अमेरिका-डेनमार्क-ग्रीनलैंड ने 18 सितंबर को एक सुरक्षा समझौते की घोषणा की। अमेरिका के राष्ट्रपति ग्रीनलैंड पर बार-बार अमेरिका के नियंत्रण की मांग करते रहे हैं। यहाँ तक कि उन्होंने ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने की धमकी दी थी। उनकी इस तरह की धमकियों ने उत्तरी अटलांटिक संधि (NATO) के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी थी। हालांकि, इस सुरक्षा समझौते को ग्रीनलैंड के मुद्दे का अंतिम समाधान नहीं समझा जाना चाहिए।

अमेरिका दुनिया के पश्चिमी हिस्से पर अपना दबदबा कायम करने की कोशिश में है। अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति (NSS) में उसने स्पष्ट कहा है कि अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध को ‘विरोधी विदेशी घुसपैठ या मुख्य संपत्तियों के स्वामित्व से मुक्त’ रखने के लिए आक्रामक कदम उठाएगा। ग्रीनलैंड में कूटनीतिक चालें हों या वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप, ये सब इसी सुरक्षा रणनीति के अनुरुप हैं।

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में अपने थिएटर कमान के नक्शे में भी बदलाव किया है और ग्रीनलैंड को यूरोपियन कमान से हटाकर नॉर्दर्न कमान के तहत कर दिया है। इस कमान पर उत्तरी अमेरिका रक्षा संभालने की जिम्मेदारी है। यह सब 1823 के ‘मुनरो सिद्धांत’ को पुनर्जीवित करने जैसा है।

भू-राजनीतिक महत्व

ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। इसका क्षेत्रफल करीब 21.6 लाख वर्ग किलोमीटर है और इसका लगभग 81 फीसदी हिस्सा विशाल स्थायी बर्फ की चादर से ढका है। यहां की आबादी 57,000 से भी कम है, इसलिए यह दुनिया के सबसे कम आबादी वाले क्षेत्रों में शामिल है। इसकी करीब आधी आबादी राजधानी नूक में रहती है। लगभग 88 फीसदी आबादी इनुइट या मिश्रित इनुइट-डेनिश है।

ग्रीनलैंड डेनमार्क के साम्राज्य के भीतर एक स्वायत्त और स्वशासित देश है। हालांकि, विदेश नीति, राष्ट्रीय रक्षा, सुरक्षा और मौद्रिक नीति की जिम्मेदारी अभी भी कोपेनहेगन यानी डेनमार्क की सरकार के पास है।

ग्रीनलैंड उत्तरी अमेरिका, यूरोप और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित है। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे बेहद महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि यहां से समुद्री रास्तों और हवाई मार्गों पर नजर रखी जा सकती है। यह आर्कटिक और अटलांटिक महासागर के बीच महत्वपूर्ण रास्ते पर है। यह ग्रीनलैंड-आइसलैंड-यूनाइटेड किंगडम के बीच के बीच के बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक मार्ग पर स्थित है।

ग्रीनलैंड में अमेरिकी-पिटुफिक स्पेस बेस स्थित है, जिसे पहले थुले एयर बेस कहा जाता था। यह बैलिस्टिक मिसाइलों की शुरुआती चेतावनी और आर्कटिक क्षेत्र की रक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। द्वीप में दुर्लभ खनिजों के भी बड़े भंडार हैं।

ग्रीनलैंड पर अमेरिका-डेनमार्क समझौता

इस समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में स्थायी सैन्य ठिकाने रखने, हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल और ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने की अनुमति मिलेगी। इससे वहां अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ने का रास्ता साफ होगा।

समझौते में NATO के बाहर के देशों को अमेरिका की मंजूरी के बिना वहां सैन्य ठिकाने बनाने या संवेदनशील क्षेत्रों में निवेश करने से रोक दिया गया है। यह समझौता उस स्थिति में भी लागू रहेगा, जब अगर भविष्य में ग्रीनलैंड डेनमार्क से पूरी तरह स्वतंत्र हो जाता है।

डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता डेनमार्क की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता तथा आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देता है। यहां संप्रभुता और रणनीतिक नियंत्रण के बीच अंतर समझना जरूरी है। इस समझौते के जरिए ग्रीनलैंड को अमेरिकी नियंत्रण में नहीं दिया गया है।

उभरती व्यवस्था से संकेत मिलता है कि अमेरिका का रणनीतिक प्रभाव बढ़ेगा, लेकिन औपचारिक रूप से क्षेत्र पर उसका कब्जा नहीं होगा।

रणनीतिक असर

आर्कटिक अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण आने वाले समय में बड़ी शक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र बनने वाला है। आर्कटिक के गर्म होने के साथ रूस वहां अपनी सैन्य सुविधाओं का विस्तार कर रहा है, जबकि चीन आर्थिक, वैज्ञानिक और कूटनीतिक स्तर पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

अमेरिका की चिंता केवल ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं है। वह सैन्य गतिविधियों या ऐसी बुनियादी सुविधाओं के जरिए होने वाली किसी भी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को रोकना चाहता है। इसी वजह से समझौते में अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी देशों को द्वीप पर किसी तरह की मौजूदगी बनाने से रोकने का प्रावधान रखा गया है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड भी नहीं चाहते कि कोई दुश्मन देश यहाँ अपनी पकड़ बनाए।

आज आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े हित एक-दूसरे से तेजी से जुड़ रहे हैं। ऐसे में आर्थिक हित और रणनीतिक हित भी एक-दूसरे से काफी हद तक जुड़े हुए हैं। अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाना राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत बन गया है, क्योंकि दुर्लभ खनिजों के क्षेत्र में चीन का दबदबा है। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि समझौते में खनिजों का खास तौर पर ज्यादा उल्लेख नहीं किया गया है और मुख्य ध्यान सुरक्षा पर है।

संभव है कि आर्थिक और निवेश से जुड़े पहलुओं को कवर करने के लिए अलग समझौता किया जाए। इससे अमेरिकी कंपनियों के लिए ग्रीनलैंड में निवेश और संसाधनों के प्रबंधन में बड़ी भूमिका की गुंजाइश बनेगी। वहीं, ग्रीनलैंड के लिए भी यह फायदेमंद हो सकता है कि बेहतर सुरक्षा के साथ उसे आर्थिक अवसर और विकास की नई संभावनाएं मिलें।

ग्रीनलैंड के मुद्दे ने NATO के भीतर असाधारण स्थिति पैदा कर दी थी, क्योंकि अमेरिका अपने ही गठबंधन के सदस्य देशों पर क्षेत्र पर नियंत्रण हासिल करने के लिए दबाव डाल रहा था। नया समझौता इस विवाद से निकलने का एक समझौतावादी रास्ता देता है। NATO ने भी इस समझौते का स्वागत किया है और कहा है कि इससे आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता मजबूत होगी।

डेनमार्क ने जोर दिया है कि आर्कटिक की सुरक्षा NATO की साझा जिम्मेदारी बनी रहनी चाहिए, केवल अमेरिका की नहीं। यह समझौता सामूहिक सुरक्षा तथा किसी भी संभावित खतरे को रोकने की क्षमता को मजबूत करेगा।

ग्रीनलैंड से जुड़ा यह नया समझौता रणनीतिक सोच में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाता है। अमेरिका को औपचारिक रूप से ग्रीनलैंड पर कब्जा किए बिना लंबे समय के लिए सुरक्षा और सैन्य पहुंच मिल जाएगी। इससे क्षेत्र पर कब्जे से जुड़े कानूनी और भू-राजनीतिक विवाद भी टल सकते हैं। डेनमार्क की क्षेत्रीय अखंडता भी बरकरार रहेगी और आकर्टिक की सुरक्षा के लिए अमेरिका की प्रतिबद्धता भी मिलती है।

22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अपने संबोधन के दौरान ट्रंप ने ग्रीनलैंड समझौते का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड में दो बड़े सैन्य अड्डे बनाएगा और आर्कटिक तथा उत्तरी अटलांटिक में अपनी मौजूदगी बढ़ाएगा। उनके मुताबिक, इससे यूरोप और अमेरिका की सुरक्षा होगी और NATO की क्षमताएं भी मजबूत होंगी।

आगे क्या होगा?

समझौते के कानूनी रुप से लागू होने से पहले डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संसदों से औपचारिक मंजूरी की आवश्यकता होगी। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने जोर देकर कहा है कि यह समझौता स्थानीय लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करता है।

ग्रीनलैंड समझौते के साथ आर्कटिक क्षेत्र में बड़ी शक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक नया अध्याय शुरू हो रहा है। आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि NATO की एकजुटता, ग्रीनलैंड की संप्रभुता और आर्कटिक में नियम आधारित व्यवस्था किस तरह आगे बढ़ती है। इसी से तय होगा कि यह समझौता लंबे समय तक कितना प्रभावी रहता है।