आज OTT पर हर दूसरा ट्रेंडिंग शो क्राइम -थ्रिलर होता है, थियेटर्स पर भी क्राइम फिल्मों की भरमार होती है, ये फिल्में खूब पसंद की जाती हैं। स्क्रीन पर अब हिंसा अब पहले की तरह सिर्फ सांकेतिक नहीं रही, अब वो खुलकर दिखाई जाती है। खून-खराबा,मार-पीट… और हम बिना ब्रेक लिए ये शोज़ बिंज वॉच करते हैं।

एनिमल, KGF: चैप्टर 1 या धुरंधर जैसी फिल्में सिर्फ हिट नहीं होतीं, वे दर्शकों के दिमाग में बस जाती हैं। लेकिन सवाल है- आख़िर ऐसा क्यों होता है?

इसके पीछे सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, गहरी साइकोलॉजी काम करती है।

क्यूरियोसिटी और थ्रिल: सुरक्षित डर का रोमांच

इंसान को खतरों के बारे में जानने की नैचुरल जिज्ञासा होती है। क्राइम-थ्रिलर हमें अपराध और हिंसा की दुनिया से रूबरू कराते हैं वो भी सुरक्षित दूरी से।

जब हम स्क्रीन पर थ्रिल और हिंसा देखते हैं तो हमारा दिमाग एड्रेनालिन नाम का हॉर्मोन्स रिलीज करता है। जिससे हमें उत्साह महसूस होता है, हमारे दिल की धड़कनें थोड़ी तेज होती है लेकिन हमें पता होता है कि हम सुरक्षित हैं। ये “सेफ थ्रिल” हमें बांधकर रखता है।

इसके अलावा स्क्रीन पर दिखाया गया गुस्सा और दर्द हमारे दिमाग के मिरर न्यूरॉन्स को सक्रिय करता है। इसलिए जब किरदार चीखता है, बदला लेता है या रोता है तो हम भी वही अनुभव करते हैं। इसके बाद हम कहानी में सिर्फ दर्शक नहीं रहते हैं बल्कि उससे जुड़ जाते हैं।

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जजमेंट और हीरो फैंटेसी

हमारा दिमाग जजमेंट करने में माहिर है। जब हम किसी किरदार को अपराध करते देखते हैं, तो भीतर कहीं खुद को “उससे बेहतर” महसूस करते हैं और अंदर ही अंदर अपनी कहानी के हीरो बन जाते हैं।

एंटी-हीरो करते हैं अट्रैक्ट

स्क्रीन पर एंटी-हीरो की कहानी हमें एक आज़ादी देती है- एंटी हीरो वो सब कर सकता है जो हम असल जिंदगी में बस सोचते हैं पर कर नहीं पाते, जैसे- गुस्सा निकालना, बदला लेना, सिस्टम से भिड़ जाना।

कैथार्सिस इफेक्ट: क्या सच में गुस्सा निकल जाता है?

ग्रीक दार्शनिक Aristotle ने “कैथार्सिस” इफेक्ट के बारे में बताया था। उनके अनुसार, ट्रैजेडी देखने से मन के जो भी विकार होते हैं उनका शुद्धिकरण होता है। कैथार्सिस एक ग्रीक शब्द है जिसका अर्थ ‘शुद्धिकरण’ है।

हालांकि, आधुनिक मनोविज्ञान इससे पूरे तरह से सहमत नहीं है, कुछ रिसर्च यह भी कहती हैं कि बार-बार हिंसा देखने से संवेदनशीलता कम हो सकती है।

FOMO और सोशल प्रेशर

आज कंटेंट सिर्फ देखा नहीं जाता- डिस्कस भी किया जाता है। रील्स, मीम्स, थ्रेड्स और एक्स पर फिल्मों की चर्चा होती हैं, ऊपर दिए गए मनोवैज्ञानिक कारणों से अगर ये फिल्म चर्चा में आती है और अगर आपने वह सीरीज़ नहीं देखी, तो आप बातचीत से बाहर हो जाते हैं। यह “Fear of Missing Out” भी हमें ऐसे कंटेंट की ओर खींचता है।

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दमदार एडिटिंग, म्यूजिक और ट्विस्ट

क्राइम-थ्रिलर का जादू टेक्निकल पक्ष में भी छिपा है। सस्पेंसफुल बैकग्राउंड स्कोर, फास्ट कट और अचानक आया ट्विस्ट हमारे दिमाग को लगातार सतर्क रखते हैं। ब्रेन को पैटर्न समझना पसंद है, और ऐसे ट्विस्ट उसे चैलेंज करते हैं। यही वजह है कि हम सीट से चिपके रहते हैं।

ध्यान देने वाली बात

ज्यादा वायलेंस वाले कंटेंट का समाज पर खराब असर हो सकता है। रिसर्च भी कहती है कि बार-बार हिंसा देखने से संवेदनशीलता कम हो सकती है, खासकर युवा दर्शकों में। इसलिए जिम्मेदारी सिर्फ दर्शकों की नहीं, फिल्ममेकर्स की भी है। कहानी रियल हो सकती है, लेकिन उसे दिखाने का तरीका सोच-समझकर होना चाहिए क्योंकि इससे एक बुरी घटना की जानकारी व्यापक रूप से फैल जाती है और लोगों को क्राइम का आइडिया भी मिलता है।

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