यूरोप के कई देशों में रविवार को तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। 20 जून से यूरोप में गर्मी ने रफ्तार पकड़ी है और अकेले फ्रांस में ही 1000 अतिरिक्त मौत हो चुकी है। हीट वेव से यूरोप में 15 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हैं। इसकी वजह से बिजली के उत्पादन और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ा है। बुनियादी ढांचे को नुकसान हुआ है।

वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन के अध्ययन के मुताबिक, अगर इंसानी गतिविधियों की वजह से जलवायु परिवर्तन नहीं हुआ होता तो इतनी भयंकर हीट वेव नहीं आ सकती थी। इस बीच, एक बड़ी राजनीतिक बहस एयर कंडीशनिंग (एसी) को लेकर खड़ी हो गई है। बहस यह है कि क्या यूरोप में सभी लोगों को एसी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

फ्रांस में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मरीन ले पेन के नेतृत्व वाली नेशनल रैली पार्टी ने सभी स्कूलों और अस्पतालों में एसी लगाने के लिए नेशनल एयर कंडीशनिंग प्लान की घोषणा की है। साथ ही सरकार लगभग 20 अरब यूरो (22.7 अरब डॉलर) का ब्याज-मुक्त ऋण भी उपलब्ध कराएगी। इससे करीब 4 करोड़ परिवार अपने घरों में एसी लगवा सकेंगे।

ब्रिटेन में विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी ने भी कूलिंग के कारण बढ़ती बिजली की मांग को पूरा करने के लिए ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की वकालत की है।

एसी को बढ़ावा देने का विरोध करने वालों का कहना है कि बढ़ती और तेज गर्मी का हल केवल एयर कंडीशनिंग नहीं है। उनका कहना है कि अगर एसी का उपयोग बढ़ा तो यूरोप में ऊर्जा की खपत बढ़ेगी और इससे जलवायु परिवर्तन की स्थिति और खराब होने का खतरा है।

यूरोप में एयर कंडीशनिंग को ज्यादा पसंद नहीं किया जाता, विशेषकर फ्रांस में इसे दिखावटी और अमेरिका से जुड़ा माना जाता है। फ्रांस में माना जाता है कि अगर आप लगातार ठंडी हवा के संपर्क में रहेंगे तो बीमार पड़ सकते हैं। यहां एयर कंडीशनिंग को एक लग्जरी वस्तु माना जाता है।

यूरोप में कम होता है एसी का इस्तेमाल

आज भी यूरोप में लगभग पांचवें हिस्से में ही एयर कंडीशनर है जबकि उत्तरी अमेरिका और एशिया के देशों में इसका इस्तेमाल ज्यादा होता है। यूरोप के भीतर इसे लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आते हैं। यूरोस्टैट के मुताबिक, इटली, स्पेन और ग्रीस जैसे दक्षिणी यूरोपीय देशों में एयर कंडीशनर का इस्तेमाल उत्तरी यूरोप से ज्यादा होता है। अकेले इटली में यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों में एयर कंडीशनिंग में इस्तेमाल होने वाली बिजली का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा इस्तेमाल में लाया जाता है।

एक सवाल यह है कि यूरोप में एसी का कम इस्तेमाल क्यों होता है, इसकी तीन प्रमुख वजह हैं।

1- शहरों का डिजाइन

दक्षिण यूरोप के देशों ने गर्मी से मुकाबले के लिए अपने शहरों में मोटी दीवारें, खिड़कियां और खुली सड़कें बनाई थी। इसके अलावा शहरों की इमारत में हल्का रंग किया गया था और उनकी सतह ऐसी थी जो गर्मी को सोख सकती थी और इससे अंदर ठंडक रहती थी।

दूसरी ओर, उत्तरी यूरोप में हल्की गर्मियां पड़ती हैं। वहां पर इमारत को इस तरह डिजाइन किया गया है कि सर्दियों में गर्मी का एहसास होता रहे। पेरिस में कई अपार्टमेंट ऐसे हैं जहां की छत जिंक की बनी हुई है और गर्मी से बचने के लिए जरूरी इंसुलेशन नहीं है। ऐसे में गर्मी के मौसम में ऊपरी मंजिलें जल्दी गर्म हो जाती हैं।

2- लागत का मामला

दूसरी बड़ी वजह आने वाले खर्च की है। यूरोप में घरेलू बिजली की कीमत अमेरिका की तुलना में काफी ज्यादा है। 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो इसके बाद ऊर्जा का संकट बढ़ गया। दूसरी ओर, एयर कंडीशनर सस्ते तो हो गए लेकिन अधिकतर परिवार ऐसे हैं जो इनका खर्च नहीं उठा सकते।

3- पर्यावरण को नुकसान

तीसरा कारण पर्यावरण से जुड़ा है। जलवायु विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि बड़े पैमाने पर एयर कंडीशनिंग के इस्तेमाल से एक ऐसा चक्र बनता है, जो नुकसानदेह है। इसके कारण बिजली की मांग बढ़ जाती है और जो अतिरिक्त बिजली एसी के लिए चाहिए, इसकी जरूरत अभी भी जीवाश्म ईंधन से पूरी होती है। इससे गर्म हवा घरों से बाहर निकलती है और शहरों का तापमान बढ़ जाता है।

यूरोपीय संघ ने 2050 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। दूसरी ओर सरकारों का फोकस ऊर्जा की मांग को कम करने पर है। इसलिए अगर यूरोप में लाखों नए एयर कंडीशनर लगाए जाते हैं तो यह जलवायु को लेकर तय किए गए लक्ष्य के साथ मेल नहीं खाता।

यूरोप में नहीं पड़ती थी इतनी गर्मी

यूरोप में गर्मियां कभी भी इतनी मुश्किल भरी नहीं थीं। लोग लंबी शामों और अच्छे मौसम का आनंद लेते थे लेकिन अब यूरोप का तापमान दूसरे महाद्वीपों की तुलना में तेजी से गर्म हो रहा है और लू लगने की घटनाएं बढ़ी हैं। इस वजह से यूरोप में एयर कंडीशनिंग को लेकर यह बहस शुरू हुई है।

अब गर्मियां लोगों की जान ले रही है, ऐसे घर जो एक पीढ़ी पहले तक आरामदायक थे लेकिन अब वहां पर 35 डिग्री तापमान है और अस्पताल में गर्मी से जुड़ी बीमारियों के मरीज काफी ज्यादा आ रहे हैं। साथ ही स्कूल और वर्क स्पेस इतनी भीषण गर्मी के लिए तैयार नहीं हैं।

यह भी सच है कि इस भीषण गर्मी में एयर कंडीशनिंग लोगों की जान तो बचा सकती है लेकिन इसके ज्यादा बढ़ने पर निश्चित रूप से बिजली की मांग बढ़ेगी और ऐसे देश में जहां बिजली की मांग अभी भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है, वहां पर उत्सर्जन बढ़ेगा और निश्चित रूप से तापमान में भी इजाफा होगा। इसी वजह से एयर कंडीशनिंग यूरोप में एक राजनीतिक मुद्दा बन गई है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का क्या कहना है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि सरकारों को हीटवेव के दौरान लोगों की ठंडी जगहों पर पहुंच सुनिश्चित करनी चाहिए। केवल एयर कंडीशनिंग पर निर्भर रहने के बजाय बेहतर भवन डिजाइन और शहरों में हरियाली बढ़ाने में निवेश करना चाहिए।

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यूरोप के कई देश इस समय रिकॉर्डतोड़ गर्मी का सामना कर रहे हैं। फ्रांस, स्पेन समेत कई देशों में रेड अलर्ट लागू है। ज्यादातर देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।