चुनाव आयोग ने उन राज्यों में अपने ईसीआईनेट पोर्टल के फॉर्म-6 से एक अतिरिक्त घोषणा हटा दी है, जहां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। यह बदलाव उन सवालों के उठने के कुछ दिनों बाद किया गया है कि क्या ऑनलाइन फॉर्म में कानून की अनुमति से आगे जाकर बदलाव किया गया था। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब चुनाव आयोग के मतदाता सूची से जुड़े सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

इससे एक दिन पहले ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने खबर दी थी कि महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस चोक्कालिंगम ने पिछले सप्ताह मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर ईसीआईनेट में चार बदलाव करने की मांग की थी।

इन बदलावों का संबंध इस बात से है कि राज्य के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया के दौरान ईसीआईनेट के जरिए अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं।

चोक्कालिंगम की चिंता भी चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की चिंताओं जैसी है। उनका कहना है कि ईआरओ को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि किन ‘तार्किक विसंगति’ वाले मामलों में सुनवाई जरूरी है।

ये सवाल पहली बार तब उठे, जब 23 सितंबर को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की पड़ताल में पता चला कि दो चुनाव आयुक्तों ने आधिकारिक रिकॉर्ड में कहा था कि सॉफ्टवेयर ईआरओ के अधिकारों को सीमित कर रहा है। संधू और जोशी ने मतदाता सूची के आंकड़ों के केंद्रीकृत होने पर भी चिंता जताई थी। जबकि पहले मतदाता सूची से जुड़ी यह व्यवस्था अलग-अलग स्तरों पर बंटी हुई थी।

तो आइए जानते हैं कि ईआरओनेट और ईसीआईनेट क्या हैं? इन डिजिटल व्यवस्थाओं ने मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव करने की प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित किया है?

एसआईआर क्या है?

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत चुनाव आयोग ‘किसी भी समय… किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से की मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण उस तरीके से कराने का निर्देश दे सकता है, जिसे वह उचित समझे।’

निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के मुताबिक मतदाता सूची का पुनरीक्षण ‘पूरी तरह गहन, संक्षिप्त या आंशिक रूप से गहन और आंशिक रूप से संक्षिप्त’ तरीके से किया जा सकता है, जैसा चुनाव आयोग निर्देश दे।

गहन पुनरीक्षण में मतदाता सूची नए सिरे से तैयार की जाती है, जबकि संक्षिप्त पुनरीक्षण में पहले से मौजूद सूची में जरूरी बदलाव किए जाते हैं। संक्षिप्त पुनरीक्षण हर साल और लोकसभा तथा राज्य विधानसभा चुनावों से पहले किया जाता है।

ईआरओ के पास क्या अधिकार होते हैं?

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत मतदाता सूची को अद्यतन करने की जिम्मेदारी निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी की होती है।

ईआरओ आमतौर पर एसडीएम के स्तर का अधिकारी होता है। वह मतदाता सूची तैयार करता है, दावों और आपत्तियों पर सुनवाई करता है और यह तय करता है कि किन नामों को सूची में रखा जाए और किन्हें हटाया जाए। हर विधानसभा क्षेत्र के लिए एक ईआरओ होता है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की पड़ताल में सामने आया कि मतदाता सूची में किसी नाम को शामिल करने या हटाने का अंतिम फैसला ईआरओ को करना चाहिए, लेकिन सॉफ्टवेयर की वजह से उनके अधिकार सीमित हो रहे थे। संधू ने 14 अगस्त को इस चिंता को उठाया था।

व्यवहार में ईआरओ केवल किसी नाम को जोड़ या हटा पा रहे थे, किसी फैसले को पलट सकते थे या अपील पर कार्रवाई कर सकते थे। अंतिम फैसला लेने का अधिकार केंद्र में नई दिल्ली में रखा गया था।

ECINET और ERONET क्या हैं?

चुनाव आयोग ईआरओनेट को ‘केंद्रीकृत फॉर्म प्रक्रिया व्यवस्था’ बताता है। इसका इस्तेमाल मतदाताओं के नाम दर्ज करने, उनका पता बदलने और मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किया जाता है। ईआरओनेट से पहले राज्यों में मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव के लिए 36 अलग-अलग व्यवस्थाएं इस्तेमाल होती थीं।

ईआरओनेट का मकसद विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने और उसमें जरूरी बदलाव करने में ईआरओ की मदद करना है। यह अधिकारी को फैसले लेने में सहायता देने वाली व्यवस्था के तौर पर तैयार किया गया है।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव करने का कानूनी अधिकार ईआरओ के पास है। इसलिए ईआरओनेट खुद यह तय नहीं कर सकता कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में जोड़ा जाए या हटाया जाए।

अगर किसी मतदाता के नाम या दूसरी जानकारियों में समानता मिलती है, तो ईआरओनेट इसकी जानकारी ईआरओ को देता है। इसके बाद ईआरओ रिकॉर्ड की जांच करता है और जरूरत पड़ने पर मौके पर जाकर जानकारी का सत्यापन भी कराता है। अंतिम फैसला ईआरओ ही करता है।

इसके मुकाबले ईसीआईनेट एक नया और बड़ा मंच है। इसमें चुनाव से जुड़ी कई ऐसी सुविधाओं को एक जगह लाया गया है, जो पहले अलग-अलग व्यवस्थाओं के जरिए उपलब्ध थीं। इसे जनवरी 2026 में शुरू किया गया था। इसके तहत मतदाताओं, उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों और चुनाव अधिकारियों के लिए इस्तेमाल होने वाली 40 से ज्यादा व्यवस्थाओं और वेबसाइटों को एक साथ जोड़ा गया है।

मतदाताओं के लिए ईसीआईनेट पर नाम दर्ज कराने, मतदाता सूची में अपना नाम खोजने, आवेदन की स्थिति देखने, इलेक्ट्रॉनिक मतदाता पहचान पत्र हासिल करने और मतदान केंद्र व उम्मीदवारों से जुड़ी जानकारी लेने जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

मतदाता सूची से जुड़े जो काम पहले ईआरओनेट के जरिए होते थे, अब ईसीआईनेट के जरिए किए जाते हैं। चुनाव आयोग इसे ‘ईसीआईनेट पोर्टल का मतदाता सूची भाग (पहले ईआरओनेट)’ कहता है।

ईसीआईनेट में मिलने वाली ‘तार्किक विसंगतियों’ की जांच और उन्हें दूर करने का अधिकार भी ईआरओ के पास है। ये ऐसी गड़बड़ियां हैं, जो तब सामने आती हैं जब सॉफ्टवेयर किसी मतदाता की जानकारी को पिछली एसआईआर वाली मतदाता सूची में उसके माता-पिता या दादा-दादी की जानकारी से मिलाता है।

मसलन, माता-पिता के नाम में अंतर होना, माता-पिता और बच्चे की उम्र में 15 साल से कम या 50 साल से ज्यादा का अंतर होना, पुरानी और नई मतदाता सूची में उम्र का सही क्रम नहीं मिलना या मतदाता की ओर से कोई दस्तावेज न देना या सिर्फ आधार देना ऐसी विसंगतियों के उदाहरण हैं।

क्या चिंताएं उठाई गईं और चुनाव आयोग ने क्या कहा?

मौजूदा विवाद सॉफ्टवेयर की बनावट को लेकर है। कानून के मुताबिक मतदाता सूची पर अंतिम फैसला लेने का अधिकार ईआरओ के पास है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सॉफ्टवेयर की बनावट या उसकी कार्यप्रणाली ईआरओ के इस अधिकार को सीमित कर सकती है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की पड़ताल के मुताबिक, मतदाता सूची से जुड़े सॉफ्टवेयर को लेकर पहली बार नवंबर 2025 में चिंता जताई गई थी। इससे पहले ईआरओनेट को लेकर भी सवाल उठे थे। उस समय कहा गया था कि सूचना प्रौद्योगिकी की व्यवस्था ईआरओ के कानूनी अधिकारों में बाधा नहीं बननी चाहिए।

इस पड़ताल पर चुनाव आयोग ने 23 सितंबर को अपनी शुरुआती प्रतिक्रिया में कहा था कि ईआरओ और जिला निर्वाचन अधिकारी कानून के तहत नाम जोड़ने और हटाने के अपने अधिकारों के अनुसार काम करते हैं। आयोग ने यह भी कहा था कि उसके डिजिटल मंचों पर आंकड़ों से बिना अनुमति छेड़छाड़ रोकने के लिए कड़े सुरक्षा उपाय किए गए हैं।

इसके बाद रविवार, 27 सितंबर को चुनाव आयोग ने कहा कि ईसीआईनेट की समीक्षा एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता वाली समिति करेगी। इसमें किसी आईआईटी या आईआईआईटी के एक स्वतंत्र विशेषज्ञ को भी शामिल किया जाएगा।

आयोग ने यह भी कहा कि अगर मैदानी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों को व्यवस्था में ज्यादा स्वतंत्रता की जरूरत है, तो उन्हें यह सुविधा दी जाएगी। साथ ही, चुनाव आयुक्तों की ओर से अधिकारियों को दिए गए निर्देशों का पूरी सावधानी से पालन किया जाएगा।

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