पश्चिम एशिया में जारी भारी उथल-पुथल के बावजूद भारतीय निर्यात ने सभी अनुमानों को पीछे छोड़ते हुए जून में बेहतरीन प्रदर्शन किया। इस दौरान देश का ‘वस्तु निर्यात’ 44.24 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। परिवहन मार्गों में बाधा और कच्चे माल के बढ़ते दामों के चलते भाड़े में भारी बढ़ोतरी हुई थी, इसके बावजूद चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में कुल निर्यात में 15% की मजबूत बढ़त दर्ज की गई।

दो-दो युद्धों के बीच निर्यात के इन मजबूत आंकड़ों ने पहली तिमाही में देश की 7.8% की जीडीपी वृद्धि को भी बड़ा सहारा दिया। देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने गैर-तेल और गैर-सोना निर्यात में आई इस तेज़ी को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत को मुक्त व्यापार समझौतों, नए बाज़ारों की खोज और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मकता का सीधा फायदा मिल रहा है।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कुल वस्तु निर्यात 111.57 अरब डॉलर से बढ़कर 129.32 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इस दौरान अगर तेल, रत्न और आभूषणों को अलग कर दें, तो मुख्य क्षेत्रों का निर्यात भी 12% बढ़कर 99.04 अरब डॉलर रहा।

तकनीकी सामानों की मांग तेज़, लेकिन पारंपरिक उद्योग सुस्त

हालांकि, अगर क्षेत्रवार आंकड़ों को देखें तो बढ़त की यह तस्वीर एक समान नहीं है। एक तरफ जहां इंजीनियरिंग उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स और दवाओं जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में क्रमशः 18.1%, 22.6% और 6.8% की अच्छी वृद्धि दिखी, वहीं दूसरी ओर सबसे ज़्यादा रोज़गार देने वाले पारंपरिक उद्योगों में भारी गिरावट दर्ज की गई।

कपड़ा उद्योग का निर्यात 12.4% गिरा, जबकि चमड़ा उद्योग में 4.7% की कमी आई। इसी तरह कम मुनाफ़े वाले उत्पादों जैसे फल-सब्जियों में 10.3%, कांच व सिरामिक्स में 25% और जूट उत्पादों में 13.4% की गिरावट देखी गई। सबसे बुरा असर चाय निर्यात पर पड़ा, जिसमें 17.5% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। कुल 31 में से 11 प्रमुख निर्यात क्षेत्रों को इस तिमाही में नुकसान उठाना पड़ा।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पश्चिम एशिया के तनाव से व्यापार पर चौतरफा असर पड़ा है और बढ़ा हुआ माल भाड़ा सीधे कंपनियों की कमाई को चोट पहुंचा रहा है। महंगे उत्पाद बेचने वाली कंपनियां तो इस झटके को सह गईं, लेकिन कम मुनाफ़े पर काम करने वाले निर्यातकों ने अपनी कमाई छोड़कर बाज़ार में अपनी जगह बचाए रखने को प्राथमिकता दी।

इंडिया रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र कुमार पंत के अनुसार, “लागत बढ़ने से निर्यातकों के सामने मुनाफ़ा बचाने की बड़ी चुनौती है। अगर वे दाम बढ़ाते हैं तो बाज़ार से बाहर होने का डर है और विदेशी खरीदार बढ़ा हुआ दाम देने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में कंपनियों को अपना मुनाफ़ा कम करना पड़ रहा है। यह ऐसी चोट है जो कुल निर्यात के आंकड़ों में नज़र नहीं आती।”

भारतीय चाय निर्यातक संघ के अध्यक्ष अंशुमन कनोड़िया का कहना है कि इस साल चाय निर्यात का भविष्य काफी चिंताजनक दिख रहा है और पश्चिम एशिया के हालात के चलते इसमें 25% तक की बड़ी गिरावट आ सकती है। ईरान, इराक, अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाज़ारों के लिए माल भाड़ा 10 गुना तक बढ़ चुका है और वहां से भुगतान मिलने में भी भारी दिक्कतें आ रही हैं।

कमज़ोर रुपये से निर्यात को सहारा, पर बढ़ा आयात का बिल

विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये में आई गिरावट ने भी भारतीय सामान को दुनिया में प्रतिस्पर्धी बनाने का काम किया है। अमेरिकी शुल्कों और पश्चिम एशिया संकट के कारण विदेशी पूंजी बाहर जाने से पिछले एक साल में रुपया करीब 15% कमज़ोर हुआ है। इससे सूचना प्रौद्योगिकी और दवा जैसे निर्यात-आधारित उद्योगों को फायदा हुआ, लेकिन कच्चा माल बाहर से मंगाने वाली कंपनियों का बजट बिगड़ गया।

भारतीय निर्यात संगठनों के महासंघ के महानिदेशक अजय सहाय के मुताबिक, “रुपया इस वक्त 94 के स्तर पर है, जो निर्यात के लिए काफी मददगार है। पिछले कुछ समय में रुपया जहां 7% टूटा है, वहीं चीन का युआन 8% मजबूत हुआ है। इससे भारतीय निर्यातकों को चीन के मुकाबले 15% की सीधी बढ़त मिल रही है। तकनीक और ज्ञान पर आधारित क्षेत्रों में प्रदर्शन बेहतरीन है, लेकिन पारंपरिक श्रम-प्रधान क्षेत्रों में असर मिला-जुला है।”

दूसरी तरफ, आयात बढ़ने से देश का व्यापार घाटा भी बढ़ा है। पहली तिमाही में कुल आयात 19.89% बढ़कर 216.18 अरब डॉलर हो गया। इसके चलते भारत का चालू खाता घाटा भी बढ़कर 4.2 अरब डॉलर (जीडीपी का 0.5%) हो गया, जो पिछले साल इसी दौरान 3.4 अरब डॉलर (जीडीपी का 0.4%) था।

नए रास्तों की खोज से टला बड़ा नुकसान

भारतीय निर्यातकों की तत्परता और मुक्त व्यापार समझौते वाले देशों से बढ़ी मांग ने संकट के असर को काफी हद तक संभाल लिया। जब संयुक्त अरब अमीरात वाले पारंपरिक रास्ते से आपूर्ति में दिक्कत आई, तो भारतीय कंपनियों ने तुरंत सिंगापुर जैसे नए व्यापारिक केंद्रों का रुख कर लिया।

आंकड़ों से पता चलता है कि पहली तिमाही में सिंगापुर को होने वाला भारतीय निर्यात दोगुना से भी ज़्यादा (101%) बढ़कर 6.5 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जबकि संयुक्त अरब अमीरात को निर्यात 11% घटकर 7.9 अरब डॉलर रह गया। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया (+25.1%) और ब्रिटेन (+11.1%) जैसे सहयोगी देशों को भी भारत ने काफी ज़्यादा सामान बेचा। चीन को भी निर्यात 25% बढ़कर 5.59 अरब डॉलर रहा, हालांकि इसमें तैयार माल के बजाय कच्चा माल ज़्यादा था।

आगे क्या हैं बड़े जोखिम?

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने आगाह किया है कि कच्चे तेल की अनिश्चित कीमतें आगे निर्यात के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं। आपूर्ति रुकने के डर से ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के नीचे टिक नहीं पा रहा है। अमेरिका में डीजल 6 डॉलर प्रति गैलन की तरफ बढ़ रहा है और यूरोप में प्राकृतिक गैस के दाम पिछले साल से काफी ऊपर बने हुए हैं।

नागेश्वरन के अनुसार, “तेल की आपूर्ति में पैदा हुआ व्यवधान अनुमान से ज्यादा समय तक जारी रहने की आशंका है। ऐसे में कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने का खतरा बना हुआ है। यही वजह है कि ब्रेंट क्रूड की कीमतों में बड़ी और लंबे समय तक टिकने वाली गिरावट की संभावना कम है। कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे जाना मुश्किल हो सकता है। लेकिन हमें सिर्फ कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों पर नजर नहीं रखनी चाहिए। डीजल और प्राकृतिक गैस जैसे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें भी महत्वपूर्ण हैं। इनकी कीमतें बढ़ने से लोगों और कारोबार का खर्च बढ़ गया है। इसका असर यूरोप के कुछ हिस्सों और अमेरिका में लोगों के खर्च यानी निजी खपत की वृद्धि पर पड़ सकता है। जो निर्यात को प्रभावित कर सकते हैं।”

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अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर तेज हो गया है। अमेरिका की ओर से नए व्यापारिक प्रतिबंध और टैरिफ लागू किए जाने के बाद चीन ने भी कड़ा जवाब दिया है। बुधवार को बीजिंग ने छह अमेरिकी कंपनियों को अपनी प्रतिबंध सूची (ब्लैकलिस्ट) में डालने के साथ ही अमेरिका को भेजे जाने वाले ड्रोन, उनके अहम पुर्जों और उनसे जुड़ी तकनीक के निर्यात पर सख्त नियंत्रण लगाने की घोषणा की। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।