एआई बस कुछ निर्देशों पर लेख लिख सकता है, कोई आकर्षक चित्र या वीडीयो बना सकता है, लेकिन किसी इंसान की तरह उसे रचनाकार माना जा सकता है? और क्या एआई की बनाई किसी किसी कलाकृति पर किसी को कॉपीराइट मिल सकता है?
इसी सवाल का जवाब देते हुए भारत के कॉपीराइट कार्यालय ने एक बहुत ही दिलचस्प और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। दफ्तर ने अमेरिकी कंप्यूटर वैज्ञानिक स्टीफन थैलर की उस अर्जी को साफ खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने एआई सिस्टम ‘DABUS’ द्वारा बनाई गई एक डिजिटल पेंटिंग का कॉपीराइट पंजीकरण मांगा था।
कॉपीराइट दफ्तर ने माना कि एआई की बनाई यह पेंटिंग मौलिक तो है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि एआई की बनाई हर चीज़ पर आंख बंद करके कॉपीराइट की मुहर लगा दी जाएगी। कानून में ‘इंसान के रचनाकार होने’ का नियम आज भी मान्य है। यानी कलाकृति चाहे कितनी भी शानदार हो, कानून की नजर में उसका असली रचयिता कोई न कोई ‘इंसान’ ही होना चाहिए।
फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा गया कि किसी चीज़ को बनाने वाले रचनाकार का मतलब उस इंसान से है जिसकी सोच और जिम्मेदारी से वह रचना दुनिया में आई। असली क्रेडिट उस दिमाग को जाता है जिसने उस कला को जन्म दिया, न कि उस ब्रश, कैमरे, कंप्यूटर या एआई को जिसके जरिए वह अंतिम रूप में बनी है।
भारत में यह अपने आप में पहला ऐसा फैसला है, जो सीधे उस सवाल से टकराता है कि अगर एआई कोई कलाकृति बना दे, तो कानून की नजर में उसका असली ‘मालिक’ आखिर कौन होगा?
आखिर क्या था यह अनोखा मामला?
यह पूरी कानूनी लड़ाई ‘A Recent Entrance to Paradise’ नाम की एक बेहद खूबसूरत पेंटिंग को लेकर थी। साल 2022 में स्टीफन थैलर नाम के वैज्ञानिक ने इस पेंटिंग के कॉपीराइट के लिए आवेदन किया। थैलर का दावा था कि यह पेंटिंग उनके बनाए एआई सिस्टम DABUS ने पूरी तरह से अपने आप बनाई है।
मजेदार मोड़ तब आया जब थैलर ने अपनी अर्जी में रचयिता की जगह अपने एआई ‘DABUS’ का नाम लिखा और खुद को केवल उस पेंटिंग का ‘मालिक’ बताया।
कॉपीराइट दफ्तर ने इस अर्जी को देखते ही रोक दिया। कई दौर की सुनवाई में दफ्तर ने सीधा सवाल दागा—क्या भारत का कानून किसी एआई को कानूनी रचनाकार मान सकता है? और अगर कोई पेंटिंग एआई ने बनाई है, तो फिर कानूनन उसका असली श्रेय किसे मिले?
सुनवाई के दौरान दफ्तर ने थैलर को एक मौका भी दिया कि वे अर्जी में थोड़ा सुधार कर लें और एआई की जगह खुद को ‘रचनाकार’ लिख दें। लेकिन थैलर अपनी ज़िद पर अड़े रहे कि इस पेंटिंग का असली जन्मदाता इंसान नहीं, बल्कि उनका एआई DABUS ही है।
कानून की किताब क्या कहती है?
भारतीय कॉपीराइट कानून किसी भी कलाकृति को परखने के लिए तीन कसौटियां देखता है—पहला, क्या काम नया और मौलिक है? दूसरा, इसका रचयिता कौन है? और तीसरा, इस पर मालिकाना हक किसका है?
मौलिकता के नियम पर सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि किसी कलाकृति को कॉपीराइट पाने के लिए बहुत महान या अनोखा होने की जरूरत नहीं है, बस उसमें थोड़ी-बहुत इंसानी रचनात्मकता झलकनी चाहिए; वह केवल किसी चीज़ की नकल या मशीनी छपाई नहीं होनी चाहिए।
रचनाकार कौन है, इसके लिए कानून की धारा 2(d)(vi) कहती है कि कंप्यूटर से बनी किसी भी चीज़ का रचयिता ‘वह व्यक्ति है जो उस काम को करवाने की वजह बनता है।’
अब पूरी लड़ाई इसी बात पर आ अटकी! थैलर का कहना था कि चूंकि आखिरी आउटपुट DABUS ने दिया, इसलिए वही रचयिता है। वहीं कॉपीराइट दफ्तर को तय करना था कि ‘व्यक्ति’ शब्द का मतलब बटन दबाने वाली मशीन है या उस सिस्टम को रचने और चलाने वाला इंसान।
कानून साफ कहता है कि कॉपीराइट के अधिकार, लेनदेन और एग्रीमेंट सिर्फ ऐसे ‘कानूनी व्यक्तियों’ के बीच हो सकते हैं जो अदालत जा सकें और अधिकारों का दावा कर सकें—जैसे कोई इंसान या कोई पंजीकृत कंपनी।
कॉपीराइट दफ्तर का अंतिम फैसला
पेंटिंग की मौलिकता पर दफ्तर ने थैलर की बात मान ली कि यह तस्वीर किसी की नकल नहीं है। लेकिन असली पेच तब फंसा जब बात ‘रचनाकार’ के दर्जे पर आई। दफ्तर ने साफ कहा कि कानून में ‘रचनाकार’ होना कोई मामूली बात नहीं, बल्कि एक कानूनी रुतबा है जो अपने साथ कई अधिकार और जिम्मेदारियां लाता है। एआई चाहे कितना भी समझदार हो जाए, भारतीय कानून में उसे फिलहाल इंसान का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
दफ्तर ने दो टूक शब्दों में कहा, “सिर्फ इसलिए कि एआई ने अंतिम तस्वीर बनाकर दे दी, वह किसी एडिटर, प्रिंटर, कैमरे या फोटो-सॉफ्टवेयर से ज्यादा कुछ नहीं बन जाता। किसी भी उपकरण को महज इसलिए ‘रचनाकार’ नहीं माना जा सकता कि उसने काम पूरा करने में बड़ी भूमिका निभाई है।”
दफ्तर ने अमेरिका के पुराने ऐतिहासिक फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें माना गया था कि किसी कला का असली मालिक अंतिम बटन दबाने वाला नहीं, बल्कि वह ‘मास्टरमाइंड’ होता है जिसकी सोच से वह रचना जन्म लेती है।
इसी तर्क पर दफ्तर ने कहा कि भले ही तस्वीर DABUS ने बनाई, लेकिन उसने यह काम थैलर के बनाए सिस्टम और उनकी दी गई दिशा में ही किया। थैलर ही उस पूरे प्रोसेस के मास्टरमाइंड थे। इसलिए DABUS सिर्फ एक जरिया था, जबकि कानूनी रूप से उस रचना के असली रचयिता स्टीफन थैलर ही थे। लेकिन चूंकि थैलर ने खुद को रचयिता मानने से साफ मना कर दिया था, इसलिए उनकी यह अर्जी खारिज कर दी गई।
दफ्तर ने थैलर की उस अर्जी को भी ठुकरा दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि रचयिता न सही, कम से कम DABUS का नाम ‘तकनीकी निर्माता’ के रूप में ही लिख लिया जाए। दफ्तर ने कहा कि पिछले दरवाजे से एआई को कोई कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।
फैसले के आखिर में एक बहुत बड़ा संदेश दिया गया—भविष्य में अगर एआई को कभी ‘कानूनी व्यक्ति’ या ‘रचनाकार’ का दर्जा देना भी पड़ा, तो यह फैसला केवल देश की संसद कर सकती है। किसी सरकारी दफ्तर के आदेश से एआई कभी इंसान नहीं बन सकता।
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