पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पहली बार समुद्र के बढ़ते जलस्तर पर एक घोषणा को मंजूरी दी। इसमें समुद्र के बढ़ते जलस्तर को इंसानों के लिए गंभीर खतरा माना गया है।
घोषणा में उन छोटे और निचले इलाकों वाले देशों की समस्या पर भी बात की गई है, जिन्हें समुद्र का जलस्तर बढ़ने और लगातार तटीय कटाव के कारण अपनी जमीन खोने का खतरा है।
समुद्र का जलस्तर क्यों बढ़ रहा है?
समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी का मतलब है- समुद्र की सतह की औसत ऊंचाई का बढ़ना। इसे पृथ्वी के केंद्र के मुकाबले मापा जाता है। फिलहाल समुद्र का जलस्तर बढ़ने के दो मुख्य कारण हैं।
पहला, ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों और बर्फ की बड़ी चादरों का पिघलना। ग्लेशियर और बर्फ के चादर दोनों ही बर्फ के भंडार होते हैं। ग्लेशियर का आकार बर्फ की चादर के आकार से छोटा होता है। ग्लेशियर आम तौर पर पहाड़ों की घाटियों या ढ़लानों पर स्थित होते हैं, जबकि बर्फ के चादर महाद्वीप के बड़े हिस्से पर फैले होते हैं। बर्फ के चादर 50 हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में फैले होते हैं।
दूसरा कारण समुद्र के पानी का गर्म होना और फैलना। इसे थर्मल एक्सपैंशन कहा जाता है। जैसे-जैसे दुनिया का तापमान बढ़ रहा है, समुद्र भी गर्म हो रहे हैं और गर्म होने के साथ पानी का आयतन बढ़ रहा है। नासा के मुताबिक, दुनिया में समुद्र का जलस्तर जितना बढ़ रहा है, उसमें करीब एक-तिहाई से आधी हिस्सेदारी समुद्र के पानी का इस तरह से फैलना है।
जलस्तर बढ़ने के कारण समुद्र तल से कुछ ही मीटर ऊपर बसे छोटे द्वीपों पर खतरा मंडरा रहा है। तटीय इलाकों में कटाव और बाढ़ का खतरा बढ़ा है। साथ ही खारे पानी के मीठे पानी के स्रोतों में घुसने का खतरा रहता है। इससे घरों, बुनियादी ढांचे और रहने लायक जमीन पर भी खतरा है।
समुद्र का जलस्तर कितनी तेजी से बढ़ रहा है?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ‘स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट 2025’ रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में समुद्र का वैश्विक औसत जलस्तर 2024 के रिकॉर्ड स्तर के करीब ही रहा। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2012 से जलस्तर तेजी से बढ़ा है। यह 1993 से लेकर 2011 की तुलना में कहीं ज्यादा है।
वैश्विक औसत जल स्तर को मापने के लिए उपग्रहों में रडार अल्टीमीटर का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा तटीय इलाकों में लगे ज्वार मापक यंत्रों के जरिए भी इसे मापा जाता है। उपग्रह लगभग पूरी दुनिया के समुद्रों की जानकारी देते हैं, जबकि तटीय इलाकों में लगे ज्वार मापक स्थानीय आंकड़ें उपलब्ध कराते हैं। इन आंकड़ों का इस्तेमाल उपग्रहों से मिले अनुमानों की जांच और उन्हें सही करने के लिए किया जाता है।
एक देश के रूप में इनके अस्तीत्व का क्या होगा?
समुद्र का जलस्तर बढ़ने का कुछ द्वीपीय देशों पर कानूनी असर भी पड़ सकता है। जमीन का एक हिस्सा खोने और उसके रहने लायक न रहने की स्थिति में यह सवाल उठता है कि क्या ऐसे देश भविष्य में भी स्वतंत्र राष्ट्र बने रह सकते हैं।
1933 के मोंटेवीडियो कन्वेंशन के मुताबिक, किसी राज्य या देश की पहचान के लिए चार मुख्य मानदंड माने जाते हैं—स्थायी आबादी, निश्चित भू-भाग, सरकार और दूसरे देशों के साथ संबंध बनाने की क्षमता।
2015 में समुद्र तल से बहुत कम ऊंचाई वाले देश किरिबाती ने कहा था कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव उसके एक राष्ट्र के रूप में अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। इसी तरह 2021 में तुवालु के प्रतिनिधि साइमन कोफे ने COP26 में घुटनों तक समुद्री पानी में खड़े होकर अपना संबोधन दिया था। उन्होंने जिस जगह से यह संबोधन किया, उसके बारे में कहा था कि पहले वहां सूखी जमीन थी, लेकिन तटीय कटाव के कारण अब यह समुद्र में समा गई।
किसी देश की जमीन के रहने लायक न बचने से ‘स्थायी आबादी’ की शर्त को लेकर भी सवाल उठते हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कानून आयोग की 2025 की रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी देश के अस्तित्व के लिए पारंपरिक मानदंड यह स्पष्ट नहीं करते कि जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ने की स्थिति में किसी देश का राज्य का दर्जा किस तरह जारी रहेगा।
समुद्र के बढ़ते जलस्तर पर संयुक्त राष्ट्र की घोषणा में इस मुद्दे को खास तौर पर शामिल किया गया है। इसमें कहा गया है कि किसी देश की जमीन का कुछ हिस्सा समुद्र में डूब जाने का मतलब अपने आप यह नहीं है कि वह देश अपना राज्य का दर्जा भी खो देगा।
घोषणा में समुद्र का जलस्तर बढ़ने के बावजूद ऐसे देशों के राज्य के रूप में बने रहने की बात को मान्यता दी गई है। साथ ही उनके क्षेत्रीय अधिकार, संप्रभु अधिकार और जिम्मेदारियों तथा संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता को भी अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप बरकरार रखने की बात कही गई है।
घोषणा में ऐसे देशों को अंतरराष्ट्रीय मदद देने की अपील की गई है, जिनका भू-भाग समुद्र का जलस्तर बढ़ने से प्रभावित हुआ है। इसमें यह भी कहा गया है कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण जमीन में बदलाव होने के बावजूद देश अपने समुद्री क्षेत्रों को बनाए रख सकते हैं। यह संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के अनुरूप होना चाहिए।
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