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Air Quality Panel Bans Coal In Delhi-NCR: वायु प्रदूषण पर लगेगी कितनी लगाम, क्‍या कोयले पर प्रतिबंध से बढ़ेगी इंडस्‍ट्री की मुश्किल? पढ़ें आंकड़ों की कहानी

सीएक्यूएम के नए निर्देश से दिल्ली-एनसीआर में कोयला बैन हो गया है। ये प्रतिबंध 1 जनवरी, 2023 से लागू होगा। क्या है इस प्रतिबंध का कारण? क्या वायू प्रदूषण को कम कर पाएगा ये प्रतिबंध? प्रतिबंध लागू करने में किन चुनौतियाँ का करना पड़ सकता है सामना?

Air Quality Panel Bans Coal In Delhi-NCR: वायु प्रदूषण पर लगेगी कितनी लगाम, क्‍या कोयले पर प्रतिबंध से बढ़ेगी इंडस्‍ट्री की मुश्किल? पढ़ें आंकड़ों की कहानी
एनसीआर में थर्मल पावर प्लांटों को कोयला प्रतिबंध से छूट दी गई है। ( Express Photo by Tashi Tobgyal)

अभिन्या हरगोविंद

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने बुधवार को कोयले के इस्तेमाल से जुड़ा एक निर्देश जारी किया। सीएक्यूएम ने एक जनवरी, 2023 से पूरे दिल्ली-एनसीआर में कोयले के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। सीएक्यूएम का ये निर्देश लागू होने के बाद कोयले का औद्योगिक या घरेलू कार्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। हालांकि, थर्मल पावर स्टेशनों को प्रतिबंध से छूट दी गई है। जिन क्षेत्रों में पीएनजी का बुनियादी ढांचा और आपूर्ति पहले से उपलब्ध है, उन क्षेत्रों में यह प्रतिबंध 1 अक्टूबर, 2022 से ही लगू हो जाएगा।

कोयले के उपयोग पर प्रतिबंध क्यों लगाया गया है?

सीएक्यूएम की ओर से जारी एक नोट में कहा गया है, कोयला एनसीआर के औद्योगिक ईंधनों पर हावी हो चुका है। एनसीआर के औद्योगिक इकाइयों में सालाना लगभग 17 लाख टन कोयले की खपत होती है। जिसमें अकेले छह प्रमुख औद्योगिक जिलों में लगभग 14 लाख टन कोयले का उपयोग किया जा रहा है। यह कदम एनसीआर के वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने और ईंधन के रूप में कोयले के उपयोग को समाप्त करने के लिए उठाया गया है।

दिल्ली की सर्दियों में प्रदूषण के स्तर को PM2.5 तक पहुंचाने में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान 30 प्रतिशत या उससे कम होता है। इसमें से 14 प्रतिशत प्रदूषण कोयला, बायोमास, पेट-कोक और फर्नेस ऑयल का उपयोग करने वाले उद्योग फैलाते हैं, 8 प्रतिशत प्रदूषण ईंट भट्ठों द्वारा फैलाया जाता है, 6 प्रतिशत बिजली स्टेशनों और 2 प्रतिशत प्रदूषण स्टोन क्रशर फैक्ट्रियों द्वारा फैलाया जाता है। ये आंकड़ा साल 2018 के द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के एक अध्यन से मिलता है। उधर दिल्ली सरकार का कहना है कि दिल्ली की सभी 1,607 औद्योगिक इकाइयां अब पीएनजी पर चलने लगी हैं।

क्या प्रतिबंध से एनसीआर के वायू प्रदूषण में कमी आएगी?

विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम एनसीआर में गंदे ईंधन के इस्तेमाल को रोकने में मदद कर सकता है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉयचौधरी ने कहा, ”यदि हम क्षेत्रीय स्तर पर सफाई चाहते हैं, तो हमें सभी गंदे ईंधनों से छुटकारा पाने की जरूरत है। फिलहाल कोयला एनसीआर में प्रमुख औद्योगिक ईंधन है। अगर हम वायू प्रदूषण को कम करना चाहते हैं तो सभी क्षेत्रों में स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल जरूरी है।”

काउंसिल फॉर एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वाटर के रिसर्च फेलो कार्तिक गणेशन का कहना है, ”कुल मिलाकर वायु गुणवत्ता के दृष्टिकोण से यह महत्वपूर्ण कदम है। यह एक ऐसा कदम है जिसका निश्चित रूप से फायदा होगा, क्योंकि 17 लाख टन कोयला एक बड़ी मात्रा है। हालांकि यह 17 लाख टन कोयला कई अलग-अलग संस्थाओं के बीच बंटा हुआ है, जिनमें से कई कम मात्रा में कोयले का उपयोग करते हैं। ये संस्थान सूक्ष्म , लघु और मध्यम उद्योग हो सकते हैं। अच्छा होगा कि बड़े उद्योगों पर ध्यान दिया जाए, जिनके लिए पूंजी का निवेश आसान होता है।”

थर्मल पावर स्टेशनों को दी गई छूट पर रायचौधरी ने कहा कि दिल्ली के लिए अपने कोयला बिजली संयंत्रों को बंद करना संभव है, लेकिन एनसीआर के स्तर पर यह योजना बनाने की जरूरत है कि बिजली कहां से आएगी।

गणेशन का कहना है, एनसीआर में उद्योगों के कारण पीएम2.5 का उत्सर्जन काफी अधिक है। हालांकि, जब तक ये उत्सर्जन दिल्ली में अपना रास्ता बनाते हैं, तब तक उनका प्रभाव कम हो जाता है। कोयला प्रतिबंध का प्रभाव राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के बाहर के क्षेत्रों को अधिक होगा। उनके लिए ये प्रतिबंध वरदान साबित होगा क्योंकि उत्सर्जन का खामियाजा वो भुगत रहे हैं।

अब सवाल उठता है कि सीएक्यूएम को इस प्रतिबंध को लागू करने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है और वर्तमान में कोयला पर चल रहे उद्योगों के लिए इस प्रतिबंध का क्या मतलब है?

अनुमिता रॉयचौधरी मानती हैं कि प्रतिबंध को लागू करने की कोशिश करते समय गैस की कीमत का ध्यान रखना होगा। वो कहती हैं, प्राकृतिक गैस अब कोयले से अधिक महंगी है। अगर हम गैस का सही मूल्य तक कर पाते हैं, तो उद्योग कोयला का उपयोग बंद करने के लिए तैयार हो जाएंगे। प्रतिबंध को सही तरह से लागू करने के लिए गैस आपूर्ति को तो बढ़ाना ही होगा। साथ ही बुनियादी ढांचे का भी विस्तार करना होगा।

400 सदस्यों वाले गुड़गांव इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के अध्यक्ष जे एन मंगला का कहना है, गैस के लिए पाइपलाइन अभी भी कुछ जगहों तक नहीं पहुंच पायी है। इसके अलावा गैस पर काम करने के लिए मशीनों में बदलाव करना होगा, जो महंगे हो सकते हैं। ये खर्च उठना मुश्किल होगा, इसके लिए सब्सिडी देने की जरूरत पड़ेगी। इन सभी कामों में वक्त लगेगा ऐसे में सीएक्यूएम की ओर से तय किए गए समय के भीतर इसे पूरा करना में मुश्किल आ सकता है। उद्योग ये काम धीर-धीरे तो आसानी कर सकते हैं लेकिन तुरंत बदलाव करने में परेशानी होगी। खासकर छोटे उद्योगों के लिए जल्दी से स्विच करना मुश्किल हो सकता है।

गणेशन ने कहा, ”इस प्रतिबंध को लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती खर्चे की होगी। यहां के उद्योगों को एनसीआर के बाहर के निर्माताओं को टक्कर देने में मुश्किल आएगी। उत्पाद की लागत को निकालने में भी परेशानी आ सकती है। ऐसे में उद्योगों के लिए मुआवजा सुनिश्चित करना होगा। गैस के बढ़ते दाम से दोहरी मार पड़ सकती है। सबसे ज्यादा चुनौती का सामना छोटे उद्योगों को करना पड़ सकता है।”

पिछले साल अगस्त में आए सीएक्यूएम के आंकड़ों से पता चलता है, हरियाणा के ऐसे 1,469 उद्योग जो एनसीआर जिलों में हैं, उनमें से 408 ने कोयले का उपयोग बंद कर गैस का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। ऐसे ही उत्तर प्रदेश के 2,273 उद्योग जो एनसीआर जिलों में हैं, उनमें से 1,161 गैस पर शिफ्ट हो चुके हैं। एनसीआर जिलों में आने वाले राजस्थान के ऐसे 436 उद्योगों में से 124 भी गैस पर शिफ्ट हो चुके हैं।


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