इस हफ्ते, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने वालों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने यह मामला तब बंद किया, जब केंद्र सरकार ने कहा कि उसने इन मामलों को आगे न बढ़ाने का ‘निर्णय’ लिया है। इसके साथ ही, अदालत ने NEET-UG 2026 परीक्षा लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को तीन महीने के भीतर मुआवजा देने का आदेश दिया।

जुलाई में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी लगभग सभी एफआईआर रद्द कर दी गईं। हालांकि, करीब 2,873 ऐसे लोगों को इसका लाभ नहीं मिला, जिनके बारे में कहा गया है कि उनका ‘गंभीर आपराधिक इतिहास’ रहा है। सुनवाई के दौरान, CJP से खुली अदालत में यह बयान देने को भी कहा गया कि वह 5 सितंबर को प्रस्तावित अपना विरोध मार्च रद्द कर देगी। इस तरह कोर्ट ने CJP की मांग को लागू करवाने वाले एक तटस्थ मंच के रूप में काम किया।

हम यहाँ अनुच्छेद 142 को समझने की कोशिश करेंगे जिस पर संविधान लागू होने के बाद से ही कानूनी विद्वानों के बीच बहस होती रही है।

अनुच्छेद 142 क्या है और कहाँ से आया है

अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को लंबित मामलों में ‘पूर्ण न्याय’ सुनिश्चित करने के लिए जरूरी आदेश देने की शक्ति देता है। हालांकि, संविधान में यह साफ नहीं बताया गया है कि ‘पूर्ण न्याय’ का मतलब क्या है और इस शक्ति का इस्तेमाल कब किया जा सकता है।

इस प्रावधान की शुरुआत भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 210 से मानी जाती है। इससे भी पहले, औपनिवेशिक दौर में जब किसी विवाद पर लिखित कानून स्पष्ट नहीं होता था, तब उसका फैसला ‘न्याय, समानता और सद्विवेक’ के आधार पर किया जाता था। इसी परंपरा से इस प्रावधान की नींव जुड़ी हुई है।

संविधान के मसौदे में यह प्रावधान अनुच्छेद 118 के रूप में शामिल था। संविधान सभा ने इसे 27 मई 1949 को बिना किसी बहस के मंजूरी दे दी। इस प्रावधान में बदलाव के लिए दो संशोधन प्रस्ताव भी पेश किए गए थे, लेकिन बाद में दोनों को वापस ले लिया गया।

संविधान सभा में इस प्रावधान की भावना पर सीधे तौर पर बहुत कम चर्चा हुई। इसका सबसे करीब उदाहरण उस समय देखने को मिला, जब अदालत को अपीलों की सुनवाई के लिए ‘विशेष अनुमति देने’ से जुड़े एक अन्य अनुच्छेद पर बहस हो रही थी। उस दौरान संविधान सभा के सदस्य कृष्ण चंद्र शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट की प्रस्तावित शक्तियों की तुलना पुराने प्रिवी काउंसिल की शक्तियों से की। उन्होंने कहा कि प्रिवी काउंसिल के पास यह अधिकार था कि वह अपील हो या न हो, जहां न्याय की जरूरत महसूस हो, वहां हस्तक्षेप कर सके।

इसके अलावा, इस शक्ति का दायरा कितना व्यापक होगा, यह तय करने का काम संविधान सभा ने अदालत पर ही छोड़ दिया। अगले करीब सात दशकों में सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में अपने फैसलों के जरिए अनुच्छेद 142 के दायरे और इस्तेमाल को धीरे-धीरे स्पष्ट किया।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले इस शक्ति का उपयोग कैसे किया है?

अनुच्छेद 142 का खुला दायरा इसे सुप्रीम कोर्ट के सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले साधनों में से एक बनाता है। असाधारण शक्तियां देने वाले इस प्रावधान का इस्तेमाल कई महत्वपूर्ण मामलों में किया गया है—

-1989 के भोपाल गैस त्रासदी समझौते में यूनियन कार्बाइड से 470 मिलियन डॉलर का भुगतान सुनिश्चित करने और कंपनी के खिलाफ आपराधिक मामलों को रद्द करने के लिए।

-अयोध्या विवाद में मुस्लिम पक्ष को पांच एकड़ जमीन देने के लिए।

-2022 में राजीव गांधी हत्याकांड के दोषी ए जी पेरारिवलन की रिहाई का आदेश देने के लिए।

इसके अलावा, यदि अदालत को लगता है कि शादी पूरी तरह से टूट चुकी है और इसे सुधारा नहीं जा सकता, तो वह तलाक देने के लिए भी इस प्रावधान का उपयोग कर सकती है। जनहित याचिकाओं (PIL) और अन्य मामलों में भी इसका प्रयोग होता है।

सुप्रीम कोर्ट के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यह दुनिया की सबसे शक्तिशाली संवैधानिक अदालतों में से एक है। उस शक्ति का एक बड़ा हिस्सा अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल से ही आता है।

खुद सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रावधान की सीमाएं तय करने की कोशिश की है ताकि न्यायाधीशों को असीमित अधिकार न मिलें।

प्रेमचंद गर्ग बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1962) मामले में अदालत ने माना था कि अनुच्छेद 142 के तहत दिए गए आदेश मौलिक अधिकारों और कानून के अनुरूप होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1998) में कहा गया कि अनुच्छेद 142 किसी कानून का पूरक हो सकता है (अर्थात कानून की कमियों को भर सकता है), लेकिन यह मौजूदा कानूनी प्रक्रिया को खत्म या नजरअंदाज नहीं कर सकता।

CJP का आदेश इस सीमा की परीक्षा कैसे लेता है?

किसी FIR को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत रद्द करने से पहले आमतौर पर उसके तथ्यों की अलग-अलग जांच की जाती है। अदालत को यह देखना होता है कि क्या FIR में किसी अपराध के होने की बात बनती है या मामला साफ तौर पर दुर्भावना से दर्ज किया गया है।

लेकिन CJP के मामले में, केंद्र सरकार और प्रदर्शनकारी संगठन के बीच हुए समझौते के तहत कई राज्यों में दर्ज हजारों FIR को बिना अलग-अलग जांच किए एक साथ जोड़ दिया गया और उन सभी पर एक ही आदेश पारित कर दिया गया। सुविधा के लिए दिए गए इस आदेश ने FIR रद्द करने की कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया और अनुच्छेद 142 के तहत अदालत की व्यापक शक्ति का इस्तेमाल करते हुए यह तय कर दिया कि कानून को किस तरह लागू किया जाना चाहिए। साथ ही, अदालत ने इसी शक्ति का इस्तेमाल यह तय करने में भी किया कि किन लोगों को इस राहत का लाभ मिलेगा और किन्हें इससे बाहर रखा जाएगा।

क्या यह पहली बार है जब अनुच्छेद 142 की आलोचना हुई है?

जब सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल इसी प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए तमिलनाडु के लंबे समय से लंबित विधेयकों को स्वीकृत मान लिया था, तो उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ ‘परमाणु मिसाइल’ हमले जैसा कहा था।

यह एक ऐसी आलोचना है जो पूर्व अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल अतीत में कर चुके हैं। 2017 में उन्होंने लिखा था कि यद्यपि इस प्रावधान ने समाज के वंचित वर्गों के लिए ‘भलाई’ की है, लेकिन अब इसमें नियंत्रित और संतुलित करने का समय आ गया है।

वर्ष 2018 में, सबरीमाला फैसले के बाद, उन्होंने और आगे बढ़ते हुए अनुच्छेद 142 को एक ऐसी ‘कामधेनु बताया जिससे असीमित शक्तियां बहती हैं’। उन्होंने सुझाव दिया कि केवल पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठों को ही इसका इस्तेमाल करने की अनुमति दी जानी चाहिए, ताकि यह किसी एक छोटी पीठ की व्याख्या पर निर्भर न रहे।

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राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा ने अपने खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया है। इस सप्ताह की शुरुआत में छुट्टी पर गए न्यायमूर्ति शर्मा ने आरोप सामने आने के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।