भारत के स्वतंत्रता संग्राम की दो महान हस्तियों का जन्म 27 सितंबर को हुआ था। सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के पहले भारतीय अध्यक्ष और सरदार वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल का जन्म 1873 में हुआ था, वहीं 1907 में भगत सिंह का जन्म हुआ था। हालांकि, कुछ जानकार भगत सिंह की जन्म तिथि 28 सितंबर भी बताते हैं।
दोनों अलग-अलग दौर के नेता थे और आजादी की लड़ाई को लेकर दोनों की सोच भी काफी अलग थी। इसके बावजूद, अप्रैल 1929 के एक दिन एक ऐतिहासिक मोड़ पर दोनों का आमना-सामना हुआ। जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में दो बम फेंके, तब विट्ठलभाई सेंट्रल असेंबली में अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे थे।
आइए उस दिन की घटना पर नजर डालते हैं और जानते हैं कि उसके बाद क्या-क्या हुआ।
विट्ठलभाई पटेल कौन थे?
विट्ठलभाई अपने पाँच भाइयों में तीसरे नंबर पर थे। छोटे भाई वल्लभभाई पटेल की तरह ही विट्ठलभाई ने भी इंग्लैंड जाकर कानून की पढ़ाई की थी। वहाँ से लौटने के बाद फिर बॉम्बे में वकालत करने लगे थे।
साल 1924 में वह बॉम्बे शहर से सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के लिए चुने गए। इसके बाद 22 अगस्त 1925 को वह असेंबली के पहले भारतीय अध्यक्ष बने। यह सेंट्रल असेंबली आज की हमारी संसद की शुरुआती रूप थी।
अध्यक्ष पद पर रहते हुए विट्ठलभाई ने कई ऐसी परंपराएं शुरू कीं, जो ब्रिटिश शासन खत्म होने के बाद भी बरकरार रहीं। इन्हीं में से एक बेहद अहम फैसला विधायिका की सुरक्षा से जुड़ा था- उन्होंने असेंबली की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी सीधे असेंबली अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में रखी।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की घटना के बाद अंग्रेज सरकार ने इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश की थी। लेकिन यह व्यवस्था आजादी के बाद भी लंबे समय तक जारी रही। 2024 में संसद की सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) को दिए जाने तक यह व्यवस्था बनी रही।
‘बहरों को सुनाने के लिए तेज आवाज जरूरी है’
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़े थे। उस समय देश के कई लोगों में इस बात को लेकर गुस्सा था कि मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के तहत भारतीयों को विधान सभा में जगह तो मिली थी, लेकिन उनके पास असली ताकत बहुत कम थी।
8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधान सभा में पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल पेश किए जाने थे। इनका काफी विरोध हो रहा था। इसी दौरान HSRA के इन दोनों युवा कार्यकर्ताओं ने विरोध का एक बेहद अलग तरीका अपनाया।
दोनों दर्शक दीर्घा में बैठे थे। उन्होंने सभा के अंदर बम और पर्चे फेंके। भगत सिंह ने पिस्तौल से दो गोलियां भी चलाईं। बम ऐसे बनाए गए थे जिनसे किसी की जान न जाए और उनका मकसद किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था।
बम फटने के बाद सभा में अफरा-तफरी मच गई। लेकिन भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की। उन्होंने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘डाउन विद ब्रिटिश इम्पीरियलिज्म’ जैसे नारे लगाए तथा मौके पर ही गिरफ्तार हो गए।
घटना के बाद बांटे गए पर्चे में उन्होंने अपने इस कदम की वजह भी बताई थी। इसमें लिखा था कि ‘बहरों को सुनाने के लिए तेज आवाज जरूरी है।’ यह बात फ्रांस के क्रांतिकारी ‘ऑगस्ट वेलां’ की एक घटना के संदर्भ में कही गई थी। ऑगस्ट वेलां फ्रांस के एक अराजकतावादी थे। उन्होंने 9 दिसंबर 1893 को विरोध के तौर पर फ्रांसीसी संसद में नुकसान नहीं पहुंचाने वाले बम फेंके थे।
पर्चे में ब्रिटिश सरकार की आलोचना करते हुए कहा गया था कि संगठन ने पूरी जिम्मेदारी समझते हुए यह कदम उठाने का फैसला किया था। उसका मकसद इस ‘अपमानजनक तमाशे’ को रोकना और जनता के सामने ब्रिटिश शासन का असली चेहरा लाना था।
पर्चे में आगे कहा गया था कि जनता के प्रतिनिधियों को अपने क्षेत्रों में लौटना चाहिए और लोगों को आने वाली क्रांति के लिए तैयार करना चाहिए। पर्चे में पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल के विरोध के साथ-साथ लाला लाजपत राय की मौत का भी जिक्र किया गया था।
इसमें इतिहास का हवाला देते हुए कहा गया था कि किसी व्यक्ति को मारना आसान है, लेकिन उसके विचारों को खत्म नहीं किया जा सकता। बड़े-बड़े साम्राज्य खत्म हो गए, लेकिन विचार जिंदा रहे।
इसके बाद क्या हुआ?
विधान सभा में बम फेंकने के मामले में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर मुकदमा चला। 12 जून 1929 को दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। लेकिन भगत सिंह पर 1928 में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या से जुड़े लाहौर मामले में भी मुकदमा चल रहा था। इस मामले में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उस समय उनकी उम्र महज 23 साल थी। उस दिन भगत सिंह के साथ दो अन्य क्रांतिकारियों सुखदेव और राजगुरु को भी सॉन्डर्स हत्या मामले में फांसी की दी गई थी।
भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी के बाद पूरे देश में शोक और गुस्से की लहर फैल गई। जवाहरलाल नेहरू ने लिखा था कि हर जगह हड़ताल और शोक जुलूस होंगे। उन्होंने कहा था कि देश में उनकी मौत को लेकर दुख होगा, लेकिन उनके साहस पर गर्व भी होगा। उन्होंने यह भी लिखा कि जब इंग्लैंड भारत से समझौते की बात करेगा, तब दोनों के बीच भगत सिंह का शव मौजूद रहेगा, ताकि लोग उन्हें भूल न जाएं।
विठ्ठलभाई के छोटे भाई वल्लभभाई पटेल ने अप्रैल 1931 में कराची में हुए कांग्रेस अधिवेशन में भगत सिंह के बारे में कहा था, “मैं भगत सिंह और उनके साथियों के देशभक्ति, साहस और बलिदान की भावना को नमन करता हूं।”
विठ्ठलभाई के राजनीतिक जीवन में इस बम कांड का एक और महत्वपूर्ण असर पड़ा। घटना के बाद ब्रिटिश सरकार विधानसभा की सुरक्षा अपने हाथ में लेना चाहती थी। लेकिन विठ्ठलभाई इस पर अड़े रहे। आखिरकार यह तय हुआ कि विधानसभा की सुरक्षा की जिम्मेदारी अध्यक्ष के पास ही रहेगी और दूसरे अधिकारी उनकी मदद करेंगे।
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