जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में मंगलवार शाम को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के एक हेड कांस्टेबल ने कथित तौर पर अपने एके-47 से गोली चला दी। इस घटना में सीआईएसएफ के एक असिस्टेंट कमांडेंट समेत चार जवानों की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि गोली चलाने से पहले हेड कांस्टेबल का कुछ जवानों से विवाद हुआ था।

इस घटना को फ्रैट्रिसाइड कहा जा रहा है। आम भाषा में इसका मतलब अपने ही भाई या बहन की हत्या करना होता है। लेकिन सेना या सुरक्षा बलों के मामले में इसका मतलब अपने ही साथ काम करने वाले जवान की हत्या से है। यह हत्या जानबूझकर भी हो सकती है और गलती से भी।

कठुआ की इस घटना ने एक बार फिर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) और सेना में आत्महत्या और अपने ही साथियों की हत्या के मामलों पर ध्यान खींचा है। आखिर सुरक्षा बलों में ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं? सरकार की ओर से बनाई गई टास्क फोर्स ने इसके पीछे कौन-कौन से कारण बताए हैं? और इन घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?

सीएपीएफ में अपने ही साथियों की हत्या के मामले

सीएपीएफ गृह मंत्रालय के अधीन काम करते हैं। इनमें सीआईएसएफ, असम राइफल्स, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) और सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) शामिल हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2017 से 2025 के बीच नौ साल में सीएपीएफ के 64 जवान अपने ही साथियों की गोली या हिंसा में मारे गए। इसी दौरान 1,126 जवानों ने आत्महत्या की।

सरकारी और विभागीय रिपोर्ट में बार-बार यह बात सामने आई है कि कई जवान लंबे समय तक बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। उन्हें लंबे समय तक संवेदनशील और खतरनाक इलाकों में तैनात रहना पड़ता है। वे परिवार से दूर रहते हैं, कठिन मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों का सामना करते हैं और कई बार लगातार लंबे समय तक ड्यूटी करते हैं। आराम और मनोरंजन के लिए भी उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।

सेना में ऐसे मामले कितने हैं?

भारतीय सेना में अपने ही साथियों की हत्या के मामले बहुत ज्यादा नहीं हैं, लेकिन ऐसे मामले सामने आते रहे हैं।

संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2019 से 2022 के बीच सेना में ऐसे सात मामले सामने आए। 2019, 2020 और 2021 में दो-दो मामले हुए, जबकि 2022 में एक मामला सामने आया। भारतीय वायुसेना में 2019 में ऐसा एक मामला सामने आया था। इस अवधि में नौसेना में ऐसा कोई मामला दर्ज नहीं हुआ।

संसद के एक अन्य आंकड़े के अनुसार, 2014 से 2021 के बीच सेना में ऐसे 18 मामले और वायुसेना में दो मामले सामने आए।

2023 में सेना के भटिंडा स्टेशन में ऐसा ही एक गंभीर मामला हुआ था। 80 मीडियम रेजिमेंट के चार जवानों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में एक जवान पर अपने साथियों की हत्या करने का आरोप लगा था। बताया गया था कि इसके पीछे निजी दुश्मनी थी।

इसी साल अक्टूबर में 48 राष्ट्रीय राइफल्स के एक मेजर ने कथित तौर पर अपने ही साथियों पर गोली चला दी और ग्रेनेड भी फेंका। इसमें कई अधिकारी घायल हुए थे। हालांकि, सेना की व्हाइट नाइट कोर ने इसे ‘संभावित ग्रेनेड दुर्घटना’ बताया था।

2025 में जम्मू संभाग के सांबा में एक जूनियर कमीशंड ऑफिसर की हत्या का मामला भी सामने आया। इसे भी अपने ही साथी की ओर से की गई हत्या का संदिग्ध मामला माना गया।

अधिकारियों के मुताबिक, सेना में आत्महत्या और ऐसे मामलों की एक बड़ी वजह ड्यूटी और युद्ध जैसे माहौल का तनाव है। इसके साथ ही जवानों की निजी जिंदगी की परेशानियां भी तनाव बढ़ा सकती हैं। मुश्किल इलाकों में लंबे समय तक तैनाती और परिवार से दूर रहने की वजह से यह परेशानी और बढ़ जाती है।

सरकार की टास्क फोर्स ने क्या पाया?

गृह मंत्रालय ने 2022 में सुरक्षा बलों में आत्महत्या और अपने ही साथियों की हत्या के मामलों को समझने के लिए एक टास्क फोर्स बनाई थी।

टास्क फोर्स ने पाया कि जब किसी जवान को लगता है कि उसकी परेशानी या शिकायत पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है, तो वह बेहद गुस्से में आ सकता है और हिंसक कदम उठा सकता है।

रिपोर्ट में इन घटनाओं के पीछे तीन तरह की वजहें बताई गईं—नौकरी से जुड़ी समस्याएं, काम की परिस्थितियां और निजी जिंदगी की परेशानियां।

नौकरी से जुड़ी समस्याओं में छुट्टी न मिलना या छुट्टी मिलने में परेशानी सबसे बड़ी वजहों में से एक थी। इसके अलावा जवानों के साथ भेदभाव, काम की जगह पर परेशान किया जाना, अधिकारियों की ओर से गलत व्यवहार, सजा या कानूनी कार्रवाई का डर और अधिकारियों तथा जवानों के बीच सही बातचीत न होना भी समस्या बताई गई।

काम की परिस्थितियों में लंबे समय तक ड्यूटी, पर्याप्त आराम और मनोरंजन का न मिलना, नौकरी में संतुष्टि न मिलना, अकेलापन, परिवार और समाज से पर्याप्त सहयोग न मिलना और शिकायतों को दूर करने की मजबूत व्यवस्था का न होना शामिल है।

छुट्टी इतनी बड़ी समस्या क्यों बन जाती है?

सुरक्षा बलों के जवानों के लिए छुट्टी का मुद्दा बेहद अहम है। उन्हें अक्सर लंबे समय तक घर और परिवार से दूर रहना पड़ता है।

टास्क फोर्स ने पाया कि अगर किसी जवान को छुट्टी नहीं मिलती या छुट्टी मिलने में देरी होती है, तो उसका तनाव बढ़ सकता है। खासकर तब, जब घर में कोई गंभीर समस्या हो। अगर परिवार का कोई सदस्य गंभीर रूप से बीमार हो या परिवार में किसी की मौत हो जाए और जवान को छुट्टी न मिले, तो उसकी परेशानी और गुस्सा बहुत बढ़ सकता है।

टास्क फोर्स के मुताबिक, जब जवान को यह महसूस होता है कि उसकी बात नहीं सुनी जा रही है और उसकी शिकायत का कोई हल नहीं निकल रहा है, तो वह हिंसक कदम भी उठा सकता है।

निजी जिंदगी की कौन-सी परेशानियां सामने आईं?

टास्क फोर्स ने कई निजी और सामाजिक कारणों का भी जिक्र किया। इनमें मानसिक परेशानी, निराशा या अवसाद, कुछ बीमारियों को लेकर लोगों की गलत सोच, नशे की आदत, पैसों की परेशानी और पति-पत्नी या परिवार से जुड़े विवाद शामिल हैं।

इसके अलावा जवानों के बीच गुटबाजी और जाति के आधार पर भेदभाव भी समस्या हो सकती है। छोटी-छोटी बातों को लेकर किसी जवान को भड़काना भी स्थिति को खराब कर सकता है।

बार-बार तबादले का असर जवानों के बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ता है। इससे परिवार पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।

रिपोर्ट में जवानों के मनोबल से जुड़ी कुछ और समस्याओं का भी जिक्र किया गया। इनमें पदोन्नति में देरी, नई पेंशन योजना को लेकर असंतोष, लगातार संवेदनशील या संघर्ष वाले इलाकों में तैनाती और आगे बढ़ने के कम अवसर शामिल हैं।

इसके अलावा जवानों के तनाव और मानसिक परेशानियों को समझने और उनकी मदद करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी भी एक समस्या बताई गई।

संसद ने क्या कहा?

गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने भी माना था कि सीएपीएफ के जवान अपने काम की वजह से काफी दबाव में रहते हैं। उन्हें कठिन मौसम और मुश्किल इलाकों में तैनात किया जाता है।

समिति ने कहा था कि जवानों को समय-समय पर छुट्टी मिलना जरूरी है। इससे वे अपने परिवार के साथ समय बिता सकते हैं और उनका तनाव कम हो सकता है।

यह बात सरकार की टास्क फोर्स की रिपोर्ट से भी जुड़ती है, जिसमें छुट्टी से जुड़ी परेशानी को आत्महत्या और अपने ही साथियों के खिलाफ हिंसा की बड़ी वजहों में शामिल किया गया था।

जवानों की मदद के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?

सीआईएसएफ ने अपने जवानों की मानसिक सेहत को बेहतर बनाने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। इसी महीने की शुरुआत में सीआईएसएफ ने इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलाइड साइंसेज (आईएचबीएएस) के साथ तीन साल का समझौता किया। इसका मकसद सीआईएसएफ के जवानों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बेहतर मदद देना है।

समझौते के तहत आईएचबीएएस संवेदनशील जगहों पर तैनात सीआईएसएफ जवानों की मानसिक स्थिति की विशेष जांच करेगा। इसमें संसद भवन परिसर में तैनाती के लिए प्रस्तावित जवान भी शामिल हैं।

सीआईएसएफ के महानिदेशक प्रवीर रंजन ने कहा कि सीआईएसएफ के जवान बहुत कठिन और जिम्मेदारी वाले माहौल में काम करते हैं। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि आईएचबीएएस के साथ समझौते से मानसिक परेशानियों को समय रहते पहचानने, विशेषज्ञों से सलाह लेने और जरूरत पड़ने पर इलाज कराने में मदद मिलेगी। संगठन ऐसा माहौल बनाना चाहता है, जिसमें जवान बिना किसी झिझक या डर के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी मदद ले सकें।

सेना में भी जवानों का तनाव कम करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इनमें मनोवैज्ञानिक सलाहकारों की तैनाती, बेहतर भोजन और कपड़े, तनाव से निपटने की ट्रेनिंग, मनोरंजन की सुविधाएं, छुट्टी में रियायत, वरिष्ठ अधिकारियों से सीधे बात करने की सुविधा और शिकायतों को दूर करने की व्यवस्था शामिल है। सीमा पर तैनात जवानों को जरूरत के मुताबिक आने-जाने की सुविधा देने के लिए भी कदम उठाए गए हैं।

आगे सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

सरकार की टास्क फोर्स की रिपोर्ट से पता चलता है कि सुरक्षा बलों में आत्महत्या या अपने ही साथियों पर हमला करने के पीछे कोई एक कारण नहीं होता।

लंबे समय तक मुश्किल इलाकों में तैनाती, छुट्टी से जुड़ी परेशानी, अधिकारियों और जवानों के बीच बातचीत की कमी, काम की जगह की समस्याएं, परिवार से लंबे समय तक दूर रहना, मानसिक तनाव और नौकरी या पदोन्नति को लेकर असंतोष—ये सभी कारण मिलकर स्थिति को गंभीर बना सकते हैं।

इसलिए आगे चुनौती सिर्फ घटना होने के बाद कार्रवाई करने की नहीं है। जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें जवान के तनाव या परेशानी के संकेतों को पहले ही पहचान लिया जाए।

इसके लिए समय पर छुट्टी देना, काउंसलिंग की सुविधा बढ़ाना, शिकायतों को जल्दी दूर करना, यूनिट के भीतर जवानों को बेवजह अपमानित या अलग-थलग होने से बचाना और मानसिक स्वास्थ्य के लिए विशेषज्ञों से मदद लेने को सामान्य बनाना जरूरी है।

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भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने जम्मू के सांबा जिले में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को सुरक्षा के लिहाज से ‘संवेदनशील’ माना है और इसीलिए इस संस्थान में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) की सशस्त्र टुकड़ी तैनात की जाएगी। यह जानकारी रविवार को अधिकारियों ने दी है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।