नेपाल की सत्ताधारी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के प्रमुख रवी लामिछाने ने बुधवार को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। मार्च में नेपाल में सत्ता परिवर्तन के बाद यह भारत और नेपाल के बीच सबसे हाई-लेवल पॉलिटिकल मीटिंग मानी जा रही है। नेपाल में हाल ही में हुए चुनावों में रैपर से राजनेता बने बालेन शाह के नेतृत्व में आरएसपी ने सत्ता हासिल की थी।

जेन जेड युवा आंदोलन की बैकग्राउंड से उभरी इस सरकार के सत्ता में आने के बाद नेपाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। संसद में 40 साल से कम उम्र के सांसदों की संख्या भी काफी बढ़ी है। प्रधानमंत्री बालेन शाह ने पद संभालने के बाद घोषणा की थी कि वह अपने कार्यकाल के पहले एक वर्ष में किसी विदेशी दौरे पर नहीं जाएंगे और केवल अपने समकक्ष राष्ट्राध्यक्षों या सरकार प्रमुखों से ही मुलाकात करेंगे। इसी कारण भारत और नेपाल के बीच हाईलेवल कॉन्टैक्ट सीमित हो गए थे।

कूटनीतिक गतिरोध तोड़ने की कोशिश

बताया जा रहा है कि दोनों देशों के बीच बन रहे कूटनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए भाजपा के निमंत्रण पर रबी लामिछाने भारत आए। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे मुलाकात कर नेपाल को भारत का “प्राथमिक साझेदार” बताया और दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की इच्छा जताई।

लामिछाने ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की। खास बात यह रही कि अमित शाह आमतौर पर विदेशी नेताओं से मुलाकात नहीं करते हैं। लेकिन उन्होंने लामिछाने से मुलाकात की, जो एक स्पष्ट संदेश है कि भारत नेपाल को कितनी अहमियत देता है और आने वाले समय में वो यह चाहता है कि दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध हों।

गौरतलब है कि लामिछाने की यात्रा ऐसे समय हुई है जब कुछ दिन पहले नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत पर नेपाली क्षेत्र में “अतिक्रमण” का आरोप लगाया था और सीमा विवाद के समाधान के लिए चीन और ब्रिटेन की भूमिका की बात कही थी। हालांकि भारत ने इस पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि भारत-नेपाल सीमा विवाद किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से नहीं बल्कि द्विपक्षीय बातचीत से ही सुलझाया जाएगा।

दिलचस्प बात यह रही कि पीएम मोदी से मुलाकात के बाद लामिछाने ने सीमा विवाद का कोई उल्लेख नहीं किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि दोनों नेताओं के बीच एक घंटे तक सकारात्मक और सार्थक चर्चा हुई। उन्होंने “विकास कूटनीति”, डिजिटल कनेक्टिविटी, यूपीआई जैसे पेमेंट मेकानिस्म और बेहतर संपर्क व्यवस्था को दोनों देशों के सहयोग का आधार बताया।

भारत-नेपाल संबंधों में नया अध्याय

नई नेपाली सरकार आर्थिक सुधार, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान केंद्रित कर रही है। ऐसे में भारत ने इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का भरोसा दिया है। भारत सरकार का मानना है कि नेपाल के साथ उसके संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत हैं। इसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है।

भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। करीब 80 लाख नेपाली नागरिक भारत में रहते और काम करते हैं, जबकि लगभग 6 लाख भारतीय नेपाल में निवास करते हैं। नेपाल आने वाले विदेशी पर्यटकों में लगभग 30 प्रतिशत भारतीय होते हैं। दोनों देशों के बीच रेमिटेंस का प्रवाह लगभग 3 अरब अमेरिकी डॉलर (नेपाल से भारत) और 1 अरब अमेरिकी डॉलर (भारत से नेपाल) होने का अनुमान है।

दिल्ली के रोल को लेकर गतिरोध

नई नेपाल सरकार के साथ संबंधों को लेकर भारत के सामने सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती यह है कि नेपाल के कुछ वर्ग अब भी नई दिल्ली को एक “दबंग” या “हावी होने वाली शक्ति” के रूप में देखते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि साल 2015 की कुछ राजनीतिक घटनाओं और बयानों ने नेपाल की बड़ी आबादी को भारत से दूर कर दिया था।

उस समय नेपाल में नए संविधान का मसौदा तैयार किया जा रहा था। भारत ने संविधान में मधेसी समुदाय को पर्याप्त अधिकार नहीं दिए जाने पर आपत्ति जताई थी। मधेसी समुदाय के लोगों के सामाजिक और पारिवारिक संबंध भारत के सीमावर्ती इलाकों से जुड़े हुए हैं। इसी दौरान भारत-नेपाल सीमा पर बिहार के रास्ते कई महीनों तक चला अनौपचारिक अवरोध भी नेपाल में बेहद अलोकप्रिय साबित हुआ और बड़ी संख्या में नेपाली नागरिकों में भारत के प्रति नाराजगी बढ़ी।

हालांकि भारत लगातार यह संदेश देने की कोशिश करता रहा है कि वह नेपाल के लिए “बड़े भाई” (Big Brother) की भूमिका नहीं निभाना चाहता। पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी भारत को नेपाल का “स्नेही बड़े भाई” (Elder Brother) बताया था, न कि ऐसा “बड़ा भाई” जो दूसरे पर दबाव बनाता हो या उसे नियंत्रित करने की कोशिश करता हो। भारत की कोशिश रही है कि दोनों देशों के संबंध बराबरी, सहयोग और पारस्परिक सम्मान के आधार पर आगे बढ़ें।

चीन फैक्टर पर भी नजर

कूटनीतिक गतिरोधों के बीच नेपाल की राजनीति में चीन का प्रभाव बढ़ने की कोशिशों पर भी भारत करीबी नजर बनाए हुए है। खासकर बॉर्डर विवाद को लेकर बढ़ रही टेंशन के बीच भारत काफी सावधानी के कदम बढ़ा रहा है। नेपाल लंबे समय से भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने की नीति अपनाता रहा है। साथ ही अमेरिका भी सक्रिय है और वहां के परिदृश्य का हिस्सा बनने में दिलचस्पी रखता है। ऐसे में नई सरकार की विदेश नीति और चीन के प्रति उसका रुख भारत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को नेपाल के साथ संबंधों में “बड़े भाई” की बजाय “समान भागीदार” की भूमिका निभानी होगी, ताकि दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग और मजबूत हो सके। उसे ध्यान रखना होगा कि यूथ के बीच यह मैसेज ना जाए कि भारत नेपाल पर हावी होने की कोशिश कर रहा है।