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ये बंदा जेल में क्यों नहीं है?- योगेंद्र यादव ने कहा कि पीछे नहीं हटेंगे किसान तो बोले फिल्ममेकर, यूजर्स देने लगे ऐसा रिएक्शन

योगेंद्र यादव ने हाल ही में कहा था कि मोदी जी और योगी जी को यह बात ध्यान से सुन लेनी चाहिए कि अपमानित और बदनाम होकर किसान इस आंदोलन से घर वापस नहीं जाएंगे। उनके इस बयान पर फिल्ममेकर अशोक पंडित ने कहा कि...

अशोक पंडित ने योगेंद्र यादव पर टिप्पणी की है (Photo- Ashoke Pandit Twitter)

कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान लगातार आंदोलन कर रहे हैं। उनकी मांग है कि केंद्र सरकार तीन कृषि कानूनों को वापस ले। 26 जनवरी को लाल किले में हुई घटना के बाद किसानों के प्रति सरकार का रवैया बेहद सख्त दिख रहा है। दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों का कहना है कि वो किसी भी कीमत पर बिना कानून वापसी के घर नहीं जाएंगे। इस बीच सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर इंटरनेट की सुविधा स्थगित कर दी गई है। पानी और बिजली जैसी सुविधाओं के लिए भी किसानों को मशक्कत करनी पड़ रही है।

किसान आंदोलन में योगेंद्र यादव और राकेश टिकैत जैसे किसान नेताओं की भूमिका बेहद अहम रही है। दोनों ही नेताओं के भावुक होने की खबरों ने किसानों को खूब उद्वेलित किया है। योगेंद्र यादव ने हाल ही में किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि मोदी जी, योगी जी और सभी को यह बात ध्यान से सुन लेनी चाहिए कि अपमानित और बदनाम होकर किसान इस आंदोलन से घर वापस नहीं जाएंगे। उनके इस बयान पर फिल्ममेकर अशोक पंडित ने एक ट्वीट किया है।

उन्होंने योगेंद्र यादव के बयान को शेयर करते हुए लिखा, ‘ये बंदा जेल में क्यों नहीं है?’ अशोक पंडित के इस टिप्पणी पर यूजर्स भी अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। लोकेश कुमार नामक यूज़र ने लिखा, ‘पूरी दिल्ली में हिंसा की, लाल किले को क्षति पहुंचाई, पुलिस वालों को मारा और रोने भी खुद ही लगे। रोना तो पुलिस को चाहिए था जिसने अपनी जान पर खेलकर किसी को भी चोट नहीं आने दी।’

 

संजय सिंह ने लिखा, ‘अभी दिल्ली पुलिस के कमिश्नर साहब तिरंगे के अपमान के बाद किसी और बड़ी घटना के होने के इंतजार में हैं। ये केजरीवाल एकेडमी का पुराना मास्टर है, इसको आग लगाने में महारत हासिल है। लेकिन गिरफ्तार कौन करे।’ डॉक्टर राजीव कुमार झा ने लिखा, ‘मेरा भी यही प्रश्न है, ये महाशय खुलेआम घूम रहे हैं। क्या इनके ऊपर लॉ एंड ऑर्डर लागू नहीं होता। सुना है इन्हें सोसायटी से भी बहिष्कृत किया का चुका है।’

अभिषेक ने लिखा, ‘अब इसे अमित शाह की मेहरबानी कहें या सुप्रीम कोर्ट की इनायत, या फिर उस संविधान की छूट जो संविधान की रक्षा करने वाले सशस्त्र बलों के अतिरिक्त बाकी सबके मानवाधिकारों की रक्षा करने का वचन देता है चाहे वो आतंकी, अलगाववादी, गद्दार, देशद्रोही अथवा नक्सली ही क्यों न हो। कहना मुश्किल है।’

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