्वर चिह्नों को उधार लेने के लिए कहा।
जम्मू विश्वविद्यालय के अनुसंधान अध्ययन और कला संकाय की पूर्व डीन अर्चना केसर ने कहा कि इसके कारण प्रशासनिक कार्यों में पहले से उपयोग में आने वाली फारसी के अलावा नामे डोगरा आखर — जिसका शाब्दिक अर्थ नई डोगरी लिपि है — का उदय हुआ।
इस नई लिपि का उपयोग कब कम होने लगा?
12 सितंबर 1885 को महाराजा रणबीर सिंह के निधन के बाद उनके पुत्र प्रताप सिंह सत्ता में आए। उन्हें व्यापक सुधारों — शिक्षा, कनेक्टिविटी बुनियादी ढांचे, कृषि, भूमि, श्रम और स्वास्थ्य को लागू करने के लिए जाना जाता था।
प्रताप सिंह ने एक ऐसा निर्णय भी लिया जिसने लिपि के पतन की शुरुआत की। तब अधिकांश आधिकारिक कार्य फारसी और नामे डोगरा आखर में किए जाते थे। प्रशासनिक कार्यों को सरल बनाने के लिए, उन्होंने फारसी के स्थान पर उर्दू को जम्मू और कश्मीर की आधिकारिक भाषा बना दिया क्योंकि यह स्थानीय आबादी के बीच व्यापक रूप से उपयोग की जाती थी। हालांकि, डोगरी लिपि का उपयोग कई वर्षों तक कई स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता रहा।
अगला झटका
महाराजा प्रताप सिंह का कोई पुत्र नहीं था। उनके भतीजे हरि सिंह 1926 में जम्मू और कश्मीर के अगले शासक बने।
हरि सिंह ने भी कई सुधार पेश किए, जैसे राज्य के लिए एक लिखित संविधान बनाना, प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य करना, बाल विवाह पर रोक लगाना और निचली जाति समझे जाने वाले लोगों के लिए पूजा स्थलों को खोलना।
इन सुधारों के बीच, अंग्रेजों ने आधिकारिक कार्यों में अंग्रेजी पर जोर दिया, जबकि डोगरा क्षेत्र के लोग चाहते थे कि हिंदी का उपयोग किया जाए। हरि सिंह ने उर्दू के लिए इस्तेमाल होने वाली फारसी-अरबी लिपि के साथ-साथ देवनागरी और रोमन लिपियों को बढ़ावा देकर इन प्रतिस्पर्धी मांगों को संतुलित करने का प्रयास किया।
लिपि के बजाय भाषा का पुनरुद्धार
1944 में, एक साहित्यिक संगठन डोगरी संस्था ने डोगरी साहित्य को लोकप्रिय बनाने के लिए देवनागरी लिपि को अपनाया। यद्यपि इसने डोगरी को 1969 में साहित्य अकादमी से मान्यता प्राप्त करने में मदद की, लेकिन इसने नामे डोगरा आखर के अंततः पतन में भी योगदान दिया।
बाद के वर्षों में भाषा को लोकप्रिय बनाने के प्रयास देखे गए, लेकिन लिपि को नहीं।
1971 में, जम्मू विश्वविद्यालय ने एक डोगरी अनुसंधान सेल की स्थापना की, जिसे बाद में मास्टर ऑफ आर्ट्स और पीएचडी पाठ्यक्रमों के साथ एक पूर्ण डोगरी विभाग में अपग्रेड कर दिया गया। 1987 में विश्वविद्यालय से संबद्ध डिग्री कॉलेजों में इस भाषा को एक औपचारिक विषय के रूप में पेश किया गया था। इन सभी स्थानों पर, भाषा को देवनागरी लिपि में पढ़ाया जाता रहा है।
1990 में, डोगरी कवि वेद पाल दीप के नेतृत्व में एक डोगरी एक्शन कमेटी ने स्कूलों में डोगरी को लागू करवाने के लिए प्रदर्शन किए। दो साल बाद, डोगरी संघर्ष मोर्चा नामक एक छत्र समूह ने डोगरी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए औपचारिक रूप से एक आंदोलन शुरू किया।
वर्षों के संघर्ष के बाद, इसे 2002 में प्राथमिक स्तर पर इसे तीसरी भाषा के रूप में पेश किया गया। अगले वर्ष दिसंबर में, केंद्र सरकार ने इस भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किया। हालांकि, इसकी लिपि देवनागरी ही रही।
लिपि के लिए अभियान
नामे डोगरा आखर को पुनर्जीवित करने का कदम कुछ साल पहले जम्मू में नागरिक समाज के सदस्यों जैसे कि गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, जम्मू के पूर्व प्रिंसिपल डॉ. कस्तूरी लाल गुप्ता द्वारा शुरू किया गया था। सेवानिवृत्ति के बाद, डॉ. गुप्ता ने डोगरी भाषा और उसकी लिपि को बढ़ावा देने के लिए एक पहल का नेतृत्व किया।
डॉ. गुप्ता ने लगभग तीन साल पहले व्यक्तिगत स्तर पर धार्मिक स्थलों और श्मशान घाटों पर नामे डोगरा आखर में लिखे बोर्ड प्रदर्शित करना शुरू किया। बाद में उन्होंने जम्मू नगर निगम से संपर्क किया और विभिन्न स्थानों पर नामे डोगरा आखर में लिखे साइनबोर्ड लगवाए। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा और अपनी लिपि के बिना कोई भी जीवित नहीं रह सकता। उन्होंने यह भी कहा कि वह जल्द ही डोगरी लिपि में कक्षाएं आयोजित करना शुरू करेंगे।
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