कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा है कि सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति को उसकी जाति को लेकर गाली देना या अपमानित करना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध हो सकता है। अदालत ने कहा कि इस कानून में इस्तेमाल किया गया ‘सार्वजनिक’ शब्द का मतलब केवल ऐसी जगह नहीं है, जहां लोग सामने मौजूद हों। यह सोशल मीडिया और इंटरनेट की दुनिया पर भी लागू हो सकता है।

न्यायमूर्ति उदय कुमार की एकल पीठ ने कहा कि कानून की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) में ‘सार्वजनिक’ शर्त केवल भौतिक जगह तक सीमित नहीं है। बदलती तकनीक के साथ इसका दायरा डिजिटल दुनिया तक भी पहुंचता है।

यह फैसला उच्चतम न्यायालय की उस टिप्पणी के कुछ हफ्तों बाद आया है, जिसमें उसने कहा था कि जाति को लेकर की गई हर टिप्पणी एससी-एसटी कानून के तहत अपराध नहीं मानी जा सकती। अदालतों को हर मामले में यह देखना होगा कि कानून में अपराध के लिए तय जरूरी शर्तें पूरी होती हैं या नहीं।

कानून क्या कहता है

एससी-एसटी कानून की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) के तहत अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति को उसकी जाति के नाम से जानबूझकर अपमानित करना, डराना या गाली देना अपराध है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि ऐसा किसी ऐसी जगह पर किया गया हो, जो ‘सार्वजनिक’ दायरे में आता हो।

इस तरह के अपराध को साबित करने के लिए तीन बातें जरूरी हैं। पहली, आरोपी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं होना चाहिए। दूसरी, उसका मकसद पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करना होना चाहिए। तीसरी, घटना ऐसी जगह हुई हो, जहां दूसरे लोग उसे देख या सुन सकते हों।

सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में सबसे अहम सवाल यही है कि इंटरनेट पर की गई टिप्पणी को ‘सार्वजनिक स्थान’ में हुई घटना माना जा सकता है या नहीं।

उच्चतम न्यायालय ने 2020 में हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में कहा था कि ‘सार्वजनिक’ का मतलब ऐसी जगह है, जहां आम लोग कथित अपमानजनक बात को देख या सुन सकते हों। अदालत ने कहा था कि अगर घटना चारदीवारी के भीतर ऐसी जगह हुई है, जहां आम लोग मौजूद नहीं थे, तो उसे ‘सार्वजनिक स्थान’ पर हुई घटना नहीं माना जा सकता।

पिछले महीने रामकृ्ष्णन चौहान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने एक स्कूल प्रबंधक के खिलाफ इन दोनों धाराओं के तहत शुरू की गई कार्रवाई रद्द कर दी थी। पीठ ने कहा था कि यह देखना जरूरी है कि कथित टिप्पणी ऐसे हालात में की गई थी या नहीं, जहां दूसरे लोग उसे देख या सुन सकते थे। केवल स्कूल परिसर में घटना होने से यह शर्त पूरी नहीं हो जाती।

कलकत्ता हाई कोर्ट का मामला क्या था

इस मामले में शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति से है। उसका आरोप था कि सामान्य जाति से जुड़े दो लोगों ने फेसबुक पर उसकी जाति, धर्म, भगवान और परिवार को लेकर गंदी और जातिसूचक गालियां दीं।

जांच के बाद पुलिस ने मामला बंद करने की रिपोर्ट दाखिल की। पुलिस का कहना था कि कोलकाता साइबर पुलिस थाने के जरिए फेसबुक से संपर्क करने के बावजूद उसे संबंधित लोगों की जानकारी नहीं मिल सकी।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने मामला बंद किए जाने के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया। अलीपुर की विशेष अदालत ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने यह भी कहा था कि इसी शिकायतकर्ता की ओर से दर्ज कराए गए तीन दूसरे मामलों में आरोपपत्र दाखिल हो चुके हैं।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने विशेष अदालत का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि हर आपराधिक मामले और हर घटना को उसके अपने तथ्यों और सबूतों के आधार पर देखा जाना चाहिए। केवल इस आधार पर किसी मामले को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसी व्यक्ति की शिकायत पर दूसरे मामले भी दर्ज हैं।

कोर्ट ने ‘सार्वजनिक’ के सवाल पर कहा कि इसका मतलब केवल किसी भौतिक जगह तक सीमित नहीं है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में इसका दायरा डिजिटल दुनिया तक भी पहुंचता है।

अदालत ने कहा कि जांच के दौरान पुलिस ने फेसबुक पर की गई टिप्पणियों के चित्र सुरक्षित किए थे और लोगों के बयान भी दर्ज किए थे। ऐसे में स्थानीय साइबर जांच में सुराग नहीं मिलने के बाद पुलिस यह कहकर जांच बंद नहीं कर सकती कि उसे कोई सुराग नहीं मिला।

अदालत ने कहा कि पुलिस को राज्य अपराध जांच विभाग की विशेष साइबर जांच और इंटरनेट से जुड़ी तकनीकी जानकारी हासिल करने जैसे दूसरे तरीकों को भी आजमाना चाहिए था।

दूसरे हाई कोर्ट क्या कह चुके हैं

केरल हाई कोर्ट ने 2022 में सूरज वी सुकुमार बनाम केरल राज्य मामले में कहा था कि इस कानून की व्याख्या ऐसे नहीं की जा सकती, जैसे कानून बनने के बाद समाज और तकनीक में कोई बदलाव ही नहीं आया हो।

अदालत ने कहा था कि कानून की व्याख्या बदलते समय और तकनीक के हिसाब से भी की जानी चाहिए। अगर इस कानून की बहुत सीमित व्याख्या की गई, तो जाति के आधार पर होने वाले अपमान और भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए कानून का मकसद ही कमजोर पड़ सकता है।

केरल हाई कोर्ट ने कहा था कि इंटरनेट ने लोगों तक किसी सामग्री के पहुंचने का तरीका बदल दिया है। इंटरनेट पर डाली गई कोई सामग्री किसी भी व्यक्ति तक किसी भी समय पहुंच सकती है।

अदालत ने कहा था कि आज के तकनीकी दौर में ‘सार्वजनिक’ का बहुत सीमित मतलब निकालने से यह कानून बेअसर हो सकता है। उसके मुताबिक इंटरनेट पर भी ‘सार्वजनिक’ की शर्त पूरी हो सकती है, क्योंकि पीड़ित जब भी उस आपत्तिजनक सामग्री को देखता है, वह उसके सामने सीधे तौर पर मौजूद होता है।

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दिल्ली की एक अदालत ने एक्स (ट्विटर) यूजर और पत्रकार करिश्मा अजीज के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। मामला हिंदू धर्म, हिंदू धार्मिक हस्तियों, ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर कथित आपत्तिजनक पोस्ट से जुड़ा है। अदालत ने कहा कि शिकायत में ऐसे संज्ञेय अपराध के आरोप सामने आते हैं जिनकी जांच जरूरी है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।