दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को एक पांच मंजिला पीजी के गिरने के बाद दुर्घटनास्थल पर सबसे पहले पहुंचने वालों में ब्लिंकिट की एक एंबुलेंस भी शामिल थी।
छात्रों और कर्मचारियों ने बताया कि इमारत के गिरने के तुरंत बाद ब्लिंकिट ऐप के जरिए एक एक एम्बुलेंस बुलाई गई थी। इसके बाद दिल्ली पुलिस, फायर ब्रिगेड और आपदा राहत टीमों के साथ कई अन्य एम्बुलेंस भी बचाव अभियान में शामिल हुईं।
सत्य निकेतन की इस घटना ने देश में एम्बुलेंस की उपलब्धता, उनके वितरण और क्षमता पर ध्यान आकर्षित किया है। केंद्र सरकार ने हालांकि पिछले दो दशकों में एम्बुलेंस नेटवर्क का विस्तार किया है, लेकिन खुद सरकार का आकलन है कि देश के कई हिस्सों में अभी भी इसकी कमी है। केंद्र के अनुसार, कई हिस्सों में इसके पहुंचने में लगने वाला समय अधिक है, इनमें जान बचाने वाली उन्नत सुविधाओं का अभाव है और गाड़ियों या तो बहुत पुरानी हो चुकी हैं या फिर खराब हैं।
समस्या केवल उपलब्ध एम्बुलेंसों की संख्या तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष राज्यों द्वारा पेश की गई जानकारी से पता चला है कि एम्बुलेंसों की ट्रैकिंग नहीं हो पाती है और उन्हें भेजने में काफी देरी होती है। 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 13 में या तो एम्बुलेंस में जीपीएस नहीं लगा था या फिर केवल कुछ में ही यह सुविधा उपलब्ध थी। ट्रॉमा केयर के लिए ये कमियां विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, जहां जल्द प्रतिक्रिया जीवन और मृत्यु का अंतर तय कर सकता है।
कंपनी की एम्बुलेंस सेवा फिलहाल गुरुग्राम और दिल्ली एनसीआर के चुनिंदा हिस्सों में उपलब्ध है। कंपनी के अनुसार, उसके पास 63 एम्बुलेंस का बेड़ा है। कंपनी का दावा है कि ये एम्बुलेंस औसतन नौ मिनट में गंतव्य तक पहुंच जाते हैं । ये एम्बुलेंस स्ट्रेचर, स्कूप और व्हीलचेयर, जरूरी उपकरण, जरूरी दवाएं, ऑक्सीजन सिलेंडर और ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफिब्रिलेटर (AED) जैसी सुविधाओं से लैस हैं। इस एम्बुलेंस सेवा को चुनने वाले पिकअप प्वाइंट से 30 किलोमीटर के दायरे में किसी भी अस्पताल को चुन सकते हैं। ऐप मरीज के स्थान से निकटता के आधार पर अस्पतालों की सूची भी सुझाता है।
ब्लिंकिट का कहना है कि एम्बुलेंस अस्पताल में तब तक इंतजार करेगी जब तक कि मरीज को ट्रांसफर न कर दिया जाए। और यदि अस्पताल मरीज को भर्ती करने में असमर्थ रहता है, तो ऐप के जरिए दूसरे अस्पताल का चयन किया जा सकता है। एम्बुलेंस तब तक मरीज की सहायता करना जारी रखेगी जब तक कि वह अस्पताल की देखरेख में न आ जाए। यह सेवा फिलहाल मुफ्त है।
ब्लिंकिट की मूल कंपनी इटर्नल ने हालांकि इस संबंध में अभी कोई टिप्पणी नहीं की है।
क्या भारत में एम्बुलेंस की किल्लत है?
केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत राष्ट्रीय एम्बुलेंस सेवा को सहायता प्रदान करती है। मुख्य रूप से 108 और 102 हेल्पलाइन के माध्यम से इन एम्बुलेंसों को बुलाया जा सकता है। 108 सेवा मुख्य रूप से ट्रॉमा और दुर्घटनाओं जैसी आपात स्थितियों के लिए है, जबकि 102 सेवा मरीजों को अस्पताल पहुँचाने पर केंद्रित है, विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए।
आंकड़ों के अनुसार, जून 2025 तक 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 28,321 एम्बुलेंस और मरीजों को ले जाने वाले अन्य वाहन संचालित थे। इनमें नौका, बाइक और अन्य एम्बुलेंस के अलावा 3,129 एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट (ALS) एम्बुलेंस, 15,251 बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) एम्बुलेंस और 3,926 मरीज परिवहन वाहन शामिल थे।
एनएचएम के तहत राज्यों को प्रति पांच लाख लोगों पर एक ALS एम्बुलेंस और प्रति एक लाख लोगों पर एक BLS एम्बुलेंस के लिए सहायता प्रदान की जाती है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जून 2024 तक 28,830 एम्बुलेंस और आपातकालीन परिवहन वाहन मौजूद थे, इसलिए बेड़े के आकार में वास्तव में गिरावट आई है। ये देश में निजी तौर पर संचालित होने वाली एम्बुलेंस सेवाओं से अलग हैं।
बीएलएस (BLS) एम्बुलेंस बुनियादी आपातकालीन देखभाल और मरीज की स्थिति को स्थिर करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। वहीं एएलएस (ALS) एम्बुलेंस अधिक उन्नत उपकरणों से लैस होते हैं और गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए होते हैं जिन्हें अस्पताल पहुंचने से पहले उच्च स्तर की देखभाल की आवश्यकता होती है।
केंद्र सरकार के 17वें कॉमन रिव्यू में पाया गया कि इन एम्बुलेंसों का वितरण भी असमान है। एएलएस एम्बुलेंस की तुलना में बीएलएस वाहन आमतौर पर अधिक संख्या में उपलब्ध हैं। इस समीक्षा में यह भी रेखांकित किया गया कि कई राज्यों में बेड़े पुराने हो रहे हैं, उन्हें बदलने में समय अधिक लग रहा है और उनका रख रखाव भी ढंग से नहीं हो रहा है।
केंद्र सरकार ने सुझाव दिया है कि ALS और BLS एंबुलेंस को जरूरत के हिसाब से सभी क्षेत्रों में समान रूप से तैनात किया जाए, पुरानी एंबुलेंस को बदला जाए, हर चालू एंबुलेंस में प्रशिक्षित इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियन की मौजूदगी सुनिश्चित की जाए और सभी एंबुलेंस को जीपीएस के जरिए रियल-टाइम में ट्रैक किया जाए।
कमियां केवल वाहनों तक सीमित नहीं थीं। समीक्षा में यह भी पाया गया कि प्रशिक्षित इमरजेंसी मेडिकल तकनीशियन (EMT) की भी कमी है और कुछ क्षेत्रों में ड्राइवर पर्याप्त क्लिनिकल सहायता के बिना ही मरीजों को ले जा रहे थे। समीक्षा के अनुसार, राज्यों में जीपीएस-आधारित ट्रैकिंग और केंद्रीकृत निगरानी भी एक समान नहीं थी।
समीक्षा में यह भी पाया गया कि एंबुलेंस की पर्याप्त सुविधा नहीं होने पर मरीजों को निजी वाहनों का सहारा लेना पड़ता है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले के दुर्गम आदिवासी इलाकों में पहाड़ी और कठिन रास्तों के कारण सरकारी एंबुलेंस कई बार समय पर नहीं पहुंच पाती थीं। ऐसे में स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों को आशा कार्यकर्ताओं के लिए पैसे की व्यवस्था करनी पड़ती थी, ताकि वे निजी वाहन किराए पर लेकर मरीजों को अस्पताल पहुंचा सकें।
देश में एम्बुलेंस बाजार की क्या स्थिति है?
देश में एंबुलेंस की कमी का एक ऐसा ही संकेत पूरे एंबुलेंस बाजार में भी दिखाई देता है। कंसल्टेंसी फर्म Primus Partners की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में भारत का एंबुलेंस सेवा बाजार करीब 1.50 अरब डॉलर का था। रिपोर्ट ने अनुमान लगाया था कि 2024 से 2028 के बीच यह बाजार हर साल औसतन 5.12% की दर से बढ़ेगा। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कोरोना महामारी के बाद नए एंबुलेंस के पंजीकरण में कमी आई है।
Primus ने बताया कि 2020 में 7,814 एंबुलेंस का पंजीकरण हुआ था, जो 2021 में बढ़कर 14,236 हो गया। 2021 में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता बढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में एंबुलेंस जोड़ी गई थीं। इसके बाद पंजीकरण घटकर 2022 में 12,737 और 2023 में 11,950 रह गए। चार साल में हर साल औसतन 11,648 एंबुलेंस का पंजीकरण हुआ।
रिपोर्ट के मुताबिक, समस्या सिर्फ एंबुलेंस की संख्या की नहीं है। भारत में कई एंबुलेंस अभी भी मुख्य रूप से मरीजों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए इस्तेमाल होती हैं। इनमें गंभीर मरीजों को तुरंत इलाज देने की पर्याप्त सुविधा नहीं होती। इसलिए ALS एंबुलेंस, प्रशिक्षित इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियन (EMT) और जरूरी उपकरणों की उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह दिल्ली के सत्य निकेतन में बिल्डिंग गिरने की घटना के मद्देनजर पूरे देश में इमारतों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों की जांच करने पर विचार कर रहा है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।
