फिल्में देखने जाओ तो पॉपकॉर्न ना खाओ तो कुछ अधूरा सा लगता है। पॉपकॉर्न को इस तरह से फिल्मों के साथ जोड़ा गया है कि कहीं फिल्म से जुड़ा कोई लोगो डिजाइन हो या कोई फिल्म फेस्टिवल- पॉपकॉर्न टब की फोटो जरूर चस्पा होती है।

पॉपकॉर्न ही क्यों फिल्मी स्नैक्स बना, इसके टब के डिजाइन और कलर के पीछे क्या ट्रिक है ये सब हम आपको आज बताने वाले हैं।

आज पॉपकॉर्न टब सिनेमाहॉल में 800-900 रुपये तक का मिलता है लेकिन ये पॉपकॉर्न कल्चर शुरू इसलिए हुआ था क्योंकि 1930 में अमेरिका में महामंदी चल रही थी और उस वक्त लोग कुछ महंगा अफॉर्ड नहीं कर पाते थे। इतिहासकारों के अनुसार उस वक्त मक्का सस्ता था और आसानी से उपलब्ध था।

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बनाने में आसान, प्रॉफिट मार्जिन हाई और बिना आवाज के खाया जाने वाला स्नैक्स जब फिल्मों के साथ शुरू हुआ तो थियेटर्स मालिकों ने ये समझ लिया कि वो फिल्मों के टिकट्स के साथ इस सस्ते स्नैक्स से भी अच्छे पैसे कमा सकते हैं।

बस फिर क्या मूवी के साथ पॉपकॉर्न को ऐसे प्रमोट किया गया कि आज हमारी फिल्में पॉपकॉर्न के बिना पूरी नहीं होती हैं। और जो पॉपकॉर्न टब आप देखते हैं उसके पीछे भी एक साइकोलॉजी काम करती है चलिए समझते हैं।

कभी आपने नोटिस किया है कि सिनेमाहॉल कोई भी हो पॉपकॉर्न का टब हर जगह एक ही डिजाइन का होता है। कई बार तो कलर भी लगभग सेम होता है। ज्यादातर रेड-वाइट/येलो पट्टी वाले पॉपकॉर्न टब के डिजाइन और शेप के पीछे दिलचस्प कारण है। चलिए समझते हैं पॉपकॉर्न टब के डिजाइन के पीछे का मनोविज्ञान।

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1- विजुअल इल्यूजन

पॉपकॉर्न का टब ऊपर से चौड़ा और नीचे से पतला होता है, इस तरह के डिजाइन में कभी-कभी हमें मात्रा ज्यादा लग सकती है, जिसे Delboeuf Illusion से जोड़ा जाता है।

2- पकड़ना आसान होता है

कुछ स्टडीज़ के अनुसार नीचे से पॉपकॉर्न टब नैरो होता है इसलिए उसे हाथ से पकड़ना आसान होता है। वहीं ऊपर चौड़ा होने की वजह से पॉपकॉर्न हाथ से निकालना आसान हो जाता है। मतलब ये डिजाइन कम्फर्टेबल और कन्वीनिएंट होता है जिससे हम बिना टब देखे भी, आराम से मूवी एन्जॉय करते हुए पॉपकॉर्न का लुत्फ उठा सकते हैं।

3- शेयरिंग इज़ केयरिंग

सिनेमा ज्यादातर हम दोस्तों, परिवार या अपने पार्टनर के साथ देखने जाते हैं। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि टब का डिजाइन ऐसा होता है कि आराम से दो-तीन लोग एक ही पॉपकॉर्न शेयर कर सकते हैं। जिससे हमारा फिल्म देखने का एक्सपीरियंस और अच्छा हो जाता है।

4- खाओ और खाते रहो

कुछ behavioral studies (जैसे Brian Wansink की रिसर्च) में यह पाया गया है कि बड़े या खुले कंटेनर में लोग अनजाने में ज्यादा पॉपकॉर्न उठाते हैं और तेजी से खाते हैं। जल्दी खत्म होता है तो हम इसे रीफिल कराने या फिर कुछ और खाने का प्लान बनाते हैं।

मार्केटिंग एक्सपर्ट्स मानते हैं कि पॉपकॉर्न में नमक की मात्रा थोड़ी ज़्यादा रखी जाती है। यह कोई इत्तेफाक नहीं होता है बल्कि ज्यादा नमक होने की वजह से ज्यादा प्यास लगती है इस वजह से आप पॉपकॉर्न के साथ महंगी कोल्डड्रिंक भी ऑर्डर करते हैं।

5- खुशबू से ट्रिगर होती है भूख

एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिनेमाघरों का वेंटिलेशन भी ऐसा होता है कि ताज़ा भुने हुए पॉपकॉर्न की खुशबू काउंटर से निकलकर पूरे हॉल और वेटिंग एरिया तक जाती है। इसे सेंट मार्केटिंग कहते हैं, ये सीधा आपके दिमाग के क्रेविंग को ट्रिगर करती है।

पॉपकॉर्न टब के कलर के पीछे की वजह

सर्कस और मेले में रेड वाइड या रेड येलो लाइन से सजावट होती थी, पॉपकॉर्न भी उसी दौर में पॉपुलर हुआ तब से ये चला आ रहा है।

थियेटर में डिम लाइट में भी ये कलर आराम से दिख जाते हैं और अब तो ये ब्रैंड आइडेंटिटी बन चुका है।

बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्मों ने भी पॉपकॉर्न टब के इस लुक को बार-बार दिखाया जिसकी वजह से ये और ज्यादा मशहूर हो गया।

पहलूमनोवैज्ञानिक प्रभावअसल उद्देश्य
V-शेप डिजाइनअधिक मात्रा का भ्रम (Visual Illusion)कम लागत में ग्राहक को संतुष्टि का अहसास कराना।
चौड़ा मुंह (Wide Opening)बिंज ईटिंग (Binge Eating)हाथ आसानी से अंदर जाता है, जिससे आप एक बार में ज़्यादा पॉपकॉर्न उठाते हैं।
लाल और पीला रंगभूख बढ़ानालाल रंग उत्साह और भूख को ट्रिगर करता है, जबकि पीला रंग खुशी और एक्साइटमेंट का एहसास कराता है।
Decoy Pricingमीडियम टब का दामअक्सर स्मॉल और लार्ज के बीच ‘मीडियम’ टब की कीमत ऐसी रखी जाती है कि आपको लार्ज टब ही ‘वैल्यू फॉर मनी’ लगे।