पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी फिल्म सतलुज को लेकर काफी विवाद हो रहा है। इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 से अचानक हटा दिया गया। खालड़ा की बेटी नवकिरण कौर खालड़ा ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि जब उनके पिता का अपहरण हुआ तब पूरे पंजाब में फर्जी मुठभेड़ और लोगों के गुमशुदा होने की घटनाएं हो रही थी।
अमेरिका में बतौर इंजीनियर काम करने वालीं नवकिरण ने बताया कि उस वक्त पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाने वाले लोग बहुत कम थे।
ओटीटी प्लेटफॉर्म से सतलुज को हटाने के बाद एक नई बहस फिर से शुरू हो गई है कि क्या पंजाब को उग्रवाद के उन सालों को याद रखना चाहिए? कुछ लोगों का कहना है कि उस दौर को अगर फिर से याद किया गया तो पुराने जख्म हरे हो सकते हैं जबकि कुछ का कहना है इसे लेकर चुप नहीं रहना चाहिए।
खालिस्तान आंदोलन के दौरान पंजाब में पुलिस की कार्रवाई के दौरान हजारों लोग मारे गए या फिर लापता हो गए। जसवंत सिंह खालड़ा ने ऐसे लावारिस शवों की गिनती का काम शुरू किया जिनके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी।
6 सितंबर, 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा का अमृतसर में उनके घर के बाहर से उस वक्त अपहरण कर लिया गया, जब वह अपनी कार धो रहे थे। उसके बाद उनका कोई पता नहीं चला लेकिन अभी भी पंजाब में खालड़ा के नाम की चर्चा होती है और उनके द्वारा जुटाए गए सबूतों को अदालत में रखा जाता है।
आजादी के आंदोलन से जुड़ा था परिवार
पंजाब के बॉर्डर वाले जिले तरनतारन के खालड़ा गांव में पैदा हुए जसवंत सिंह को लोग ‘जस’ नाम से जानते थे। उनका परिवार स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ था। जसवंत सिंह के दादा गदर आंदोलन से जुड़े थे। गदर आंदोलन ब्रिटिश शासन को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए शुरू किया गया था।
खालड़ा के पिता भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई महीने जेल में रहे थे।
भारत की आजादी के बाद उनके परिवार ने गांव में स्कूल खोला। जसवंत सिंह का पूरा नाम जसवंत सिंह संधू था लेकिन गांव का नाम खालड़ा था इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में गांव का नाम जोड़ दिया। जसवंत सिंह खालड़ा के भतीजे हमनदीप सिंह उस वक्त सिर्फ 16 साल के थे, जब खालड़ा का अपहरण हुआ था। हमनदीप सिंह अमृतसर में खालड़ा मिशन संगठन के प्रमुख हैं। वह बताते हैं कि उनके चाचा मदद मांगने वाले किसी व्यक्ति को मना नहीं कर पाते थे और उन्हें लगता था कि मांग सही है तो वह हमेशा उनके लिए खड़े होते थे।
नौजवान भारत सभा को किया सक्रिय
खालड़ा ने क्रांतिकारी साहित्य को पढ़ने के साथ ही साहिल लुधियानवी के गीत और सत्यजीत रे की फिल्में देखी और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौजवान भारत सभा को फिर से सक्रिय किया। नौजवान भारत सभा की स्थापना भगत सिंह ने 1926 में की थी। तब तक जसवंत सिंह खालड़ा छात्रों को बस किराए में रियायत देने को लेकर आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए जेल जा चुके थे।
1960 का दशक पंजाब में काफी उथल-पुथल वाला था। युवाओं का रुझान नक्सलवादी आंदोलन की ओर बढ़ रहा था तो कुछ छात्र भी वामपंथी विचारधारा की ओर आकर्षित होने लगे थे। उस दौरान खालड़ा ने मुठभेड़ों में मारे गए नौजवानों के नाम इकट्ठा किए और 1973 में पहली मानवाधिकार रिपोर्ट को लोगों के सामने रखा। इस दौरान एक्टिविस्ट राजीव सिंह रंधावा भी उनके संपर्क में आए।
किसानों के मुद्दे को लेकर पहुंचे दिल्ली
1981 में जसवंत सिंह खालड़ा की शादी परमजीत कौर से हुई और उसके बाद यह दंपति अमृतसर में बस गया। परमजीत कौर अमृतसर की गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में लाइब्रेरियन थीं। 1986 में जब भारत-पाकिस्तान की सीमा पर बाढ़ लगाई गई तो कई किसानों की जमीन चली गई। खालड़ा ने इस मुद्दे को उठाया और किसानों के लिए मुआवजे की मांग करते हुए दिल्ली तक यात्रा की। खालड़ा गांवों से लेकर विरोध प्रदर्शन वाली जगहों और सरकारी दफ्तरों के बीच सक्रिय रहे।
जून, 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ। इस दौरान जसवंत सिंह अपने ससुराल में थे। पंजाब में कर्फ्यू लगा था लेकिन जसवंत सिंह ने एक मोटरसाइकिल का इंतजाम किया और अपने गांव पहुंच गए। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पंजाब का माहौल बहुत ज्यादा बदल गया। नागरिकों से जुड़े संगठन और जांच करने वाली टीमें पंजाब पहुंचीं और उन्होंने खालड़ा से संपर्क किया।
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के संस्थापक अध्यक्ष न्यायमूर्ति वीएम तारकुंडे खालड़ा को अमृतसर के आसपास के गांवों में ले गए ताकि लोगों की गवाही दर्ज की जा सके। खालड़ा ने कोलकाता के फ्रंटियर अखबार के लिए उग्रवादियों और पुलिस के बीच फंस रहे आम लोगों की मुश्किलों को लेकर लिखना शुरू किया।
भूख हड़ताल पर बैठ गए थे खालड़ा
1986 में पंजाब में जब हिंदू यात्रियों को एक बस से निकालकर उनकी हत्या कर दी गई तब खालड़ा भूख हड़ताल पर बैठ गए थे। राजीव सिंह रंधावा बताते हैं कि खालड़ा का मानना था कि उग्रवादियों को निर्दोष लोगों की जान लेने का कोई हक नहीं है। पंजाब के अनुभवी पत्रकार मोटा सिंह बताते हैं कि लगभग हर पत्रकार खालड़ा को जानता था। वह गहरे नीले रंग की पगड़ी पहनते थे और अपनी मुस्कान की वजह से जहां भी जाते थे, लोगों को दोस्त बना लेते थे।
खालड़ा का परिवार अच्छी स्थिति में था, भाई विदेश में थे और बहनों का भी जीवन अच्छा चल रहा था लेकिन ऐसे वक्त में खालड़ा ने आराम के बजाय जीवन में मुश्किल मिशन को चुना।
1990 के दशक की शुरुआत में पंजाब में सिर उठा रहे उग्रवाद को डीजीपी केपीएस गिल ने कुचल दिया था लेकिन उन पर काफी गंभीर आरोप भी लगे थे।
क्या परिवार अंतिम संस्कार कर दे?
रंधावा बताते हैं कि 1992 में जब अमृतसर सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के निदेशक पियारा सिंह लापता हुए तो इसे लेकर खालड़ा पुलिस थाने में जाकर सवाल पूछते थे- क्या परिवार उनका अंतिम संस्कार कर दे? लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद खालड़ा ने मारे गए लोगों की गिनती का काम शुरू किया।
इस दौरान एक छोटा सा ग्रुप बनाया गया जिसमें खालड़ा के अलावा पंजाब मानवाधिकार संगठन के अध्यक्ष जसपाल सिंह ढिल्लों, सामाजिक कार्यकर्ता अमरीक सिंह मुक्तसर, वकील नवकिरण सिंह और बलजिंदर सोढ़ी, आंध्र प्रदेश के मानवाधिकार कार्यकर्ता राम नारायण कुमार शामिल थे। राजनीतिक सुरक्षा लेने के लिए उन्होंने शिरोमणि अकाली दल से उसकी मानवाधिकार शाखा शुरू करने को कहा। ढिल्लों इसके अध्यक्ष और खालड़ा महासचिव बने।
नवंबर, 1994 में ढिल्लों और खालड़ा अमृतसर के दुर्गियाना मंदिर श्मशान घाट गए। वहां उन्होंने अफसर बनकर श्मशान घाट के केयरटेकर से बातचीत की। जैसे ही केयरटेकर पानी पीने के लिए गया, खालड़ा और ढिल्लों के एक साथी ने श्मशान रजिस्टर की फोटोकॉपी कर ली और इसे पढ़ने के बाद वे हैरान रह गए। इसमें सभी पन्नों पर पंजाब पुलिस द्वारा लाए गए ‘लावारिस’ शवों के अंतिम संस्कार का रिकॉर्ड दर्ज था। इसके एक महीने बाद वे पट्टी इलाके में स्थित श्मशान घाट भी गए। यहां खालड़ा ने श्मशान घाट के रजिस्टरों का मिलान नगर पालिका के रिकॉर्ड्स से किया। इससे शवों की संख्या का पता भी चला और उन पुलिस अफसरों के नाम भी सामने आए जो शवों को अंतिम संस्कार के लिए लेकर आए थे।
2,000 से ज्यादा लाशों को चुपचाप जला देने का आरोप
जनवरी, 1995 में खालड़ा ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की। इसमें उन्होंने लोगों के नाम, घटना की तारीख और जलाऊ लकड़ी की खरीद से जुड़े रजिस्टर, नगर निगम लॉगबुक और श्मशान घाट के रिकॉर्ड के प्रमाण रखे।
खालड़ा का दावा था कि 1984 से 1994 के बीच पंजाब पुलिस ने अमृतसर जिले के केवल तीन श्मशान घाटों- दुर्गियाना मंदिर, तरन तारन और पट्टी में 2,000 से ज्यादा लाशों को चुपचाप ‘अज्ञात’ या ‘लावारिस’ बताकर जला दिया था। बाद में सीबीआई ने उनकी इस बात को सही बताया था। इसके बाद खालड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई लेकिन पुलिसकर्मियों ने उनके दस्तावेजों को जब्त कर लिया। खालड़ा और उनके साथियों ने चंडीगढ़ पहुंचकर मीडिया को इस बारे में बताया।
खालड़ा को इस काम के लिए जैसे-जैसे पहचान मिली, उनके दुश्मन भी बढ़ते गए। तरनतारन के तत्कालीन एसपी अजीत सिंह संधू ने उन पर आरोप लगाए। खालड़ा ने भी उन्हें पुरजोर जवाब दिया। 6 सितंबर, 1995 की सुबह खालड़ा के बेटे नवकिरण और बेटे जनमीत स्कूल गए थे। खालड़ा घर के बाहर अपनी कार धो रहे थे।
घर के भीतर राजीव सिंह रंधावा इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार मनदीप सिंह का इंतजार कर रहे थे। तभी एक नीली मारुति वैन आकर वहां रुकी और कुछ लोग सादे कपड़ों में गाड़ी से बाहर निकले। रंधावा बताते हैं, “आवाज सुनकर मैं बाहर भागा। तब तक वे भाईजी (खालड़ा) को वैन में बिठा चुके थे।” रंधावा और परमजीत कौर ने उनकी खोज में कई पुलिस स्टेशनों की खाक छानी। दो दिन बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और कहा कि उग्रवादियों ने खालड़ा का अपहरण कर लिया।
जब जसपाल सिंह ढिल्लों को इस बात का पता चला तो वह अमृतसर गए और वहां डीआईजी (बार्डर रेंज) ने उनसे कहा कि वह एसपी संधू से बात करें। ढिल्लों संधू के पास पहुंचे और खालड़ा के बारे में पूछा। ढिल्लों बताते हैं कि संधू ने उन्हें कुछ नहीं बताया। ढिल्लों ने संधू से कहा कि मैं तुम्हारी हड्डियों से भी उसे निकाल लाऊंगा।
ढिल्लों शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के तत्कालीन अध्यक्ष गुरुचरण सिंह टोहड़ा के पास पहुंचे। टोहड़ा उन्हें लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री हरचरण सिंह बराड़ के पास गए। ढिल्लों बताते हैं कि जब टोहड़ा ने खालड़ा के बारे में पूछा तो मुख्यमंत्री बराड़ ने कहा, “प्रधान जी, बहुत देर हो चुकी है। नुकसान हो चुका है।”
कुलदीप सिंह ने दी खालड़ा की हत्या की गवाही
परमजीत कौर ने अपने पति की तलाश में बहुत खोजबीन की और कई नेताओं के पास भी गईं। मई, 1996 की एक शाम को द इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार सतिंदर बैंस के घर पर एक पुलिसकर्मी कुलदीप सिंह किसी पंजाबी पत्रकार के साथ आया था। कुलदीप सिंह ने बताया कि वह खालड़ा को किए गए टॉर्चर और उनकी हत्या का गवाह है।
कुलदीप सिंह ने बताया कि शव को ठिकाने लगाने के लिए जो गाड़ी इस्तेमाल की गई, वह उसी ने चलाई थी। कुलदीप सिंह ने बताया कि खालड़ा के शव को अमृतसर से 40 किलोमीटर दूर हरिके में फेंक दिया था।
कुलदीप सिंह ने यह बयान सीबीआई की अदालत में भी दिया था और इसके बाद यह मामला अपहरण का नहीं बल्कि हत्या का बन गया। बाद में कुलदीप सिंह की भी उसके गांव के पास हत्या हो गई। यह हत्या किसने की, इसका आज तक कोई पता नहीं चला। इस मामले में कई सालों तक अदालत में कानूनी जंग चलती रही।
सितंबर, 1995 में परमजीत कौर और एसजीपीसी के अध्यक्ष टोहड़ा के एक टेलीग्राम संदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया। जांच में पता चला कि पंजाब पुलिस ने खालड़ा का अपहरण किया और उनकी हत्या कर दी। इसके बाद उनके शव को ठिकाने लगा दिया गया हालांकि उनका शव कभी नहीं मिला लेकिन सीबीआई की जांच के आधार पर कई पुलिस अफसरों पर मुकदमा चला।
1997 में एसएसपी अजीत सिंह संधू पैरोल पर रिहा हो गए लेकिन उसने आत्महत्या कर ली। साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पांच पुलिसकर्मियों को सुनाई गई उम्र कैद की सजा को बरकरार रखा।
परमजीत कौर और उनके बच्चों को इस बात का भरोसा है कि जसवंत सिंह खालड़ा के द्वारा सामने लाए गए दस्तावेज ऐसे हजारों लोग जिन्हें गुमनाम मान लिया गया था, वे इतिहास से गायब नहीं होंगे।
यह भी पढ़ें- पंजाब का दर्द बताती है फिल्म सतलुज
फिल्म “सतलुज” के रिलीज होने और OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटाए जाने के महज दो दिनों के भीतर ही पंजाब के उग्रवाद के काले दौर पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।
