सिनेमा के शौकीन हैं तो ‘धुरंधर 2’ आपने अब तक देख ली होगी, नहीं भी देखी होगी तब भी फिल्म का वो वायरल सीन जरूर देखा होगा जहां पिंदा अपने दोस्त जसकीरत (रणवीर सिंह) को पाकिस्तान में पहचान जाता है। पहले वो ऐसे रिएक्ट करता है जैसे उसने उसे नहीं पहचाना है, मगर बाथरूम में वो जसकीरत से पूछता है- ‘घर की याद नहीं आई तुझे जस्सी?’

हम हैरान रह जाते हैं अब क्या होगा…? उसी वक्त इंटरवल हो जाता है… अब लोगों के मन में सवाल है और घबराहट है कि आगे क्या होने वाला है? लोग जल्दी से वॉशरूम से आते हैं कि कहीं इंटरवल के बाद वाला सीन ना छूट जाए… वहीं हम दोस्तों से डिस्कस भी करने लगते हैं अब आगे क्या होगा…? जल्दी से पॉपकॉर्न लेकर आते हैं फिर आगे की कहानी देखना शुरू करते हैं।

कभी आपने सोचा है कि फिल्मों में इंटरवल क्यों होते हैं? अगर आप सोच रहे हैं कि ये स्नैक्स लेने और वॉशरूम ब्रेक के लिए होता है तो जरा ठहरिये… क्योंकि सच इससे कहीं ज्यादा है।

फिल्मों के साथ क्यों शुरू हुआ पॉपकॉर्न कल्चर? टब के डिजाइन और रंग के पीछे है दिलचस्प कहानी

सस्पेंस को पीक पर रोकना

जैसे मैंने अभी ‘धुरंधर 2’ का जिक्र किया, इंटरवल अक्सर उस वक्त आता है जब स्टोरी में बड़ा ट्विस्ट या इमोशनल हाई प्वाइंट होता है। इससे लोगों के दिमाग में अनफिनिश्ड लूप क्रिएट होता है जिसे Zeigarnik Effect कहते हैं- हमारा दिमाग अधूरी चीजों को ज्यादा याद करते हैं।

इससे हमारे मन में ‘आगे क्या होगा?’ की क्योरिसिटी जागती है और दिमाग सेकेंड हाफ के लिए डबल एक्साइटेड हो जाता है।

दिमाग को ब्रेक देना

फिल्में ज्यादातर 2-3 घंटे की होती हैं, लगातार फोकस करने से दिमाग थक जाता है खासकर अगर कोई थ्रिलर फिल्म हो। एक्सपर्ट मानते हैं कि इंटरवल रीसेट बटन की तरह काम करता है- जिससे ऑडियंस फ्रेश माइंड के साथ स्टोरी को देख सके।

इंटरवल के दौरान लोग उठते हैं, स्नैक्स लेते हैं, बातें करते हैं जिससे उनका मूड रिफ्रेश होता है और दोबारा फिल्मों के लिए इमोशनली इन्वेस्ट करने के लिए उनका दिमाग तैयार होता है।

फिल्म पर डिस्कशन भी है जरूरी

सिनेमा हॉल में फिल्म देखते वक्त लोग चुपचाप देखते हैं, मगर उनके मन में बहुत कुछ चल रहा होता है, जैसे ही ब्रेक होता है लोग अपना रिएक्शन्स शेयर करने लगते हैं- तुम्हें क्या लगता है कौन विलेन है? अब क्या होगा…? या इसकी एक्टिंग अच्छी नहीं थी… इसका काम कितना अच्छा है। ये डिस्कशन हमारा उत्साह और बढ़ा देता है।

इंटरवल को ध्यान में रखकर होती है फिल्ममेकिंग

फिल्ममेकर्स भी फिल्मों को दो पार्ट में डिवाइड करके ही बनाते हैं। फर्स्ट हाफ में स्टोरी बिल्डअप होती है, इंटरवल में ट्विस्ट होता है वहीं सेकेंड हाफ में परिणाम सामने आता है। ये स्ट्रक्चर फिल्म को इम्पैक्टफुल बनाता है।

वॉशरूम ब्रेक

जैसा कि हमने ऊपर चर्चा की थी, इंटरवल का एक प्रैक्टिकल कारण मानव शरीर की लिमिटेशन्स भी है, 2-3 घंटे तक बैठना और फोकस करना आसान नहीं होता है। लोगों को वॉशरूम ब्रेक चाहिए होता है।

बॉडी मूवमेंट और फिजिकल कम्फर्ट भी फिल्म देखने के अनुभव को इफेक्ट करता है। अगर इंटरवल नहीं होगा तो लोगों का फोकस कहानी से हटकर अपनी डिस्कम्फर्ट पर चला जाएगा और सिनेमैटिक एक्सपीरियंस खराब हो जाएगा।

इसलिए इंटरवल सिर्फ एक ब्रेक नहीं बल्कि एक पॉवरफुल स्ट्रैटेजी भी है, जो ऑडियंस को कुर्सी से बांधकर रखती है।

एक्टर्स बन रहे हैं इंफ्लुएंसर; फराह खान, अर्चना पूरन सिंह समेत ये सितारे क्यों हो रहे यूट्यूब पर शिफ्ट