ऐसे वक्त में जब भारत और अमेरिका अपने व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए काम कर रहे हैं, वित्त मंत्रालय ने इस सप्ताह संसद में एक विधेयक पेश किया है जो बैंकों और भुगतान प्रणाली प्रदाताओं को यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड से भुगतान के लिए शुल्क लेने की अनुमति देगा।

देखने में तो इन दोनों प्रक्रियाओं का सीधा संबंध नहीं लगता। लेकिन वास्तव में ट्रंप प्रशासन ने अपने अधिकांश व्यापारिक साझेदारों पर लगातार दबाव डाला है कि वे अपने-अपने डिजिटल लेनदेन तंत्र में समान अवसर प्रदान करें।

भारत में यूपीआई लेन-देन अपनी सुविधा और शून्य लेनदेन लागत के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। हालांकि, प्रस्तावित बदलावों के साथ बैंक और भुगतान प्रणाली प्रदाता यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड भुगतानों पर शुल्क लगा सकते हैं और यह शुल्क संभावित रूप से ग्राहकों पर डाला जा सकता है।

वीजा और मास्टरकार्ड के कारोबार में नुकसान

साल 2016 में यूपीआई के लॉन्च के बाद से अमेरिकी भुगतान बाजार मध्यस्थ वीजा और मास्टरकार्ड ने संभावित कारोबार के नुकसान का हवाला दिया है क्योंकि भारत में उपभोक्ता कार्ड का इस्तेमाल करने के बजाय मुफ्त यूपीआई भुगतान की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं।

दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड इनिशिएटिव (GTRI) ने कहा कि कंपनियां यूपीआई और रुपे के लिए शून्य लेनदेन शुल्क, सरकार द्वारा रुपे को बढ़ावा देने और यूपीआई के माध्यम से क्रेडिट कार्ड भुगतान के लिए रुपे की शीघ्र पहुंच पर आपत्ति जता रही हैं। इससे रुपे मजबूत हुआ है और अमेरिकी कार्ड कंपनियों की शुल्क आय में कमी आई है।

इसमें कहा गया है कि दोनों कंपनियां एक ऐसे मॉडल पर काम करती हैं जहां बैंक, भुगतान प्रोसेसर और कार्ड नेटवर्क व्यापारी लेनदेन से शुल्क अर्जित करते हैं। यूपीआई जैसे व्यापक रूप से उपलब्ध, अंतरसंचालनीय और शून्य व्यापारी छूट दर (MDR) वाले प्लेटफॉर्म इस रेवेन्यू को सीमित करते हैं। एमडीआर उन बैंकों द्वारा व्यापारियों पर लगाया जाता है जो भुगतान संसाधित करते हैं ताकि लेनदेन प्रसंस्करण, निपटान और बुनियादी ढांचे की लागत को पूरा किया जा सके।

इसके अलावा, जीटीआरआई ने कहा कि रुपे एक ऐसा भारतीय कार्ड नेटवर्क प्रदान करके उनकी स्थिति को चुनौती देता है जिसे घरेलू नीति उद्देश्यों के साथ निकटता से एकीकृत किया जा सकता है।

अमेरिका के लिए यूपीआई क्यों महत्वपूर्ण है?

मार्च में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने भारत की डिजिटल भुगतान नीतियों को विदेशी कंपनियों के लिए व्यापारिक रुकावट की श्रेणी में रखा था। विभिन्न क्षेत्रों में इस तरह की बाधाएं प्रस्तावित अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के तहत प्रमुख मांगें हैं।

यूएसटीआर ने कहा कि “उसने यूपीआई इकोसिस्टम में भाग लेने में अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक भुगतान सेवा प्रदाताओं की असमर्थता से संबंधित चिंताएं व्यक्त की हैं, जिसमें रुपे के साथ समान स्तर पर यूपीआई पर क्रेडिट लेनदेन शामिल हैं”।

यूएसटीआर ने कहा, “नवंबर 2020 में नेशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने भारत के यूपीआई के माध्यम से किए जाने वाले ऑनलाइन भुगतानों को शुरू करने वाले तृतीय-पक्ष ऐप प्रदाताओं के लिए 30% (लेन-देन के आधार पर) की बाजार हिस्सेदारी सीमा की घोषणा की। हालांकि तृतीय-पक्ष भुगतान ऐप्स के लिए यह बाजार हिस्सेदारी सीमा मूल रूप से जनवरी 2023 तक अनिवार्य की गई थी, लेकिन एनपीसीआई ने इसके कार्यान्वयन को स्थगित कर दिया है, जिसकी वर्तमान समय सीमा दिसंबर 2026 निर्धारित की गई है। 31 दिसंबर 2025 तक, दो अमेरिकी स्वामित्व वाले ईपीए आपूर्तिकर्ताओं ने मिलकर सभी यूपीआई लेनदेन के 80% से अधिक का प्रसंस्करण किया,” । ये आपूर्तिकर्ता वॉलमार्ट समर्थित फोनपे और गूगल पे हैं।

भारत ने व्यापार समझौते के तहत अब तक अमेरिका की कई मांगों (खासकर डिजिटल क्षेत्र में) को मान लिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले केंद्रीय बजट में भारत ने विदेशी कंपनियों को देश में डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए 2047 तक कर छूट की घोषणा की, जो अमेरिका की एक प्रमुख मांग पर कार्रवाई प्रतीत होती है।

सरकार ने पिछले साल टैरिफ के दबाव के बीच 6% ‘गूगल टैक्स’ को समाप्त कर दिया था क्योंकि अमेरिका ने कहा था कि डिजिटल सेवाओं पर कर उसकी तकनीकी कंपनियों – जैसे एप्पल, अमेज़ॅन, गूगल और फेसबुक के खिलाफ हैं।

वित्त मंत्रालय को ईमेल के जरिए भेजे गए प्रश्न का समाचार समय तक कोई उत्तर नहीं मिला।

कांग्रेस पार्टी के संचार प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने गुरुवार (6 अगस्त) को सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि कानून में संशोधन के पीछे असली वजह अमेरिका का दबाव है।

इसके जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि एमडीआर (MDR) केवल व्यापारियों पर लागू होता है, अंतिम उपयोगकर्ताओं/ग्राहकों पर नहीं।

उन्होंने आगे कहा कि इस मामले को अभी अंतिम रूप दिया जाना बाकी है। उन्होंने लिखा, “यह संसद द्वारा कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित होने के बाद होगा, जिसमें भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए में संशोधन का प्रस्ताव है।”

ब्राजील का उदाहरण

भारत एकमात्र ऐसा देश नहीं है जिसकी भुगतान प्रणाली अमेरिका की निगरानी में है।

पिछले महीने, इसने 1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत ब्राजील पर 25% टैरिफ लगाया। यह प्रावधान सरकार को उन देशों की जांच करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने की अनुमति देता है जिनकी आर्थिक प्रथाएं “भेदभावपूर्ण” हैं और अमेरिकी वाणिज्य पर “बोझ” डालती हैं या उसे “प्रतिबंधित” करती हैं।

यह कार्रवाई ब्राजील सरकार के उन उपायों पर आधारित थी, जिनसे कथित तौर पर अमेरिकी कंपनियों को नुकसान होता है। इसमें पिक्स नामक कम लागत वाले, त्वरित भुगतान प्लेटफॉर्म का उपयोग भी शामिल था।

यूएसटीआर ने विदेशी व्यापार बाधाओं पर अपनी रिपोर्ट में कहा, “ब्राजील के केंद्रीय बैंक ने त्वरित भुगतान प्लेटफॉर्म पिक्स की स्थापना की है, और यह उसी के स्वामित्व, संचालन और विनियमन में है। अमेरिकी हितधारकों ने चिंता व्यक्त की है कि ब्राजील का केंद्रीय बैंक पिक्स को तरजीही व्यवहार प्रदान करता है, जिससे अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक भुगतान सेवा प्रदाताओं को नुकसान होता है। केंद्रीय बैंक 500,000 से अधिक खातों वाले वित्तीय संस्थानों के लिए पिक्स का उपयोग अनिवार्य करता है।”

ब्राज़ील के केंद्रीय बैंक, बैंको सेंट्रल डू ब्राजील (बीसीबी) ने 2020 में पिक्स लॉन्च किया। यह यूपीआई से काफी मिलता-जुलता है, क्योंकि इसमें कार्ड या मशीन की आवश्यकता नहीं होती है और क्रेडिट कार्ड के विपरीत, इस पर कोई वार्षिक शुल्क नहीं लगता है। यह अन्य भुगतान विकल्पों की तुलना में मुफ्त या कम दरों पर सेवाएं प्रदान करता है। पिक्स उपयोगकर्ता बिलों का भुगतान कर सकते हैं, लेनदेन शेड्यूल कर सकते हैं और पैसे निकाल सकते हैं।

बीसीबी ने कहा है कि लेन-देन खातों (मांग, बचत और प्रीपेड भुगतान) के बीच धनराशि हस्तांतरित करके, “पिक्स एक ऐसी भुगतान विधि है जिसकी स्वीकृति लागत कम होती है क्योंकि इसका ढांचा कम मध्यस्थों के साथ काम करता है। उपयोगकर्ताओं के लिए भुगतान करने की सुविधा बढ़ाने के अलावा, पिक्स वित्तीय लागत को कम करने, सुरक्षा बढ़ाने, ग्राहक अनुभव को बेहतर बनाने और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देता है।”

इंडोनेशिया और चीन पर आपत्तियां

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अन्य देशों की डिजिटल भुगतान नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं। अपनी रिपोर्ट में USTR ने कहा कि इंडोनेशिया के राष्ट्रीय भुगतान गेटवे (NPG) नियमों के तहत सभी घरेलू खुदरा डेबिट और क्रेडिट कार्ड लेनदेन को केवल इंडोनेशिया में मौजूद स्विचिंग संस्थानों के माध्यम से ही प्रोसेस करना अनिवार्य है।

इस मुद्दे को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों के बीच एक नया समझौता तैयार किया गया है। USTR की रिपोर्ट के अनुसार, पारस्परिक व्यापार समझौते के तहत इंडोनेशिया ने इस बात पर सहमति जताई है कि अमेरिकी कंपनियों द्वारा संचालित अंतरराष्ट्रीय भुगतान नेटवर्क सीमा-पार घरेलू क्रेडिट कार्ड और ई-कॉमर्स लेनदेन की प्रोसेसिंग जारी रख सकेंगे।

इसमें आगे कहा गया है कि इंडोनेशिया ने देश के भीतर डेटा को संसाधित करने की आवश्यकताएं लागू करने से परहेज करने पर सहमति व्यक्त की है, “बशर्ते कि देश के अधिकारियों को नियामक और पर्यवेक्षी उद्देश्यों के लिए, इंडोनेशिया के क्षेत्र के बाहर संसाधित या संग्रहीत जानकारी तक तत्काल, प्रत्यक्ष, पूर्ण और निरंतर पहुंच प्राप्त हो।”

चीन के मामले में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने कहा कि बीजिंग ऐसी नीतियां अपनाए हुए है, जो बाजार में असंतुलन पैदा करती हैं और सरकारी समर्थन प्राप्त कंपनी चाइना यूनियनपे को फायदा पहुंचाती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने घरेलू मुद्रा में होने वाले लेनदेन तक यूनियनपे को विशेष पहुंच दी है, जबकि अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक भुगतान सेवा कंपनियों को लाइसेंस देने की प्रक्रिया में देरी की गई।

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किसी कंपनी को जब नया प्लांट लगाना हो, कारोबार बढ़ाना हो, तो उसे बड़ी रकम की जरूरत पड़ती है। ऐसे में आमतौर पर लोगों को लगता है कि कंपनियां बैंक से लोन लेती होंगी। लेकिन हकीकत यह है कि कई बड़ी कंपनियां बैंक से कर्ज लेने के बजाय बॉन्ड जारी करके निवेशकों से पैसा जुटाती हैं।

आखिर ऐसा क्यों होता है? बॉन्ड मार्केट क्या है, यह कैसे काम करता है। आइए आसान भाषा में समझते हैं…