पिछले कुछ दिनों से देश के तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के कामकाज की जांच-पड़ताल हो रही है। द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर को छपी एक जांच रिपोर्ट से पता चला है कि दो चुनाव आयुक्तों ने 10 माह से कम से कम 14 बार अपनी आपत्ति दर्ज कराई थीं। आयोग ने इस पर जवाब देते हुए कहा कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और टिप्पणियों विचार-विमर्श की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा थीं।

कैसे चुनाव आयोग में होते हैं फैसले?

चुनाव आयोग को अपनी शक्तियां संविधान के आर्टिकल 324 से मिलती है। यह आर्टिकल संसद और हर राज्य की विधानसभा के सभी चुनावों, साथ ही राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के लिए वोटर लिस्ट तैयार करने और चुनाव कराने के काम की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण के लिए एक आयोग का प्रावधान करता है।

आगे कहा गया कि आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और उतनी संख्या में अन्य चुनाव आयुक्त होंगे जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति कानून के प्रावधानों के मुताबिक करेंगे। CEC चुनाव आयोग के अध्यक्ष के तौर पर काम करेंगे।

चुनाव आयोग के कार्यशाली ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) एक्ट, 2023’ में बताया गया है। इस एक्ट की धारा 17 कहती है कि चुनाव आयोग का कामकाज इस एक्ट के प्रावधानों के अनुसार किया जाएगा।

वहीं एक्ट की धारा 18 के मुताबिक, “चुनाव आयोग सर्वसम्मति से अपने कामकाज की प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच कामकाज के बंटवारे को तय कर सकता है। चुनाव आयोग का सारा कामकाज, जहां तक ​​संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाएगा और अगर किसी मामले पर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की राय अलग-अलग होती है, तो उस मामले का फैसला बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा।”

चूंकि अभी चुनाव आयोग में तीन सदस्य हैं, इसलिए अगर फैसले सर्वसम्मति से नहीं होते हैं, तो तीन में से दो सदस्य मामले पर फैसला ले सकते हैं। हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव आयोग की अध्यक्षता करते हैं, लेकिन तीनों सदस्यों CEC और दो EC — के पास एक-एक वोट होता है।

इससे पहले भी आयोग में रहें हैं मतभेद

साल 1993 की बात है जब चुनाव आयोग को स्थायी रूप से एक-सदस्यीय निकाय से तीन-सदस्यीय आयोग में तब्दील कर दिया गया, तब से इन पदों पर रहने वाले अधिकारियों के बीच मतभेद सामने आए हैं।

उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन, चुनाव आयुक्त एम.एस. गिल और जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति के बीच टकराव की खबरें सामने आई थीं। असल में, टीएन शेषन ने सुप्रीम कोर्ट में इन दोनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को चुनौती दी थी, लेकिन कोर्ट ने नियुक्ति को सही ठहराया और फैसला सुनाया कि तीनों सदस्यों का दर्जा बराबर होगा।

साल 1995 में T.N. शेषन बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह साफ हो गया कि फैसले लेने में तीनों सदस्यों की बराबर की भूमिका होगी।

इसके बाद जनवरी 2009 में, तत्कालीन CEC N. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की मांग की थी और इसके लिए राजनीतिक निष्पक्षता की कमी का हवाला दिया था। हालांकि जब राष्ट्रपति भवन की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो नवीन चावला को CEC नियुक्त कर दिया गया।

चुनाव आयोग के अधिकारियों ने कहा कि आयोग के सामने आने वाले मामलों चाहे वे चुनाव कराने से जुड़े हों या प्रशासनिक पर अलग-अलग राय होना एक आम बात है। हालाँकि, जब फैसला लेने की बारी आती है, तो आयोग सर्वसम्मति या बहुमत से फैसले लेता है। अधिकारियों के मुताबिक, आयोग आम तौर पर लंबित मामलों पर चर्चा करने के लिए हफ्ते में एक या दो बार बैठक करता है।

अगर कोई चुनाव आयुक्त बहुमत की राय से सहमत नहीं होता है, तो वह फाइल पर अपनी असहमति दर्ज कर सकता है।

2019 में दिखी थी असहमति

पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने 2019 में ठीक ऐसा ही किया था, जब वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों पर आयोग से क्लीन चिट देने के बहुमत के फैसले से सहमत नहीं थे।

अशोक लवासा ने इस बात पर भी आपत्ति जताई थी कि आयोग के अंतिम आदेशों में उनकी असहमति वाली टिप्पणियों को दर्ज नहीं किया जा रहा था। वरिष्ठता के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त बनने की संभावना रखने वाले अशोक लवासा ने 2020 में आयोग से इस्तीफा देने का फैसला किया।

चुनाव आयोग द्वारा 24 जून 2025 को वोटर लिस्ट के विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision) को शुरू करने का आदेश जारी करने से पहले, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने ड्राफ्ट आदेश पर यह टिप्पणी की थी कि इस प्रक्रिया के कारण मतदाताओं और नागरिकों को परेशानी नहीं होनी चाहिए।

चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने लिखा था, “इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि असली वोटर/नागरिक, खासकर बुजुर्ग, बीमार, दिव्यांग (PwD), गरीब और दूसरे कमजोर वर्गों के लोगों को परेशानी न हो और उन्हें सुविधा मिले।” हालांकि, EC सूत्रों का कहना है कि यह सिर्फ़ एक सुझाव या टिप्पणी थी, और आखिर में SIR का आदेश सर्वसम्मति से लिया गया था।

तब, द इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया है, EC सदस्य सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई बार फाइलों पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं, चाहे मामला चुनाव आयोग के IT इंफ्रास्ट्रक्चर के कामकाज का हो या वोटर एनरोलमेंट फ़ॉर्म (फॉर्म 6) में एक नया डिक्लेरेशन जोड़ने का।

आयोग ने मामले पर क्या कहा?

बुधवार को एक प्रेस बयान में, चुनाव आयोग ने सुझावों या टिप्पणियों (जिन्हें उसने सामान्य और आंतरिक जांच-परख का हिस्सा बताया) और आयोग के फैसलों के बीच अंतर स्पष्ट करने की कोशिश की।

चुनाव आयोग ने कहा, “ड्राफ्ट तैयार होने के दौरान आयोग के सदस्यों की तरफ से कामकाज से जुड़े जो भी सवाल या सुझाव उठाए जाते हैं, वे वोटरों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए अपनाई जाने वाली सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। कमिश्नरों ने जो सुझाव दिए, वे चुनावी प्रक्रियाओं को और बेहतर बनाने के लिए थे। किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां आना सामान्य बात है। ये अंतिम फ़ैसला लेने से पहले निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। चुनावी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए न सिर्फ तीनों कमिश्नर, बल्कि आयोग का हर अधिकारी आयोग को अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह अधिकृत है।”

चुनाव आयोग ने कहा है कि हाल के महीनों में लिए गए सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने तमिलनाडु, बिहार, पुडुचेरी, केरल, असम और पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए चुनावों का जिक्र करते हुए कहा कि इन चुनावों के लिए बड़े पैमाने पर प्रशासनिक और संचालन तंत्र के साथ-साथ आयोग की कई मंजूरियों और निर्देशों की जरूरत थी।

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चुनाव आयोग पर द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद इंडिया गठबंधन की बैठक हो सकती है। इंडिया गठबंधन के सभी दल इसमें शामिल हो सकते हैं। चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ी चिंताओं और अन्य मुद्दों पर चर्चा के लिए 30 सितंबर को इंडिया गठबंधन की बैठक हो सकती है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें