नेपाल में आई आपदा के कुछ हफ्तों बाद उत्तराखंड ने अपनी संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की वास्तविक समय में निगरानी की तैयारी तेज कर दी है। अब तक इन झीलों की पहचान और मैपिंग की जा रही थी, लेकिन मंगलवार से चमोली के वसुंधरा ताल में राज्य की पहली शुरुआती चेतावनी प्रणाली लगाने का काम शुरू हो गया है।

रुड़की स्थित केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई) और देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के विशेषज्ञों की एक वैज्ञानिक और तकनीकी टीम मंगलवार को वासुंधरा ताल के लिए रवाना हुई। यह अभियान 29 सितंबर से 15 अक्टूबर तक चलेगा। राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) भी इस अभियान में सहयोग कर रहे हैं।

मुख्य सचिव आनंद बर्धन ने मंगलवार को टीम को रवाना किया। उन्होंने कहा कि इस पहल से ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ) के खतरे को कम करने में मदद मिलेगी। उनके मुताबिक, आने वाले वर्षों में जीएलओएफ के खतरे को समझने और उसे कम करने की दिशा में यह पहल अहम साबित होगी।

अगस्त में नेपाल की ल्हेंदे खोला और भोटे कोशी नदी प्रणाली में भीषण बाढ़ आई थी। शुरुआत में इसकी वजह संभावित भूकंप को माना गया था। लेकिन बाद में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अध्ययन में पता चला कि इसकी वजह भूकंप नहीं था। ग्लेशियर के टूटने और मलबे के बहाव से यह आपदा आई थी। इसमें सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी और सड़कें, पुल तथा घर बह गए थे।

इससे एक साल पहले उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले की धराली में भी विनाशकारी बाढ़ आई थी। कुछ विशेषज्ञों ने आशंका जताई थी कि इसकी वजह ग्लेशियर झील का फटना था। वहीं, कुछ अन्य विशेषज्ञों ने बारिश और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं को इसकी वजह बताया था। हिमस्खलन या भूस्खलन की संभावना से भी इनकार नहीं किया गया था। हालांकि, इस बाढ़ की सही वजह अब तक साफ नहीं हो पाई है।

इसी पृष्ठभूमि में उत्तराखंड ने इस साल ग्लेशियर झीलों की निगरानी की अपनी पहल की शुरुआत वसुंधरा ताल से की है।

सर्वेक्षण से सेंसर तक

जनवरी 2025 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने बताया था कि उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) राज्य की ग्लेशियर झीलों का अध्ययन और नियमित निगरानी करने के लिए एक व्यापक योजना तैयार कर रहा है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने उत्तराखंड में 13 ऐसी ग्लेशियर झीलों की पहचान की थी, जिनसे ज्यादा खतरा हो सकता है। इनमें पांच झीलों को सबसे ज्यादा जोखिम वाली श्रेणी यानी श्रेणी-1 में रखा गया था। वसुंधरा ताल भी इन पांच झीलों में शामिल है।

उस समय यूएसडीएमए के अधिकारियों ने बताया था कि सबसे पहले इन झीलों की भौतिक स्थिति का अध्ययन किया जाएगा। इसके तहत झील की लंबाई, चौड़ाई और गहराई मापी जाएगी। आसपास के इलाके और झील से नीचे की ओर पानी के बहाव का भी आकलन किया जाएगा। इसके बाद झीलों पर ऐसे उपकरण लगाए जाएंगे, जिनसे उनकी वास्तविक समय में निगरानी की जा सके। अब इसी अगले चरण की शुरुआत हो रही है।

सरकार के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) ने 2023 में उत्तराखंड में 344 ग्लेशियर झीलों की पहचान की थी। इनमें से 13 सबसे ज्यादा जोखिम वाली झीलों में छह पिथौरागढ़, चार चमोली और एक-एक बागेश्वर, टिहरी गढ़वाल और उत्तरकाशी में हैं।

छह झीलों का गहराई और पानी की क्षमता से जुड़ा सर्वेक्षण पहले ही पूरा हो चुका है। इनमें चमोली की सरस्वती ताल और वसुंधरा ताल, उत्तरकाशी की केदारताल और पिथौरागढ़ की दारमा घाटी की माबांग, प्युनग्रू और स्यूंक्ति यांक्ति झीलें शामिल हैं।

इन सर्वेक्षणों से झील की गहराई और उसमें कितना पानी जमा हो सकता है, इसका पता चलता है। इस जानकारी के आधार पर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि ग्लेशियल झील के फटने पर आने वाली बाढ़ कितनी बड़ी हो सकती है।

वसुंधरा ताल में क्या-क्या देखा जाएगा

वसुंधरा तल में लगाई जा रही प्रणाली झील के पानी का स्तर, मौसम, बर्फ की स्थिति और पानी के बहाव पर नजर रखेगी। झील के आसपास होने वाली हलचल को भी इससे दर्ज किया जाएगा।

पानी के स्तर को मापने वाला सेंसर झील में पानी के उतार-चढ़ाव पर नजर रखेगा। अगर पानी के स्तर में अचानक कोई बदलाव होता है, तो सेंसर उसका भी पता लगाएगा।

एक स्वचालित मौसम केंद्र तापमान, नमी और बारिश का रिकॉर्ड रखेगा। यह हवा की गति और दिशा, वायुमंडलीय दबाव और रोशनी की तीव्रता भी मापेगा।

बर्फ की मोटाई और जमीन के नीचे के तापमान में होने वाले बदलावों पर नजर रखने के लिए भी सेंसर लगाए जाएंगे। इनसे बर्फ की स्थिति में होने वाले बदलावों का पता चलेगा।

कुछ जगहों पर झुकाव और कंपन मापने वाले सेंसर लगाए जाएंगे। ये आसपास होने वाली हलचल और कंपन का पता लगाएंगे। वहीं, पानी के बहाव को मापने वाला सेंसर झील से निकलने वाले पानी की मात्रा में होने वाले बदलावों को दर्ज करेगा।

सभी उपकरण सौर ऊर्जा से चलेंगे। यह इलाका काफी ऊंचाई पर है और यहां मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन उपकरणों से मिलने वाला डेटा सैटेलाइट के जरिए भेजा जाएगा।

एक डेटा रिकॉर्डर सेंसर से मिलने वाली सभी जानकारियों को दर्ज करेगा। वहीं, निगरानी डैशबोर्ड के जरिए इन आंकड़ों पर नजर रखी जा सकेगी। अगर किसी भी माप में तय सीमा से ज्यादा बदलाव होता है, तो सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी करेगा।

राज्य सरकार के मुताबिक, इस व्यवस्था से वसुंधरा ताल और उसके आसपास पर्यावरण तथा पानी से जुड़े बदलावों पर लगातार नजर रखी जा सकेगी। इससे किसी असामान्य बदलाव का समय रहते पता लगाने में मदद मिलेगी।

हालांकि, चुनौती सिर्फ ग्लेशियर झील में होने वाले बदलाव का पता लगाने तक सीमित नहीं है। असली चुनौती यह है कि खतरे की जानकारी समय रहते उन लोगों तक पहुंचाई जाए, जो बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं।

सरकार ने ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में टीम का यूएसडीएमए से संपर्क बनाए रखने के लिए सैटेलाइट फोन और लो-अर्थ ऑर्बिट संचार उपकरण भी उपलब्ध कराए हैं।

आपदा प्रबंधन और पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन ने कहा कि राज्य सरकार ग्लेशियर झीलों की वैज्ञानिक निगरानी को मजबूत कर रही है। साथ ही, ऐसी बाढ़ से निपटने की तैयारी भी की जा रही है। जीएलओएफ की वजह से नीचे बसे इलाकों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंच सकता है।

सुमन ने कहा कि राज्य सरकार का मकसद वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर खतरों की पहचान करना है। इसके साथ ही प्रभावित इलाकों में जरूरी सुरक्षा और बचाव के इंतजाम समय पर करना भी सरकार का लक्ष्य है।

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उत्तराखंड में भारत-चीन सीमा पर जोशीमठ स्थित नीति घाटी में शुक्रवार देर रात ग्लेशियर फट गया। इसके बाद सेना ने मोर्चा संभालते हुए रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। बताया गया है कि हादसे में कम से कम 8 लोगों की जान गई है, वहीं  सेना ने क्षेत्र में सड़क बनाने का काम कर रहे बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के कैंप से करीब 400 लोगों को बचाया गया है। सूबे के सीएम तीरथ सिंह रावत इसे लेकर एक अलर्ट भी जारी किया है। अब तक मिली जानकारी के मुताबिक, जोशीमठ में खराब मौसम होने की वजह से आगे कोई भी अभियान चलाने में देरी हो रही है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।