दक्षिण दिल्ली की पॉश कॉलोनी गुलमोहर पार्क में पिछले दो हफ्तों से पीने के पानी की पाइपलाइनों में सीवर का मिला हुआ पानी आ रहा है। यह आलेख लिखे जाने तक दिल्ली जल बोर्ड यह पता नहीं लगा पाया था कि गंदा पानी पाइपलाइन में किस जगह से घुस रहा है। गंदे पानी के संपर्क में आने से कई निवासी बीमार पड़ गए हैं और लोगों को अपनी रोजाना की जरूरतों के लिए पानी के टैंकरों और बोतलबंद पानी का सहारा लेना पड़ रहा है।
पीने के पानी में सीवर का पानी मिलने के पीछे कुछ सिस्टेमेटिक कारण हैं। इंजीनियरिंग के नजरिए से देखें तो पीने के पानी की पाइपलाइनों में गंदा पानी मिलने का खतरा लगभग हमेशा बना रहता है। पानी की पाइपों में छोटी-सी लीकेज या दरार के जरिए भी सीवर का पानी अंदर जा सकता है, खासकर तब जब पानी की सप्लाई बंद हो और पाइपों में प्रेशर कम हो।
यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब पाइपलाइन का नेटवर्क पुराना और जंग लगा हो, निर्माण कार्यों के दौरान पाइपों को नुकसान पहुंचा हो या पाइपों के आसपास सीवर का पानी और अन्य प्रदूषक मौजूद हों।
इस स्थिति से दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, पीने के पानी के दूषित होने का खतरा लगभग हमेशा मौजूद रहता है और इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, केवल नियंत्रित किया जा सकता है। दूसरा, क्योंकि यह खतरा सीवर और पेयजल पाइपों के आपसी संपर्क से पैदा होता है, इसलिए इसके प्रबंधन में पीने के पानी और सीवर दोनों पर समान रूप से ध्यान देना जरूरी है।
पीने के पानी और सीवर का प्रबंधन
हमारे देश में पीने के पानी की आपूर्ति और सीवर मैनेजमेंट में स्थानीय स्तर पर इंजीनियरिंग मानकों के साथ कई तरह के समझौते किए जाते हैं। चूंकि पानी की सप्लाई दिन में केवल कुछ घंटों के लिए होती है, इसलिए पाइप अक्सर खाली रहते हैं और इस वजह से उनमें बाहरी प्रदूषकों के घुसने की संभावना बढ़ जाती है।
इंजीनियर 24 घंटे पानी की आपूर्ति वाली प्रणाली को तकनीकी रूप से बेहतर मानते हैं, क्योंकि इसमें पाइपों में लगातार दबाव बना रहता है और वे दूषित पदार्थों के प्रवेश का बेहतर तरीके से मुकाबला कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए अधिक पानी और आपूर्ति व्यवस्था में महंगे सुधारों की आवश्यकता होती है।
इसके अलावा, पाइपों और नेटवर्क की वास्तविक स्थिति कभी पूरी तरह ज्ञात नहीं होती। कुछ पायलट परियोजनाओं को छोड़ दें तो भारतीय शहरों में पानी और सीवर के सप्लाई के पूरे डिजिटल नक्शे उपलब्ध नहीं हैं। शहरी एजेंसियों के फील्ड कर्मचारी अपने अनुभव के आधार पर जानते हैं कि स्थानीय स्तर पर पानी और निकासी की व्यवस्था कैसे काम करती है, लेकिन स्थानीय जोखिमों के बारे में उनकी समझ अक्सर संस्थागत निर्णयों और प्राथमिकताओं का हिस्सा नहीं बन पाती।
सीवर का प्रबंधन और भी जटिल है और कम से कम आंशिक रूप से यह किसी एक सरकारी एजेंसी के सीधे नियंत्रण से बाहर है। सबसे विकसित इलाकों में भी बंद या अधूरी सीवर लाइनों के कारण सीवर का पानी बारिश के नालों और प्राकृतिक जलमार्गों में मोड़ दिया जाता है। शहरी आबादी के आधे से अधिक लोगों के पास संगठित सीवर लाइन की सुविधा नहीं है और वे सेप्टिक टैंकों व गड्ढों पर निर्भर हैं। इनसे निकलने वाले गंदे तरल अपशिष्ट के निपटान का कोई व्यावहारिक समाधान दिखाई नहीं देता, सिवाय इसके कि वह खुले नालों और जलमार्गों में बह जाए।
झुग्गी बस्तियां, अनधिकृत कॉलोनियां और शहरी गांव इस समस्या को और जटिल बना देते हैं। एक कारण यह है कि कानूनी नियम शहरी एजेंसियों को इन क्षेत्रों में पूर्ण जल और सीवर सेवाएं उपलब्ध कराने से रोकते हैं, ताकि ऐसे इलाकों के विस्तार को हतोत्साहित किया जा सके। दूसरा कारण यह है कि इन क्षेत्रों की संकरी, घुमावदार और असमान गलियों में बुनियादी ढांचा तैयार करना कठिन होता है।
कई शहरों में एक ही समस्या के अलग-अलग हिस्सों के लिए अलग-अलग सरकारी एजेंसियां जिम्मेदार होती हैं। दिल्ली में दिल्ली जल बोर्ड की व्यवस्था के साथ-साथ एमसीडी, पीडब्ल्यूडी, सिंचाई विभाग और डीडीए भी काम करते हैं, लेकिन सड़क और मोहल्ला स्तर पर इनके बीच समन्वय की क्षमता सीमित है।
संस्थागत कमियां और चुनौतियां
देश में पर्यावरण कानूनों के तहत सुरक्षित पेयजल और सीवर डिस्चार्ज के लिए मानक तय किए गए हैं, लेकिन इन्हें व्यवहार में लागू करने के लिए संस्थागत व्यवस्थाओं में कई कमियां हैं। सुरक्षित पेयजल का अधिकार संविधान के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा माना जाता है, लेकिन इसे सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट नियम मौजूद नहीं हैं।
सीवर डिस्चार्ज के मानक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले पानी पर लागू होते हैं, लेकिन ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुंचने से पहले सीवर के प्रबंधन के बारे में स्पष्ट निर्देश नहीं देते। जो सीवर किसी सीवर लाइन से जुड़ा ही नहीं है, उसके लिए नियम और भी अस्पष्ट हैं।
हमें पर्यावरण कानूनों और संस्थागत नियमों के बीच अंतर समझने की जरूरत है। पर्यावरण कानून पीने के पानी और सीवेज ट्रीटमेंट के लिए गुणवत्ता मानक तय करते हैं, जबकि संस्थागत नियम शहरी एजेंसियों की सेवाओं और बुनियादी ढांचे से जुड़ी गतिविधियों को संचालित करते हैं।
इस दूसरे क्षेत्र का विकास अपेक्षाकृत कम हुआ है। सरकारी एजेंसियों द्वारा कई दिशानिर्देश और मानक जारी किए गए हैं, लेकिन वे कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं और अक्सर वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखते जिनमें उन्हें लागू किया जाना है। स्वाभाविक रूप से, शहरों और शहरों के भीतर अलग-अलग इलाकों की परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए एक ही नियम हर जगह काम नहीं कर सकता।
अक्सर यह सवाल उठता है कि पानी और अपशिष्ट जल का प्रबंधन दिल्ली जल बोर्ड जैसी स्वायत्त एजेंसी करे या फिर बृहन्मुंबई नगर निगम जैसी निर्वाचित नगर निकाय। 1970 और 1980 के दशक में बड़े शहरों में वैधानिक जल प्राधिकरण स्थापित किए गए थे। इसकी शुरुआत 1964 में बेंगलुरु जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड से हुई थी। इसका उद्देश्य बड़े पैमाने पर काम करके लागत कम करना और बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को निर्वाचित पार्षदों के राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाना था।
अब तक के अनुभव से यह स्पष्ट हो चुका है कि कोई एक व्यवस्था दूसरी से बेहतर नहीं है। मुंबई और कोलकाता की नगर निगम आधारित जल व्यवस्था जरूरी नहीं कि बेंगलुरु या चेन्नई के जल बोर्डों से बेहतर या खराब हो। परिणाम अधिकतर संस्थान की कार्यसंस्कृति और उसके प्रशासनिक तथा राजनीतिक नेतृत्व की गुणवत्ता पर निर्भर करते हैं। व्यवहार में राज्य सरकारें भी स्थानीय निकायों को संरचना और सहयोग प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
परेशानियों का समाधान क्या है?
स्वच्छ पानी का मुद्दा ऐसा नहीं है जिसे किसी एक योजना, नियम या आदेश से हल किया जा सके। इसके लिए एक ऐसी व्यवस्थित प्रक्रिया की जरूरत है जिसमें प्रशासनिक नियमों और योजनाओं के साथ-साथ रियल टाइम में प्रबंधन सुधार भी किए जाएं। इंजीनियरिंग की सर्वोत्तम पद्धतियों और हमारे शहरों की वास्तविक स्थिति के बीच बड़ा अंतर है। इसे केवल कई वर्षों तक चलने वाली ऐसी प्रक्रिया के माध्यम से कम किया जा सकता है जो हर वर्ष मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े सबसे जरूरी सुधारों को प्राथमिकता दे।
स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के लिए सार्वजनिक प्रबंधन सुधारों में उन लोगों की भूमिका को केंद्र में रखना होगा जो असलियत में यह काम करते हैं। पानी और सीवर प्रबंधन की भौतिक प्रकृति और स्थानीय परिस्थितियों की जटिलता को देखते हुए न तो सब कुछ पूरी तरह डिजिटल किया जा सकता है और न ही केवल केंद्रीकृत प्रणालियों पर निर्भर रहा जा सकता है।
तकनीकी समाधान, डिजिटल निगरानी, जल गुणवत्ता ट्रैकिंग सिस्टम और सार्वजनिक-निजी भागीदारी की अपनी भूमिका हो सकती है, लेकिन वे तभी प्रभावी होंगे जब उन्हें सार्वजनिक प्रबंधन, अधिकार और नियंत्रण की मजबूत व्यवस्था का समर्थन प्राप्त हो।
पानी और सीवर के प्रबंधन के लिए प्रशासनिक अधिकारियों का उन स्थानों, मोहल्लों और गलियों में मौजूद रहना जरूरी है जहां यह बुनियादी ढांचा वास्तव में मौजूद है। संस्थागत सुधारों और उनसे जुड़ी तकनीकों का आखिरी उद्देश्य लोगों, बुनियादी ढांचे और सरकार के बीच जमीनी स्तर पर बेहतर तालमेल स्थापित करना होना चाहिए।
दूसरे शब्दों में, क्योंकि दूषित होने के खतरे को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, इसलिए असली चुनौती ऐसी संस्थागत क्षमता विकसित करना है जो जोखिम का पहले से अनुमान लगा सके, उसकी पहचान कर सके और उस पर प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया दे सके। ताकि किसी तरह की चूक से बचा जा सके।
अरकाजा सिंह, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, नई दिल्ली में फेलो हैं।
