पश्चिमी एशिया में तनाव के कारण रसोई गैस (एलपीजी)की आपूर्ति में रुकावटें आई हैं। वहीं पिछले 12 महीनों के आंकड़ों के मुताबिक संघर्ष के बाद के 6 महीनों में भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर 50% से अधिक हो गई है, जो युद्ध से 6 महीने पहले लगभग 10% थी।
फरवरी में पश्चिम एशिया में शुरू हुए युद्ध ने भारत के एलपीजी आयात के गणित को बदल दिया है। पहले भारत अपनी जरूरत का अधिकांश एलपीजी संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों से मंगाता था। लेकिन एक विकल्प के रूप में भारत ने अब अमेरिका के ओर रुख किया है, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका से आयात में उछाल आया है।
आंकड़े बताते हैं कि भारत के एलपीजी आयात में पिछले छह महीने में लगभग 40 % की गिरावट भी आई है, क्योंकि इस युद्ध के कारण ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ से जहाजों का निकलना लगभग बंद हो गया है। फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाले इस रास्ते से दुनिया भर के कुल कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) का पांचवां हिस्सा गुजरता है।
अब इस रास्ते से के बंद होने से भारत समेत कई आयातक देशों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। भारत में कच्चे तेल और एलएनजी की आपूर्ति पर असर पड़ा है, लेकिन सबसे बुरा असर एलपीजी (रसोई गैस) की आपूर्ति पर पड़ा है।
भारत अपनी कुल खपत के लिए 88% से ज्यादा कच्चा तेल, 60% एलपीजी और करीब 50% प्राकृतिक गैस के आयात पर निर्भर है। और इस जरूरत का करीब 40% कच्चा तेल, 60% एलएनजी और 90% एलपीजी ‘होर्मुज’ के जरिए ही खाड़ी देशों से मंगाता था। इसका मतलब है कि भारत में इस्तेमाल होने वाली कुल एलपीजी का लगभग 54% हिस्सा इसी रास्ते से होकर आता था।
पश्चिमी एशिया से आपूर्ति घटी है और अमेरिका से आयात बढ़ा है
कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स कंपनी Kpler के विश्लेषण के मुताबिक, मार्च से अगस्त के बीच भारत का कुल एलपीजी आयात उससे पिछले छह महीनों (सितंबर-फरवरी) के मुकाबले 43.1% घटकर 71.4 लाख टन रह गया।
हालांकि, मार्च से अगस्त के दौरान अमेरिका से एलपीजी आयात 281.1% बढ़कर 37.8 लाख टन हो गया। यानी मार्च-अगस्त के दौरान भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 53% रही। इसके मुकाबले सितंबर-फरवरी के दौरान भारत ने अमेरिका से केवल 9.93 लाख टन एलपीजी आयात की थी, जो भारत के कुल एलपीजी आयात का सिर्फ 7.9% था।
युद्ध से पहले भारत सबसे अधिक एलपीजी यूएई (UAE) से मंगाता था। सितंबर से फरवरी के दौरान उसने अपने कुल आयात का 37.8% यूएई से मंगवाया था, हालांकि अगस्त तक के 6 महीनों में यह घटकर 13.4% रह गई। यूएई से आयात में लगभग 79.8% गिरावट आई और यह केवल 9,58,000 टन रह गई। इसी तरह, कतर से होने वाला आयात मार्च-अगस्त में 84.7% गिरकर लगभग 4,05,000 टन रह गया; भारत के एलपीजी आयात में इसकी हिस्सेदारी 21.1% से घटकर महज 5.7% रह गई।
सितंबर-फरवरी में भारत के एलपीजी आयात में 15.1% हिस्सेदारी रखने वाले कुवैत का शेयर मार्च-अगस्त में घटकर 4.9% रह गया। अगस्त तक के 6 महीनों में सऊदी अरब से एलपीजी आयात में गिरावट आई। सितंबर-फरवरी में भारत के एलपीजी आयात में सऊदी की हिस्सेदारी 14.1% थी, जो अगले 6 महीनों में घटकर केवल 5.9% रह गई।
केप्लर के विश्लेषक निखिल दुबे ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया, “अमेरिका से एलपीजी आयात में यह बढ़ोतरी खासतौर पर खाड़ी देशों से आपूर्ति रुकने की वजह से हुई है। अमेरिका दुनिया में एलपीजी का बड़ा आपूर्तिकर्ता है और भारत के लिए यह तुरंत उपलब्ध हो गया। संकट के इस दौर में भी अमेरिकी एलपीजी आसानी से मिल रही है। यह ठीक वैसा ही है जैसे खाड़ी संकट के दौरान रूसी तेल भारत की तरफ आने लगा था।”
होर्मुज का मुद्दा अब भी संवेदनशील बना हुआ है
विशेषज्ञों के मुताबिक, जब तक पश्चिम एशिया से आपूर्ति सामान्य नहीं होती तब तक अमेरिका से एलपीजी आपूर्ति मजबूत बने रहने की उम्मीद है।
अबू धाबी की विश्लेषक नतालिया काटोना ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से कहा, “इस संकट से पहले भी अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा एलपीजी निर्यातक था और युद्ध से पहले भी अमेरिकी गैस एशियाई आपूर्ति से सस्ती थी। जब किल्लत हुई और आसपास कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखा, तो भारत दूर से गैस मंगाने के लिए ज्यादा पैसा देने को भी तैयार हो गया, क्योंकि लोगों के घरों में रसोई गैस पहुंचाना पहली प्राथमिकता थी।”
काटोना का मानना है कि अगर खाड़ी देशों से आपूर्ति में सुधार होता है, तो अमेरिका की हिस्सेदारी कम हो सकती है, हालांकि ‘होर्मुज’ के रास्ते में सुरक्षा की स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।
विशेषज्ञ ने कहा, “अब सबसे दिलचस्प बात 2027 के करारों को लेकर हो रही चर्चा है। खबरों के मुताबिक, सरकार ने इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम से कहा है कि वे अगले साल के एलपीजी आयात का कम से कम 15% हिस्सा अमेरिका के साथ सालाना करारों के जरिए पक्का करें। अभी कुछ भी तय नहीं हुआ है, लेकिन इससे साफ है कि भारत अपनी खरीदारी के रास्तों को अलग-अलग जगह बांटना चाहता है। इसका एक कूटनीतिक पहलू भी है- अमेरिका से ज्यादा ऊर्जा खरीदने से दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते की बातचीत में मदद मिल सकती है।”
पश्चिम एशिया से आपूर्ति रुकने की वजह से भारत को फैक्ट्रियों और व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए एलपीजी की आपूर्ति सीमित करनी पड़ी, ताकि देश के उन करोड़ों परिवारों को गैस मिलती रहे जिनकी रसोई इसी पर चलती है। भारत में 33 करोड़ से ज्यादा परिवारों के पास एलपीजी कनेक्शन हैं। मांग को संभालने के लिए सिलेंडर रिफिल कराने के बीच के जरूरी समय (गैप) को भी बढ़ा दिया गया था। हालांकि इसे फिर से कम करके 25 दिन कर दिया गया है।
इसके अलावा, घरेलू रिफाइनरियों ने आयात में हुए नुकसान की भरपाई के लिए देश के अंदर ही एलपीजी का उत्पादन बढ़ा दिया है और भारतीय कंपनियां दूसरे सुरक्षित इलाकों से एलपीजी जहाजों का लाने का इंतजाम करने में लगी हैं।
घरेलू उत्पादन बढ़ने और अमेरिका जैसे नए रास्तों से आपूर्ति शुरू होने के बाद कुछ आपातकालीन पाबंदियां हटा ली गई हैं। हालांकि, आपूर्ति में आई कमी इतनी बड़ी है कि उसकी पूरी तरह भरपाई होना अभी बाकी है।
भारत की सालाना एलपीजी खपत 3.3 करोड़ टन से थोड़ी ज्यादा है यानी लगभग 90,000 टन रोजाना। लेकिन ‘होर्मुज’ से आवक रुकने के बाद पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा मई में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, देश की एलपीजी खपत घटकर लगभग 80,000 टन प्रतिदिन रह गई है।
यह भी पढ़ें-जून में देश का वस्तु निर्यात तो बढ़ा है, लेकिन व्यापार घाटा भी बढ़ा है…क्या है पूरी तस्वीर?
पश्चिम एशिया में जारी भारी उथल-पुथल के बावजूद भारतीय निर्यात ने सभी अनुमानों को पीछे छोड़ते हुए जून में बेहतरीन प्रदर्शन किया। इस दौरान देश का ‘वस्तु निर्यात’ 44.24 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।
