केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 27 सितंबर को लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) से चलने वाली पहली ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

गुजरात के साबरमती स्टेशन से रवाना हुई यह आठ कोच वाली नॉन-एसी ट्रेन नई नहीं है। इसे पहले से चल रही डीजल इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (डेमू) ट्रेन में बदलाव करके तैयार किया गया है। इसका मतलब है कि यह ट्रेन जरूरत के मुताबिक डीजल और एलएनजी दोनों से चल सकती है।

डीजल की तुलना में एलएनजी के इस्तेमाल से प्रदूषण कम होता है। इसी वजह से रेलवे आगे कुछ और डेमू ट्रेनों में एलएनजी सिस्टम लगाने की योजना बना रहा है। लेकिन यहां सवाल उठता है कि जब रेलवे का लगभग पूरा ब्रॉडगेज नेटवर्क बिजली से चल रहा है, तो एलएनजी से चलने वाली ट्रेनों की जरूरत क्यों पड़ रही है? इन्हें इलेक्ट्रिक इंजन से क्यों नहीं चलाया जा सकता?

इसका जवाब डेमू ट्रेनों की बनावट और उनके इस्तेमाल के तरीके में छिपा है।

क्या होती हैं डेमू ट्रेनें?

भारतीय रेलवे में ज्यादातर ट्रेनें एक अलग और भारी इंजन से चलती हैं। इस इंजन को लोकोमोटिव कहा जाता है। लेकिन डेमू और इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (ईएमयू) ट्रेनें ऐसी नहीं होतीं। इनमें अलग से इंजन नहीं लगाया जाता। इनके चलने और नियंत्रण की व्यवस्था ट्रेन के दोनों सिरों पर बने डिब्बों में ही होती है। इन डिब्बों को ड्राइविंग पावर कार (डीपीसी) कहा जाता है।

डीपीसी के करीब आधे हिस्से में ट्रेन को चलाने वाली मशीनें और पावर पैक होते हैं, जबकि बाकी हिस्से में यात्रियों के बैठने की जगह होती है। ईएमयू ट्रेनों को चलाने के लिए ऊपर लगे बिजली के तारों से बिजली मिलती है। वहीं डेमू में डीजल इंजन बिजली पैदा करता है और इसी से ट्रेन के पहियों को घुमाने वाली इलेक्ट्रिक मोटर चलती हैं।

डेमू ट्रेन की बनावट ऐसी होती है कि इसमें अलग से कोई लोकोमोटिव नहीं जोड़ा जा सकता। इसलिए इसे इलेक्ट्रिक इंजन से खींचकर चलाना संभव नहीं है। इसी वजह से प्रदूषण कम करने के लिए डेमू में एलएनजी और डीजल दोनों से चलने वाली व्यवस्था को एक विकल्प के तौर पर देखा गया है।

हाल ही में रेलवे ने एक डेमू ट्रेन में बदलाव करके हाइड्रोजन ट्रेन भी शुरू की थी। हालांकि वह दो तरह के ईंधन से चलने वाली ट्रेन नहीं है। बड़े स्तर पर हाइड्रोजन ट्रेनों को चलाना फिलहाल मुश्किल माना जाता है, क्योंकि हाइड्रोजन को संभालना और सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल करना आसान नहीं है।

अहमदाबाद रेलवे मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, डेमू को एलएनजी से चलने लायक बनाने में करीब 1.86 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। यह ट्रेन चलते समय करीब 40 फीसदी एलएनजी और 60 फीसदी डीजल का इस्तेमाल करेगी। इसमें ईंधन को नियंत्रित करने के लिए अलग इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, एलएनजी रखने के लिए टैंक, गैस रिसाव का पता लगाने की व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े दूसरे सिस्टम लगाए गए हैं। जरूरत पड़ने पर डीपीसी पूरी तरह डीजल से भी चल सकती है।

रेलवे के लिए यह बदलाव कितना अहम है?

रेलवे में डेमू ट्रेन की शुरुआत 1994 में हुई थी। उस समय इन्हें उन रेल मार्गों पर चलाने के लिए इस्तेमाल किया गया था, जहां बिजली की लाइन नहीं थी। शुरुआती डेमू में 700 हॉर्सपावर की क्षमता थी।

2002 में इंटीग्रल कोच फैक्ट्री ने 1,400 हॉर्सपावर की डेमू ट्रेन विकसित की। इनका इस्तेमाल कम यातायात वाली छोटी रेल लाइनों पर भी किया गया। डेमू ट्रेनों में तेजी से रफ्तार पकड़ने की क्षमता होती है। इसलिए शहरों के बीच चलने वाली तेज यात्री सेवाओं के लिए भी इनका इस्तेमाल किया गया। लेकिन अब रेलवे के सामने नई स्थिति है। रेलवे प्रदूषण कम करने के लिए अपने नेटवर्क का विद्युतीकरण कर रहा है और उसके 99.6 फीसदी नेटवर्क का विद्युतीकरण हो चुका है।

ऐसे में सवाल है कि इन डेमू ट्रेनों का क्या किया जाए?

इन ट्रेनों को अचानक सेवा से हटाना भी आसान नहीं है। इसकी वजह यह है कि इनमें से कई ट्रेनों की काम करने की उम्र अभी बाकी है और वे अभी भी इस्तेमाल के लायक हैं।

अहमदाबाद मंडल के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि रेलवे के पास मौजूद डीजल से चलने वाली ट्रेनें अभी भी जरूरत के समय काम आती हैं। कुछ डीजल से चलने वाली ट्रेनें आपात स्थिति में भी जरूरी होती हैं। उन्होंने कहा कि डेमू को दो तरह के ईंधन से चलने लायक बनाने से इन पुरानी ट्रेनों का इस्तेमाल जारी रखा जा सकता है और डीजल की खपत भी कम की जा सकती है।

अधिकारी के मुताबिक, यह योजना रेलवे के विद्युतीकरण अभियान का विकल्प नहीं है, बल्कि ईंधन के दूसरे विकल्प तैयार करने की दिशा में एक कदम है। ऐसी ट्रेनों और तकनीक को दूसरे देशों में भेजने की संभावना भी हो सकती है।

अहमदाबाद मंडल में मौजूदा अनुबंध के तहत पांच ट्रेनों को दोहरे ईंधन वाली व्यवस्था में बदलने का प्रावधान है। अधिकारी ने बताया कि जिस ट्रेन को एलएनजी और डीजल से चलने लायक बनाया गया है, उसका 2,000 किलोमीटर परीक्षण हुआ है।

यह भी पढ़ें-ट्रेन रद्द होने के बाद भी रेलवे ने नहीं लौटाया पूरा किराया, यात्री ने उठाई आवाज तो उपभोक्ता आयोग ने दिलाए 23 हजार रुपये

वैष्णो देवी यात्रा के लिए टिकट बुक करने वाले एक यात्री को यात्रा रद्द होने के बाद रेलवे से पूरा रिफंड नहीं मिला। अब सोनीपत जिला उपभोक्ता आयोग ने रेलवे बोर्ड को यात्री के 7,350 रुपये वापस करने का आदेश दिया है। आयोग ने रेलवे की सेवा में कमी मानते हुए 5,000 रुपये मुआवजा और 11,000 रुपये मुकदमे का खर्च भी देने का निर्देश दिया है। यानी यात्री को कुल 23,350 रुपये मिलेंगे। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।