उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा के आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई हिरासत रद्द कर दी। न्यायालय ने कहा कि हिरासत में रखने के लिए जिन सबूतों और तथ्यों पर भरोसा किया गया, वे रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं थे।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। न्यायालय ने कहा कि अधिकारियों ने ऐसे सबूतों के आधार पर अफरोज को हिरासत में लिया, जिनके आधार पर कानून के तहत किसी व्यक्ति को एहतियातन हिरासत में रखना सही नहीं ठहराया जा सकता था। इनमें पुलिस हिरासत में दिया गया कथित कबूलनामा, अफरोज को उपलब्ध नहीं कराए गए सीसीटीवी फुटेज और कथित फोन मैसेज शामिल थे।
अदालत ने यह भी कहा कि अफरोज के मामले में ‘प्रक्रिया ही सजा बन गई’। इसकी वजह यह थी कि आपराधिक मामलों में जमानत मिलने के बाद भी वह जेल में रहा। पीठ ने कहा कि संविधान में एहतियातन हिरासत का प्रावधान है, लेकिन इसका इस्तेमाल बेहद सावधानी से और केवल ऐसे बहुत दुर्लभ मामलों में होना चाहिए, जहां इसकी वास्तव में जरूरत हो।
क्या है पूरा मामला?
नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद में सर्वेक्षण के दौरान हिंसा भड़क गई थी, जिसमें चार लोगों की मौत हुई थी। यह सर्वेक्षण कोर्ट के आदेश पर हो रहा था।
पुलिस ने अफरोज को इस हिंसा का ‘मुख्य सूत्रधार’ बताया था। हालांकि, पहली एफआईआर में उसका नाम नहीं था। हिंसा के ’54 दिन बाद’ उसे गिरफ्तार किया गया।
पुलिस का दावा था कि हिरासत के दौरान अफरोज ने अपराध कबूल किया था और उसके बयान के आधार पर .32 बोर की एक पिस्तौल बरामद हुई। अफरोज ने इस दावे को गलत बताते हुए कहा था कि पुलिस ने उसे यातना दी और जान से मारने की धमकी देकर यह बयान लिया। सितंबर 2025 में हाई कोर्ट ने उसे एक आपराधिक मामले में जमानत दे दी।
इसके करीब एक महीने बाद संभल के जिलाधिकारी ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 की धारा 3(2) के तहत अफरोज को हिरासत में लेने का आदेश दिया। इस कानून के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के हिरासत में रखा जा सकता है, अगर सरकार को लगता है कि ऐसा करना राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे से बचाने के लिए जरूरी है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने नवंबर 2025 में इस हिरासत को मंजूरी दे दी। जून 2026 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी हिरासत के आदेश को बरकरार रखा। तब तक अफरोज को उसके खिलाफ दर्ज ‘सभी छह आपराधिक मामलों में जमानत’ मिल चुकी थी। इन मामलों में हत्या, दंगा, पुलिसकर्मियों पर हमला, हथियार से जुड़े अपराध और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोप थे। इसके बावजूद वह एनएसए के तहत जेल में था।
इसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उसने कहा कि हिरासत के लिए जिन जरूरी दस्तावेजों और तथ्यों का इस्तेमाल किया गया, वे उसे दिए ही नहीं गए। उसने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने यातना देकर उससे कबूलनामा लिया था।
क्या पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा एनएसए हिरासत का आधार बन सकता है?
उच्चतम न्यायालय के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या अफरोज के कथित कबूलनामे के आधार पर उसे एनएसए के तहत हिरासत में रखा जा सकता है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 23 के मुताबिक, पुलिस अधिकारी के सामने किया गया कबूलनामा आरोपी के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
इसी तरह, पुलिस हिरासत में दिया गया कबूलनामा भी आम तौर पर मान्य नहीं होता, जब तक वह मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में न दिया गया हो। हालांकि, किसी व्यक्ति के बयान का वह हिस्सा इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे किसी तथ्य या वस्तु की बरामदगी होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया कबूलनामा आम तौर पर शक के घेरे में होता है, क्योंकि उसे दबाव, धमकी, लालच या किसी वादे के कारण लिया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि अफरोज ने कबूलनामे के लिए धमकी और यातना के प्रयोग का आरोप लगाया था। राज्य सरकार ने न तो इस आरोप को खारिज किया और न ही अपनी लिखित दलीलों में इसका जवाब दिया। कोर्ट ने कहा कि इस कबूलनामे को किसी भी तरह से स्वेच्छा से दिया गया बयान नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अगर पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा किसी आपराधिक मुकदमे में किसी व्यक्ति को दोषी साबित करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, तो सिर्फ उसी कबूलनामे के आधार पर किसी व्यक्ति को NSA के तहत एहतियातन हिरासत में भी नहीं रखा जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया कबूलनामा, अपने आप में और किसी स्वतंत्र सबूत के बिना, एहतियातन हिरासत का आधार नहीं बन सकता।
संविधान क्या सुरक्षा देता है?
संविधान का अनुच्छेद 22(5) एहतियातन हिरासत में लिए गए व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि उसे हिरासत में रखने की वजह बताई जाए और उसे इसके खिलाफ अपनी बात रखने का उचित मौका मिले।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह अधिकार तभी प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है, जब हिरासत के लिए इस्तेमाल किए गए कारण साफ और प्रासंगिक हों। अदालत ने कहा कि हिरासत का आदेश ऐसे कारण पर आधारित नहीं हो सकता, जिसका मामले से सीधा संबंध न हो।
चूंकि पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा दोष साबित करने के लिए स्वीकार्य नहीं था और उसे स्वेच्छा से दिया गया बयान भी नहीं माना जा सकता था, इसलिए उस पर भरोसा करना अफरोज को संविधान से मिली सुरक्षा को कमजोर करता है।
सीसीटीवी और फोन संदेशों को कोर्ट ने क्यों नहीं माना?
कबूलनामे को पर्याप्त नहीं मानने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह भी देखा कि क्या बाकी सबूतों के आधार पर अफरोज की एनएसए हिरासत को सही ठहराया जा सकता है।
हिरासत के आदेश में सीसीटीवी फुटेज और वीडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर अफरोज को हिंसा का “मुख्य सूत्रधार” बताया गया था। लेकिन यह फुटेज उन 22 दस्तावेजों में शामिल नहीं था, जो अफरोज को दिए गए थे। इतना ही नहीं, यह फुटेज न तो हाई कोर्ट के सामने पेश किया गया और न ही सुप्रीम कोर्ट के सामने।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस सामग्री को हिरासत में लिए गए व्यक्ति को दिया ही नहीं गया और जिसे अदालत के सामने भी पेश नहीं किया गया, उसके आधार पर हिरासत को सही नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि हिंसा के बाद अफरोज को गिरफ्तार करने में 54 दिन क्यों लगे? अगर सीसीटीवी फुटेज में उसे साफ तौर पर पहचाना गया था, तो उसे पहले गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? कोर्ट ने कहा कि इस सवाल का सरकार की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया।
फोन मैसेज पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल
हिरासत के आदेश में अफरोज और एक ऐसे व्यक्ति के बीच कथित बातचीत का भी जिक्र था, जिसने उसे ‘बॉस’ कहा था। अधिकारियों का कहना था कि इससे 2024 की हिंसा के पीछे आपराधिक साजिश का संकेत मिलता है। लेकिन हिरासत के आदेश में यह भी दर्ज था कि उस फोन का डेटा मिट चुका था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिरासत में रखने वाले अधिकारी ने न तो फोन को आधार बनाया और न ही उन संदेशों पर भरोसा किया। इससे कोर्ट के सामने यह गंभीर सवाल खड़ा हुआ कि जिन संदेशों को आधार बनाया जा रहा है, वे वास्तव में मौजूद भी थे या नहीं।
चार्जशीट को भी पर्याप्त सबूत नहीं माना
अधिकारियों ने अफरोज की हिंसा में कथित भूमिका साबित करने के लिए चार्जशीट का भी सहारा लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी पर्याप्त आधार नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट जांच एजेंसी की राय होती है। यह अपने आप में किसी व्यक्ति के अपराध का सबूत नहीं होती। ज्यादा से ज्यादा चार्जशीट किसी व्यक्ति के खिलाफ संदेह दिखा सकती है।
जमानत मिलने के बाद भी जेल में रखना क्यों गलत माना गया?
हिरासत के आदेश में पुलिस की ओर से यह भी कहा गया था कि अगर अफरोज को जमानत पर बाहर आने दिया गया, तो वह फिर हिंसा भड़का सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में एनएसए के तहत हिरासत लेना ऐसा लग सकता है, जैसे अदालत के जमानत देने के आदेश को किसी दूसरे रास्ते से बेअसर करने की कोशिश की गई हो। कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में हिरासत ‘एहतियाती नहीं, बल्कि सजा देने जैसी’ हो जाती है।
पीठ ने कहा कि जब किसी व्यक्ति को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका हो या उसे अदालत से जमानत मिल चुकी हो, तब उसके खिलाफ एहतियातन हिरासत का आदेश बहुत सावधानी से जांचा जाना चाहिए। एहतियातन हिरासत के कानून का इस्तेमाल सिर्फ इसलिए नहीं किया जा सकता कि अदालत से जमानत मिलने के बाद भी किसी व्यक्ति को जेल में रखा जा सके।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कई आपराधिक मामले होना अपने आप में एनएसए के तहत हिरासत का पर्याप्त कारण नहीं है। इसके लिए ठोस और भरोसेमंद सामग्री होनी चाहिए, जिससे यह साबित हो कि इस असाधारण कानून का इस्तेमाल करना जरूरी है।
एहतियाती हिरासत का उपयोग सजा देने के लिए हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अफरोज के मामले में ‘एहतियाती हिरासत और सजा के लिए हिरासत के बीच का अंतर धुंधला हो गया था।’ इसका कारण यह था कि NSA के तहत हिरासत का आदेश उसी घटना और लगभग उन्हीं सबूतों पर आधारित था, जिनका इस्तेमाल उसके खिलाफ आपराधिक मामलों में किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि एक ही घटना और लगभग उसी सामग्री के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला भी चलाया जाए और उसे एहतियातन हिरासत में भी रखा जाए, तो इससे यह बात मजबूत होती है कि हिरासत का मकसद रोकथाम से ज्यादा सजा देना बन गया था।
कोर्ट ने कहा कि एहतियातन हिरासत का मकसद किसी व्यक्ति को उसके ‘किए गए काम के लिए सजा देना नहीं’, बल्कि इस आशंका के आधार पर रोकना है कि वह भविष्य में ऐसा कुछ कर सकता है जिससे खतरा पैदा हो।
चूंकि ऐसी हिरासत में किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आजादी पर गंभीर असर पड़ता है, इसलिए इसका इस्तेमाल केवल ‘बहुत दुर्लभ और गंभीर मामलों’ में ही किया जाना चाहिए।
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