मुंबई की सड़कों पर मंगलवार को मातंग समुदाय की बड़ी भीड़ नजर आई। आजाद मैदान से लेकर बीएमसी कार्यालय और छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (CSMT) तक हजारों लोग प्रदर्शन करते नजर आए। वे अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कोटे के भीतर अपने लिए 5 फीसदी आरक्षण की मांग कर रहे थे।
सकल मातंग समाज द्वारा आयोजित इस प्रदर्शन के लिए लोगों को आजाद मैदान में जमा होने की अनुमति मिली थी, लेकिन भीड़ बढ़ने के साथ बड़ी संख्या में लोग बीएमसी कार्यालय और सीएसएमटी के आसपास भी पहुंच गए।
मातंग समुदाय अनुसूचित जाति के लिए तय 13 फीसदी कोटे के भीतर अपने लिए 5 फीसदी अलग आरक्षण की मांग कर रहा है। समुदाय का तर्क है कि एससी आरक्षण का लाभ सभी जातियों तक बराबर नहीं पहुंचा है। महार और चंभार जैसी जातियों को आरक्षण का ज्यादा फायदा मिला है। उनका आरोप है कि इन जातियों ने सरकारी नौकरियों और पढ़ाई की आरक्षित सीटों का बड़ा हिस्सा हासिल कर लिया है।
प्रदर्शनकारी जस्टिस अनंत बदर समिति का हवाला दे रहे थे। उनका कहना था कि बदर समिति ने भी माना था कि अन्य अनुसूचित जातियों के मुकाबले मातंग समुदाय ज्यादा पिछड़ा हुआ है। साथ ही प्रदर्शनकारी उच्चतम न्यायालय के 2024 के फैसले के हवाला दे रहे थे। इस फैसले में न्यायालय ने अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के लिए आरक्षित कोटे के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति दी थी।
आइए समझते हैं कि महाराष्ट्र में अनुसूचित जाति की क्या स्थिति है, बदर समिति क्या है, और न्यायालय का आदेश क्या है?
महाराष्ट्र में अनुसूचित जाति की स्थिति
2011 की जनगणना के अनुसार, महाराष्ट्र में अनुसूचित जाति की कुल आबादी लगभग 1.33 करोड़ है। यह राज्य की कुल जनसंख्या का 11.81 फीसदी है। राज्य में कुल 59 अनुसूचित जातियां अधिसूचित हैं, लेकिन केवल तीन जातियाँ ही अनुसूचित जाति आबादी का 90 फीसदी हैं।
अनुसूचि जाति के भीतर जनसंख्या के हिसाब से सबसे बड़ी जाति महारों की है। वे कुल अनुसूचित जाति का लगभग 60.7 फीसदी हैं। इसके बाद मातंग आते हैं। उनकी आबादी लगभग 18.7 फीसदी है। तीसरी सबसे बड़ी आबादी चंभारों का है। वे कुल आबादी का लगभग 10.6 फीसदी हैं।
मातंग कब से मांग कर रहे हैं?
साल 2000 के आसपास मातंग समाज के नेताओं ने एकजुट होकर तत्कालीन सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया। समुदाय का तर्क था कि जब तक उनके पिछड़ेपन का कोई आधिकारिक और वैज्ञानिक डेटा सामने नहीं आता, तब तक उनके लिए विशेष नीतियां नहीं बनाई जा सकतीं।
2003-04 में उप-वर्गीकरण की मांग को लेकर राज्य भर में बड़े पैमाने पर आंदोलन, धरने और रैलियां आयोजित की गईं। बाद में कांग्रेस और राकांपा गठबंधन सरकार ने मातंग समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का अध्ययन करने और उनके सुधार के लिए सिफारिशें देने के लिए 20 अगस्त 2008 को आधिकारिक तौर पर बाबूराव भास्कर के नेतृत्व में क्रांतिवीर लहुजी सालवे आयोग का गठन किया।
आयोग ने 82 सिफारिशें कीं, जिनमें से राज्य सरकार ने 2011 में सैद्धांतिक रूप से 68 सिफारिशों को मंजूरी दे दी। हालांकि समुदाय का आरोप है कि इन सिफारिशों का जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन नहीं हुआ। इसी आयोग ने अनुसूचित जाति आरक्षण कोटे को चार वर्गों- A, B, C और D में बांटने की सिफारिश की थी।
देश के अन्य हिस्सों में कब से हो रही है मांग?
SC एवं ST के भीतर उप-वर्गीकरण की मांग 1960 के दशक से ही उठ रही थी। पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह की सरकार ने 1975 में एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से उप-वर्गीकरण का प्रयास किया था। उस समय SC श्रेणी के भीतर कुल 50 प्रतिशत आरक्षण दो वर्गों वाल्मीकि और मजहबी सिख के लिए निर्धारित कर दिया।
बाद में आंध्र प्रदेश सरकार ने ‘आंध्र प्रदेश अनुसूचित जाति (आरक्षण का युक्तिकरण) अधिनियम, 2000’ पारित कर SC को 4 उप-समूहों (A, B, C, D) में बांटा गया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में 2004 में आंध्र प्रदेश के कानून को खारिज कर दिया।
न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित अनुसूचित जातियां एक ‘समरूप समूह’ हैं। राज्यों के पास इस सूची के साथ छेड़छाड़ करने या इसके भीतर उप-वर्गीकरण करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।
इस फैसले से पंजाब समेत अन्य राज्यों में लागू उप-वर्गीकरण नीतियां भी कानूनी संकट में आ गईं। इसके बाद हालांकि वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘देविंदर सिंह मामले’ की सुनवाई करते हुए माना कि 2004 के ‘चिन्नैया फैसले’ पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
इसके बाद एक ऐतिहासिक फैसले में 1 अगस्त को 2024 को सुप्रीम कोर्ट की 7-सदस्यीय पीठ ने राज्यों को इस श्रेणी में उप-वर्गीकरण की अनुमति दे दी। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारों को SC और ST के भीतर उप-वर्गीकरण करने का संवैधानिक अधिकार है। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई भी वर्गीकरण मनमाना नहीं हो सकता। ऐसा कोई भी वर्गीकरण पुख्ता आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।
इस फैसले के बाद तेलंगाना ने 2025 में आम्बेडकर जयंति के अवसर पर अधिसूचना जारी कर तेलंगाना अनुसूचित जाति (आरक्षण का युक्तिकरण) अधिनियम, 2025′ को लागू कर दिया। तमिलनाडु और पंजाब में यह पहले से ही लागू था, जो कोर्ट के फैसले के बाद वैध हो गया। इसके अलावा, हरियाणा, बिहार और उत्तर-प्रदेश जैसे राज्य भी इसे लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं और पुख्ता आंकड़ें इकट्ठा करने में लगे हैं।
अनंत बदर समिति
महाराष्ट्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आगे बढ़ते हुए अक्तूबर में अनुसूचित जातियों के आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण के लिए अनंत बदर समिति का गठन किया। इस समिति ने 16 मार्च 2026 को अपनी आधिकारिक रिपोर्ट महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को सौंप दी।
रिपोर्टों के अनुसार, समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया है कि मातंग समुदाय, अनुसूचित जाति वर्ग के भीतर अन्य प्रमुख समूहों (जैसे महार और चंभार) की तुलना में शैक्षणिक और सामाजिक रूप से अधिक हाशिए पर रहा है।
हालांकि महार समुदाय और कुछ अन्य नेता इस रिपोर्ट को पूर्ण से सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं, ताकि इसके वैज्ञानिक आधार को जाना जा सके। महार समुदाय, विशेषकर प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाडी उप-वर्गीकरण की मांगों को खारिज करता रहा है। उनका तर्क है कि उप-वर्गीकरण करने से दलित समाज के भीतर आंतरिक दरार पैदा होगी, आपसी भाईचारा कमजोर होगा और यह बाबासाहेब आम्बेडकर द्वारा दिए गए आरक्षण के मूल ढांचे को कमजोर करने की राजनीतिक साजिश हो सकती है।
उप-वर्गीकरण संबंधी अन्य हालिया मांगें
राजस्थान में भील समुदाय भी अनुसूचित जनजाति के लिए निर्धारित कुल 12 फीसदी आरक्षण में से 9 फीसदी उप-कोटे की मांग कर रहा है। हाल ही में राजस्थान हाई कोर्ट ने एक याचिका के संबंध में राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है।
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महाराष्ट्र के लातूर में रविवार को किसानों ने हैदराबाद-लातूर राजमार्ग के एक हिस्से को ब्लॉक करके अपना विरोध दर्ज कराया। क्रांतिकारी शेतकरी संगठन के बैनर तले किसानों ने राज्य सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और सरकार तक अपनी मांगों को पहुंचाने का प्रयास किया। किसानों ने करीब 2 घंटे राष्ट्रीय राजमार्ग को ब्लॉक रखा। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।
