केंद्रीय बंदरगाह, नौवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने हाल ही में राज्य सभा में बताया कि ओडिशा की लगभग 564 किलोमीटर लंबी तटीय रेखा का लगभग 28% हिस्सा कटाव की चपेट में है। ओडिशा से राज्य सभा सांसद सस्मित पात्रा द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में मंत्री ने ‘नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च’ (NCCR) के अध्ययन के हवाले से यह जानकारी दी।
सोनोवाल ने एनसीसीआर द्वारा 1990 से 2022 के बीच ओडिशा के तटीय बदलावों पर किए गए अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि ओडिशा की 17.6% तटरेखा स्थिर रही, यानी इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ, जबकि 54.1% हिस्से में तटीय विस्तार या अवसाद के जमाव की स्थिति देखी गई।
एनसीसीआर क्या है
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला एनसीसीआर समुद्र और तटीय क्षेत्रों से जुड़े विभिन्न विषयों पर शोध करता है। इसके प्रमुख क्षेत्रों में समुद्री प्रदूषण, तटीय कटाव, तटीय बाढ़ एवं अन्य खतरे, तटीय जैव-विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र शामिल हैं।
इसका मुख्य उद्देश्य तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और अन्य हितधारकों को वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहायता प्रदान करना तथा समुद्री और तटीय संसाधनों के सतत एवं बेहतर उपयोग को बढ़ावा देना है। मंत्री द्वारा सदन में दिए गये इन आंकड़ों के संदर्भ में समझना जरूरी है कि ये महत्वपूर्ण क्यों है, तटीय कटाव क्या होता है और संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
- देश के पूर्वी हिस्से में स्थित ओडिशा के बालासोर, भद्रक, केंद्रपाड़ा, जगतसिंहपुर, पुरी और गंजाम जिले समुद्र से लगे हुए हैं। इन छह तटीय जिलों की आबादी 2011 के जनगणना के अनुसार लगभग 1.23 करोड़ है, जो बेल्जियम की पूरी आबादी के बराबर है और स्वीडन, ग्रीस या पुर्तगाल जैसे देशों से अधिक है। इसलिए तटीय क्षेत्रों में कटाव न केवल बड़ी आबादी की आजिविका को प्रभावित करेगा, बल्कि उनके जनजीवन को भी गहरे से प्रभावित करेगा और बड़े पैमाने पर विस्थापन को बढ़ावा देगा।
इसके अलावा, इन जिलों के तटीय क्षेत्रों में भीतरकनिका राष्ट्रीय उद्यान, गहिरमाथा समुद्री अभयारण्य, चिलिका लैगून और पारादीप तटीय क्षेत्र जैसे पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण स्थल मौजूद हैं। ये क्षेत्र जैव-विविधता और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन तटीय कटाव के प्रति संवेदनशील भी हैं। कटाव बढ़ने से इन क्षेत्रों के प्राकृतिक आवास, मैंग्रोव, समुद्री कछुओं के प्रजनन स्थल और अन्य जैव-विविधता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
तटीय रेखा में बदलाव
तटीय रेखा में बदलाव का मतलब समुद्र और जमीन के बीच की सीमा का समय के साथ आगे-पीछे खिसकना है। यह बदलाव प्राकृतिक कारणों जैसे लहरों, ज्वार-भाटा और तूफानों के कारण होता है। वहीं, बंदरगाहों का निर्माण, अनियोजित बुनियादी ढांचे का विकास और रेत खनन जैसी मानवीय गतिविधियां भी इसे बढ़ाती हैं। इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर समुद्र का बढ़ता जलस्तर भी तटीय कटाव और तटीय रेखा में बदलाव का एक प्रमुख कारण है।
‘जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस’ में 2021 में प्रकाशित ‘शोरलाइन चेंज अलोंग ओडिशा कोस्ट’ अध्ययन के अनुसार, बंदरगाहों और हार्बर के विकास के लिए बनाए गए मजबूत तटीय ढांचे समुद्र में तलछट के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित करते हैं, जिससे कुछ क्षेत्रों में कटाव और अन्य क्षेत्रों में रेत का जमाव बढ़ सकता है। इसके अलावा, सुनामी और चक्रवाती तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी तटीय रेखा में बड़े और अचानक बदलाव ला सकती हैं। अध्ययन के अनुसार, अपनी भौगोलिक स्थिति और चक्रवातों के बार-बार आने के कारण ओडिशा का तट इन बदलावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है।
एनसीसीआर के अध्ययन के अनुसार, ओडिशा के छह तटीय जिले तटीय कटाव और तटीय रेखा में आ रहे बदलावों का सामना कर रहे हैं। इनमें जगतसिंहपुर सबसे अधिक कटाव-संवेदनशील है, जिसकी कुल 55.8 किलोमीटर लंबी तटीय रेखा का 47.6% हिस्सा कटाव का सामना कर रहा है। इसके बाद गंजाम (60.18 किमी लंबी तटीय रेखा का 45.7% हिस्सा प्रभावित) और केंद्रपाड़ा (149.36 किमी तटीय रेखा का 45% हिस्सा प्रभावित) का स्थान है। अन्य तटीय जिलों में, बालासोर की 88 किमी तटीय रेखा का 23.8%, पूरी की 138 किमी तटीय रेखा का 10.2% और भद्रक की 72 किमी तटीय रेखा का 4.6% हिस्सा कटाव से प्रभावित हुआ है।
दीर्घकालिक तटीय विश्लेषण के आधार पर एनसीसीआर ने ओडिशा तट के कई हिस्सों को तटीय कटाव के लिहाज से ‘संवेदनशील क्षेत्र’ के रूप में चिह्नित किया है। इनमें गंजाम जिले में गोपालपुर पोर्ट के उत्तर का क्षेत्र तथा मयूरपड़ा से भ्रामराबाड़ी तक का तटीय हिस्सा शामिल है।
केंद्रापाड़ा जिले में हेतामुंडिया, हुकीटोला, पेंटा से सतभाया, सतभाया से गहिरमाथा; जगतसिंहपुर में कुसुपुर से सहादाबेड़ी और सहादाबेड़ी से जटाधरतंडा तक के क्षेत्र संवेदनशील पाए गए हैं। वहीं, पुरी जिले में चिलिका के समुद्री मुहाने के दोनों ओर का तटीय क्षेत्र, केउटाजंगा और देवी नदी के मुहाने का दक्षिणी हिस्सा संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल हैं।
इसी तरह, भद्रक जिले में अमरनगर तथा बालासोर जिले में बागड़ा, चौमुख, नारायण मोहंती पाड़िया और बिंधपद्मपुर से तालसारी तक के तटीय हिस्सों को भी कटाव के प्रति संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है।
प्रभाव और उठाए गए कदम
ओडिशा के वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग के आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते समुद्र के जलस्तर और तटीय कटाव की वजह से केंद्रपाड़ा जिले के कम से कम 16 गांव जलमग्न (पानी में डूब) हो चुके हैं, जिससे कई सौ लोग विस्थापित हुए हैं। प्रभावित ग्रामीणों ने न केवल अपनी जमीन खोई, बल्कि अपनी आजीविका भी गंवा दी। ओडिशा सरकार ने तटीय कटाव से प्रभावित लोगों को बसाने के लिए एक पुनर्वास कॉलोनी विकसित की है, जिसे भारत की पहली ‘क्लाइमेट रीसेटलमेंट कॉलोनी’ (जलवायु पुनर्वास कॉलोनी) कहा जा रहा है।
इसी तरह, गंजाम का पोडमपेटा गांव कभी करीब 500 परिवारों का घर हुआ करता था, लेकिन समुद्री कटाव और बंगाल की खाड़ी के बढ़ते पानी ने धीरे-धीरे इसकी जमीन को निगल लिया, जिससे पूरा गांव वीरान हो गया। जिले की कई अन्य तटीय बस्तियां भी कटाव की चपेट में हैं और लोगों को अपने घर छोड़कर दूसरी जगह जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। रामायापटना जैसे गांवों में भी समुद्र लगातार जमीन की ओर बढ़ रहा है, जिससे स्थानीय लोगों के घर और आजीविका दोनों पर संकट मंडरा रहा है।
विभाग के अधिकारियों ने बताया कि तटीय गाँवों को समुद्री कटाव से बचाने के लिए केंद्रपाड़ा के पेंटा गाँव में जियोटेक्सटाइल ट्यूब बाँध (geotextile tube embankment) बनाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। जियोटेक्सटाइल ट्यूब उच्च-क्षमता वाले, छिद्रपूर्ण सिंथेटिक कपड़ों (जैसे पॉलीप्रोपाइलीन) से बना एक बड़ा, बेलनाकार कंटेनर होता है, जिसमें रेत का घोल भरा जाता है ताकि एक कृत्रिम तटीय संरचना बन सके। सी-वॉल बनाने में इस्तेमाल होने वाली ये ट्यूब्स किनारे से टकराने वाली लहरों के प्रभाव को कम करती हैं और कटाव को कम करने में मदद करती हैं।
इसी तरह, बालासोर जिले के उदयपुर-तालसारी, चंद्रबली-कीर्तनिया, चौलाती-कासाताल, चांदीपुर-पारिखी, कलामाटिया पाही और तालापाड़ा समुद्र तटों तथा गंजाम जिले के रामायापटना समुद्र तट पर ‘सी-वॉल-कम-सर्विस रोड’ का निर्माण किया जा रहा है। ये दोहरे उद्देश्य वाली तटीय संरचनाएं हैं। इनका बाहरी हिस्सा समुद्री लहरों और तटीय कटाव से सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि अंदरूनी हिस्सा स्थानीय लोगों की आवाजाही और परिवहन के लिए सड़क के रूप में काम करता है।
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