चुनाव आयोग पर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के बाद विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं।

कांग्रेस के सूत्रों ने गुरुवार को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए जल्द ही संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाएगा। एक सूत्र ने कहा, “कानूनी विशेषज्ञों के साथ मिलकर प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है और हम जल्द ही संयुक्त विपक्ष की ओर से दोनों सदनों में नोटिस सौंपेंगे।”

यह कदम उस खुलासे के एक दिन बाद आया है जिसमें बताया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कुछ महीनों में चुनाव आयोग (ECI) के फैसलों और प्रक्रियाओं के खिलाफ आंतरिक रूप से आपत्तियां उठाई थीं। चुनाव आयोग में तीन चुनाव आयुक्त होते हैं। तीनों सदस्यों का महत्व बराबर होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त उनमें पहला होता है, लेकिन वरिष्ठ नहीं। जहां तक संभव हो फैसले तीनों की सहमति से लिए जाने होते हैं।

हम यहाँ यह समझने की कोशिश करेंगे कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है और उनको हटाने की प्रक्रिया क्या है।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है?

चुनाव आयोग को देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग का प्रावधान करता है। इसी अनुच्छेद में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा इस संबंध में बनाए गए किसी कानून के प्रावधानों के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।

संसद ने इस अनुच्छेद के अधीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 पारित की है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और पद से हटाने से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।

अधिनियम के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी। चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्रिमंडल मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता/सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता शामिल होंगे।

अधिनियम के अनुसार, नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों को पहले भारत सरकार में सचिव स्तर के पदों पर होना चाहिए और वे ‘ईमानदार व्यक्ति हों, जिन्हें चुनावों के प्रबंधन और संचालन का ज्ञान तथा अनुभव हो।’

मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल छह साल या 65 वर्ष की उम्र तक होता है, जो भी पहले हो। मुख्य चुनाव आयुक्त को वही सुविधाएं और वित्तीय लाभ मिलते हैं जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को दिए जाते हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से कैसे हटाया जा सकता है?

संविधान का अनुच्छेद 324(5) कहता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से केवल ‘उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है।’

यह भाषा 2023 के अधिनियम की धारा 11(2) में भी पाई जाती है। अनुच्छेद कहता है कि ‘किसी अन्य चुनाव आयुक्त या प्रादेशिक आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना पद से नहीं हटाया जाएगा।’

चुनाव आयोग को राजनीतिक दबावों से बचाने के उद्देश्य से मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का मानक जानबूझकर बहुत ऊंचा रखा गया है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को केवल ‘साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर’ ही हटाया जा सकता है।

कदाचार में कोई भी भ्रष्ट आचरण या पद का दुरुपयोग शामिल हो सकता है। वर्षों से, अदालतों ने इसकी व्याख्या उन कार्यों के रूप में की है जो मुख्य आयुक्त के पद के अनुकूल नहीं हैं या मुख्य आयुक्त द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करने में विफलता हैं। अक्षमता का अर्थ उस स्थिति से है जहां अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो।

मुख्य आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाना होता है। इस प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने आवश्यक हैं। पीठासीन अधिकारी (लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति) के पास प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार होता है। वे प्रस्ताव को खारिज या स्वीकार करने के लिए विशेषज्ञों की सलाह ले सकते हैं।

प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की वैधता की जांच के लिए एक जांच बैठाई जाती है। इसमें कदाचार या अक्षमता के सबूतों की जांच के लिए एक समिति बनाना शामिल है।

इसके बाद हटाने के प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में ‘उपस्थित और मतदान करने वाले’ सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना अनिवार्य है। सफलतापूर्वक पारित होने के बाद, राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का आदेश जारी करते हैं।

क्या भारत में किसी मुख्य चुनाव आयुक्त पर कभी महाभियोग चलाया गया है? इसका जवाब है- नहीं।

तृणमूल कांग्रेस ने अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर 12 मार्च को लोकसभा और राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। इसपर लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे। दोनों प्रस्तावों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का हवाला दिया गया था। साथ ही मुख्य चुनाव आयुक्त की ओर से ‘पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण’ तथा ‘चुनावी धोखाधड़ी व SIR की जांच में बाधा डालने’ का आरोप लगाया गया था।

अप्रैल में, राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए विपक्ष द्वारा दोनों सदनों में दिए गए महाभियोग प्रस्तावों को खारिज कर दिया था। दोनों पीठासीन अधिकारियों ने अपने फैसलों का कोई कारण नहीं बताया था और विपक्षी नेताओं ने इस कदम की आलोचना की थी।

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भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने जून 2025 में बिहार से ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) के तहत वोटर लिस्ट के संशोधन की प्रक्रिया शुरू की। एसआईआर के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।