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ओटीटी के कायदे और फायदे

फिल्मी पंडित ओटीटी चलन के बाद सिनेमाघरों के बंद होने की भविष्यवाणी कर चुके थे, अब सरकारी दिशानिर्देश आने के बाद मुंह छुपा रहे हैं। उधर वेब सीरीज के निर्माता उस्तरा-कैंची लेकर काट-छांट में लगे हैं ताकि सरकारी दिशानिर्देशों का उल्लंघन न हो और कोर्ट-कचहरी के चक्कर न लगाने पड़े। नए नियम बने हों, मगर नई घोषणाएं भी हो रही हैं। निर्माता फरहान अख्तर की ताजा फिल्म ‘तूफान’ 21 मई को अमेजन प्राइम पर रिलीज होगी।

fILM sTARअभिनेता फरहान अख्‍तर।

पैसे इधर से उधर सरकाने वाले ज्यादातर मोबाइलधारी ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) से परिचित हैं। इधर ओटीटी (ओवर द टॉप) भी उनकी जिंदगी का हिस्सा बनने लगा है। इसका परिचय कोरोना काल में तब प्रगाढ़ हुआ जब उन्होंने 50 इंची टीवी पर नाभीदर्शना नारियों के साथ-साथ खूब गालियां और गोलियां चलते देखीं। यहां हर दूसरा किरदार हाथ में गन लिए मां-बहनों को याद करता दिख रहा था। जब सब कुछ ठप पड़ा था, सिनेमाघर दबे पांव घरों में घुस गया था।

एकमुश्त भुगतान कर बिना टिकट इसका मजा लेने वाला वर्ग इस पर टूट पड़ा था। रसहीन जिंदगी ओटीटी से रसखान बन गई थी। मगर नैतिकतावादियों की भौहें भी चढ़ने लगी थीं। इतनी गालियां, इतनी गोलियां। संस्कृति पाताल में जा रही है। ओटीटी को कानूनी दायरे में लाओ, फलां-फलां सीरीज पर प्रतिबंध लगाओ। इसको बाहर कर दो, उसकी मुश्कें कस दो। तो एक दिन सरकार उठी और उसने ओटीटी की मुश्कें कस दीं।

कहा, अब लोग उमर के हिसाब से ओटीटी के कार्यक्रम देखेंगे। सात, 13, 16 और 18 साल वालों के लिए कार्यक्रम बनाए जाएंगे। टीवी को बच्चों से वैसे ही बचा कर रखना होगा जैसे बिल्ली से दूध संभाल कर रखा जाता है और कभी कभी बिल्ली को पिला भी दिया जाता है। टीवी ताला-चाभी में रखो। चाभी अपने पास रखो। बच्चों के हाथ में होगी तो वे बिगड़ जाएंगे। बड़ी और पकी उम्रवाले बिगड़ते हैं तो बिगड़ें। बच्चे नहीं बिगड़ने चाहिए।

ओटीटी आया तो वे निर्माता जिनकी फिल्मों को सिनेमाघर नहीं मिलते थे और मिलते थे तो दर्शक नहीं मिलते थे, खुशी के मारे खुशीलाल बन गए। कहने लगे कि अब सिनेमाघरों की जरूरत नहीं। हम ओटीटी के लिए फिल्में बनाएंगे। सिनेमा मालिक बिलबिलाने लगे। कहा कि ओटीटी चलता रहा तो सिनेमाघरों सूने हो जाएंगे।

उधर एक्टरों की सोच भी बदलने लगी। मलयालम फिल्मकार मोहनलाल ने जब सिनेमाघरों के बजाय अपनी मलयालम फिल्म ‘दृश्यम 2’ ओटीटी पर रिलीज करवाई तो उनकी खूब खबर ली गई। कहा कि जिन सिनेमाघरों ने उन्हें सुपर स्टार बनाया उन्हीं सिनेमाघरों की वे कब्र खोद रहे हैं। कुछ दिन मोहनलाल ने चुपचाप सुना। फिर जवाब दिया कि हम तो एक्टर हैं। पूरी दुनिया में अपना काम पहुंचाना चाहते हैं। ओटीटी पूरी दुनिया में दिख रहा है। हम एक्टरों के लिए अच्छा है, तुम्हारी तुम जानो। अमिताभ बच्चन से लेकर अक्षय कुमार ओटीटी पर आ गए। अब बचा कौन?

मगर सरकार के दिशानिर्देश तय करते ही ओटीटी कंपनियों की हवा निकलने लगी है। उनके सीईओ का ब्लडप्रेशर बढ़ गया है। जो वेब सीरीज बनी पड़ी हैं और जो बन रही हैं उनका क्या होगा। ज्यादातर ऐसी हैं जिन पर विवाद खड़े होने हैं। पहले तो विवाद बढ़ना मुनाफा बढ़ना था।

अब तो कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने की नौबत आ जाएगी। हिंसा और अभद्र भाषा के दम पर ओटीटी का धंधा चल रहा था, अब उसके बिना काम कैसे चलेगा। सरकार के दिशानिर्देशों के बाद खुल्ले सांड जैसा ओटीटी खूंटे से बंध गया है और वेब सीरीज के निर्माता अपने ही फिल्माए दृश्यों की कैंची-उस्तरे से हजामत बनाते नजर आ रहे हैं।

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