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काशी विश्‍वनाथ-ज्ञानवापी मस्जिद विवाद: संघ के फोकस में 1959 में आया था Kashi Vishwanath विवाद, जानें इसके बाद की कहानी

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक हिंदू मंदिरों को वापस लेने का मुद्दा 1959 में जब उठा तो उसमें केवल काशी का ही जिक्र था। अयोध्या की कोई चर्चा तब नहीं की गई थी।

काशी विश्‍वनाथ-ज्ञानवापी मस्जिद विवाद: संघ के फोकस में 1959 में आया था Kashi Vishwanath विवाद, जानें इसके बाद की कहानी
मोहन भागवत से मिली सीएम योगी (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेडकर ने हाल ही में कहा था कि काशी की ज्ञानवापी मस्जिद का सच सामने आना चाहिए। संघ के कई हिस्सों से इस बात की मांग उठती रही है कि अयोध्या की तरह से काशी और मथुरा विवाद को भी संघ अपने एजेंडे में शामिल करे। हालांकि ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि संघ के एजेंडे में काशी का पहली बार जिक्र 1959 में पहली बार हुआ था। लेकिन बाबरी विध्वंस के 10 से ज्यादा साल बाद 2003 में काशी, मथुरा और अयोध्या वापस हिंदुओं को सौंपे जाने का प्रस्ताव पास किया गया।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक हिंदू मंदिरों को वापस लेने का मुद्दा 1959 में जब उठा तो उसमें केवल काशी का ही जिक्र था। अयोध्या की कोई चर्चा तब नहीं की गई थी। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में मंदिरों को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों को लेकर प्रस्ताव पास हुआ। 1980 में जब बीजेपी का गठन हुआ तो उसी समय तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम 150 दलित परिवारों को मुसलमान बनाने का मसला भी उठा। संघ इसे लेकर बेहद संजीदा था। 1981 में अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में एक प्रस्ताव पास हुआ कि हिंदुओं को जाति आधारित भेदभाव दूर करने होंगे। इस घटना ने हिंदुओं को लेकर संघ की अप्रोच को बिलकुल बदल दिया।

इस दौर में अशोक सिंघल और विनय कटियार जैसे नाम सामने आए। संघ से निकले ये नेता विश्व हिंदू परिषद बनाकर अयोध्या के मामले पर एकजुट होने लग गए। 1984 में अयोध्या को मुक्त कराने का प्रस्ताव भी पास किया गया। 25 सितंबर 1984 को राम जानकी रथयात्रा की शुरुआत की गई। लेकिन आखिरी लम्हे में ये प्रयास उस समय विफल हो गया जब तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की हत्या की वजह से सारे प्रोग्राम रद्द हो गए। यात्रा के दौरान अयोध्या के साथ काशी मथुरा का भी जिक्र हुआ था। लेकिन उसके बाद अयोध्या आंदोलन तेज हुआ। लेकिन 2003 या उसके बाद कभी भी आधिकारिक तौर पर संघ ने काशी या मथुरा मुद्दे का जिक्र नहीं किया। नेता गाहेबगाहे बयान जरूर देते रहे।

ध्यान रहे कि आरएसएस पर हमेशा आरोप लगता रहा है कि अयोध्या के विवादित बाबरी विध्वंस के पीछे उसका हाथ रहा है। उसने भाजपा के जरिए राममंदिर आंदोलन को हवा दी, जिसका नतीजा छह दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस के रूप में सामने आया। ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा विवाद को हवा देने का आरोप भी संघ पर ही लगता रहा है। संघ के नेता यह मानते हैं कि इस तरह के सवालों के जवाब देना भी एक तरह से उस मुद्दे को स्थापित करने जैसा होता है। लिहाजा संघ रणनीति के तहत इस तरह के विवादित सवालों से खुद को दूर रखने का ही प्रयास करता है। आरएसएस खुद को सांस्कृतिक संगठन बताता है, जिसका कार्य देश में सांस्कृतिक जागरण का काम करना है। इसके लिए वह लगातार प्रयासरत रहता है।

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