दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार (6 सितंबर) को एक पांच मंजिला इमारत गिरने से कम से कम सात लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। इस हादसे ने शहर में छात्रावासों की भारी किल्लत को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।

आईआईटी-दिल्ली और एम्स जैसे प्रमुख संस्थान क्रमश: 50% और 70% तक छात्रों को हॉस्टल में जगह दे पाते हैं, जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) का यह आंकड़ा बहुत ही कम है। आईआईटी में भी 22 अगस्त को एमएससी फिजिक्स के एक द्वितीय वर्ष के छात्र की मौत के बाद हफ्तों तक विरोध-प्रदर्शन हुए थे। छात्र के परिवार का आरोप था कि हॉस्टल न मिलने से उसके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा था।

डीयू में हॉस्टल की क्या स्थिति है और यह किस प्रकार उच्च शिक्षा को प्रभावित करता है? आइए इसे समझते हैं।

डीयू में हॉस्टल की कमी

डीयू की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय में 2,10,907 अंडरग्रेजुएट, 34,520 पोस्टग्रेजुएट और पीएचडी तथा 6,047 सर्टिफिकेट/डिप्लोमा के छात्र नामांकित थे। यानी रेगुलर मोड से कुल 2.5 लाख से अधिक छात्र पढ़ाई कर रहे थे।

रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से आधे से अधिक छात्र राज्य से बाहर से आते हैं। बाहर से आने वाले छात्रों की इतनी बड़ी संख्या के बावजूद, विश्वविद्यालय में हॉस्टल की कुल क्षमता सिर्फ 9,000 बेड के आसपास है। यह क्षमता नॉर्थ कैंपस के ग्वायर हॉल जैसे 20 अलग हॉस्टलों कुछ कॉलेजों से संबद्ध हॉस्टलों में बंटी हुई है।

यह हॉस्टल सुविधा भी सभी छात्रों को एक समान उपलब्ध नहीं है। विश्वविद्यालय के कई हॉस्टल विशेष श्रेणियों या पाठ्यक्रमों के लिए आरक्षित हैं: उदाहरण के लिए, अरावली हॉस्टल पीजी और शोध छात्रों के लिए है, जबकि सरामति हॉस्टल मुख्य रूप से पूर्वोत्तर के पीजी छात्रों और साउथ कैंपस के शोध छात्रों के लिए है।

जिन चुनिंदा कॉलेजों में हॉस्टल की सुविधा है, उनमें नॉर्थ कैंपस के दौलत राम कॉलेज, हिंदू कॉलेज, किरोड़ी मल कॉलेज, मिरांडा हाउस, हंसराज कॉलेज, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स और साउथ कैंपस के श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, मैत्रेयी कॉलेज और लेडी श्रीराम कॉलेज शामिल हैं।

हालांकि, ये कॉलेज भी अपने कुल छात्रों के बेहद छोटे हिस्से को ही रहने की जगह दे पाते हैं। उदाहरण के लिए, हंसराज कॉलेज में कुल 5,000 से अधिक छात्र पढ़ते हैं, लेकिन हॉस्टल की सुविधा 250 से भी कम छात्रों को मिल पाती है।

तेजी से बढ़ रहे हैं निजी पीजी (PG)

सत्य निकेतन इलाका श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, मोतीलाल नेहरू कॉलेज, आर्यभट्ट कॉलेज और रामलाल आनंद कॉलेज जैसे संस्थानों से बस कुछ दूरी पर है।

आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज, दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स, जीसस एंड मैरी कॉलेज और मैत्रेयी कॉलेज भी पास में ही स्थित हैं। इनमें से मोतीलाल नेहरू, एआरएसडी, जेएमसी और डीसीएसी के पास अपने हॉस्टल नहीं हैं। इसी वजह से आसपास की इमारतों में निजी पीजी चलाने का चलन तेजी से बढ़ा है। नॉर्थ कैंपस में मुखर्जी नगर और हडसन लेन जैसी जगहें पीजी के मुख्य केंद्र बन चुके हैं।

यूनिवर्सिटी के इतिहास की वजह से नॉर्थ और साउथ कैंपस में यह असमानता देखने को मिलती है। 1922 में स्थापित डीयू का विकास शुरुआत में नॉर्थ कैंपस के आसपास हुआ।

साउथ कैंपस की स्थापना 1973 में हुई और यह 1984 में धौला कुआं के पास अपनी मौजूदा जगह पर शिफ्ट हुआ। छात्रों की पहुंच आसान बनाने के लिए विश्वविद्यालय ने हॉस्टल बनाने के बजाय आवागमन (बस सेवाओं) पर अधिक भरोसा किया। 1970 के दशक में शुरू की गई ‘यू-स्पेशल’ बस सेवा को 2025 में इलेक्ट्रिक बसों के साथ फिर से शुरू किया गया, जो डीयू के अलग-अलग कॉलेजों को जोड़ती हैं।

हाल के वर्षों में, 2022-23 में सीयूईटी लागू होने के बाद बाहर से आने वाले छात्रों के स्वरूप में बदलाव आया है। छात्राओं के दाखिले बढ़ने के साथ ही बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के टियर-2 और टियर-3 शहरों से आने वाले छात्रों की संख्या भी बढ़ी है, जबकि केरल से आने वाले छात्रों में कमी आई है।

कुल 55,000 दाखिलों में बिहार बोर्ड 1,280 दाखिलों के साथ तीसरे नंबर पर रहा। इसके बाद उत्तर प्रदेश बोर्ड (1,222), राजस्थान बोर्ड (765), हरियाणा बोर्ड (436) और मध्य प्रदेश बोर्ड (312) का स्थान रहा।

हॉस्टल मिलना क्यों जरूरी है?

एक सरकारी विश्वविद्यालय होने के नाते डीयू सस्ती शिक्षा देता है, जिससे समाज के हर वर्ग के छात्र यहां आ पाते हैं। लेकिन महंगे किराए और सुरक्षा की चिंताएं कई बार छात्रों के लिए बाधा बन जाती हैं।

आईआईटी गुवाहाटी में समाजशास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर रितुपर्णा पटगिरी के अनुसार, “हॉस्टल मिलने न मिलने का सीधा असर छात्रों की मानसिक स्थिति पर पड़ता है। बाहर से आने वाले छात्रों को अगर हॉस्टल न मिले, तो वे शुरुआत से ही पिछड़ जाते हैं। हॉस्टल न होने पर उन्हें सुरक्षित और किफायती घर खुद ढूंढना पड़ता है, जो उनकी आर्थिक क्षमता पर निर्भर करता है।”

रितुपर्णा बताती हैं कि छात्राओं के लिए नए शहर में अकेले रहना और मुश्किल होता है। कई परिवार सुरक्षा के कारण हॉस्टल के बिना बाहर रहने की अनुमति नहीं देते।

सत्य निकेतन, मुनिरका, महिपालपुर और जीटीबी नगर जैसे इलाके सस्ते हॉस्टल और पीजी के मुख्य केंद्र बन गए हैं। इसके विपरीत, अमीर छात्र चाणक्यपुरी और साउथ एक्सटेंशन जैसी जगहों पर 20,000 रुपये तक किराए पर फ्लैट लेते हैं।

शहरी योजनाकार सुप्तेंदु बिस्वास कहते हैं, “बड़ी समस्या यह है कि छात्रों के रहने की व्यवस्था किसी योजना के तहत नहीं हुई, बल्कि यह सिर्फ व्यावसायिक फायदे और किराए के बढ़ते कारोबार का नतीजा है।”

दुनिया भर के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में छात्रों के रहने की किल्लत से निपटने के लिए कई मॉडल अपनाए जाते हैं। इनमें ‘पर्पस-बिल्ट स्टूडेंट एकोमोडेशन’ (PBSA) मॉडल काफी लोकप्रिय है। इसके तहत इमारतों का निर्माण और संचालन खासतौर पर छात्रों के रहने के लिए किया जाता है, जो सामान्य किराए के मकानों से अलग होते हैं।

ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में यह मॉडल व्यापक रूप से लागू है। उदाहरण के लिए, लंदन में ऐसे मॉडल के तहत 35% कमरे किफायती श्रेणी में रखे जाते हैं और ज्यादातर कमरों को उच्च शिक्षण संस्थानों से औपचारिक रूप से संबद्ध करना अनिवार्य होता है। इसके अलावा परिवहन की पर्याप्त व्यवस्था की जाती है।

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दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार को हुए हादसे के बाद मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता एक्शन मोड में हैं। रविवार को ही करीब 3 घंटे घटनास्थल पर बिताने के बाद मुख्यमंत्री ने हालात का काफी करीब से जायजा लिया। इसके बाद सीएम अस्पताल में घायलों से मिलने भी पहुंची थीं। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।