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हमारी याद आएगीः जब तलत ने नूरजहां का प्रस्ताव ठुकराया

‘मदर इंडिया’ बनाने वाले महबूब खान रेशमी आवाज के गायक तलत महमूद के गले पर उंगली रखकर कहते थे कि इस गले में खुदा का नूर बसता है। अफगानिस्तान के किंग जहीर से लेकर नेपाल के महाराजा बीरेंद्र सिंह तक तलत महमूद के कई प्रशंसक थे। दुनिया भर में प्रशंसकों के दिलों पर लरजती आवाज से राज करने और नाथुला दर्रे पर जाकर भारतीय सैनिकों का मनोरंजन करने वाले तलत की कल, शनिवार, 22वीं पुण्यतिथि है।

‘मदर इंडिया’ बनाने वाले महबूब खान रेशमी आवाज के गायक तलत महमूद के गले पर उंगली रखकर कहते थे कि इस गले में खुदा का नूर बसता है।

गणेशनंदन तिवारी

तलत महमूद (24 फरवरी, 1924-9 मई, 1998)

यह संयोग ही है कि मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहां और रेशमी आवाज के गायक तलत महमूद एक साथ किसी फिल्म के लिए नहीं गा सके। वक्त ने दोनों के बीच दो सालों की दूरी एक नहीं दो-दो बार बनाई। एक बार तो दोनों को अपने प्रशंसकों के सामने साथ में गाने का मौका भी आया, मगर दोनों मिल ही नहीं पाए।

यह वह दौर था जब तलत ‘हमसे आया न गया…’, ‘जाएं तो जाएं कहां…’, ‘शाम-ए-गम की कसम…’, ‘ऐ मेरे दिल कहीं और चल…’, ‘जलते हैं जिसके लिए…’ गा कर मशहूर हो चुके थे और नूरजहां ‘जवां है मोहब्बत हसीं है जमाना…’ और ‘आवाज दे कहां है…’ जैसे गाने गाकर पाकिस्तान जा चुकी थीं। 1961 में तलत पाकिस्तान के कराची में एक शो करने गए थे। तलत को सुनने वालों की बेसब्री का आलम यह था कि शो के टिकट हाथोंहाथ बिक गए और 58 हजार प्रशंसकों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी। पाकिस्तान में तलत का शोर मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहां तक पहुंचा, जो उस समय लाहौर में स्टेज शो करने जा रही थीं। उन्हें लगा कि अगर उनके शो में तलत भी आ जाएं तो सोने पर सोहागा होगा। यह उनके और तलत के प्रशंसकों के लिए तोहफा होगा।

तलत और नूरजहां दोनों कभी साथ नहीं गा पाए। नौ साल की नूरजहां बतौर बाल कलाकार 1935 से 1939 तक कोलकाता में ‘पिंड दी कुड़ी’, ‘मिसर का सितारा’, ‘हीर सयाल’, ‘गुलबकावली’ जैसी पंजाबी फिल्में करने के बाद लाहौर लौट गर्इं थीं। इसके दो साल बाद एचएमवी के बुलावे पर तलत 1941 में कोलकाता पहुंचे थे। उधर लाहौर से 1943 में नूरजहां मुंबई आर्इं। ‘बड़ी मां’, ‘जीनत’, ‘गांव की गोरी’, ‘अनमोल घड़ी’ तथा ‘जुगनू’ जैसी फिल्में की और 1947 में अपने शौहर शौकत हुसैन रिजवी के साथ हमेशा के लिए पाकिस्तान चली गर्इं थीं। उनके पाकिस्तान जाने के दो साल बाद तलत, 1949 में, मुंबई आए थे। सो दोनों मिल ही नहीं पाए।

1961 में तलत के पाकिस्तान जाने से दोनों के साथ गाने की एक संभावना बनी थी। लिहाजा नूरजहां ने प्रस्ताव भिजवाया कि तलत लाहौर आ जाएं और उनके स्टेज शो में शिरकत करें। मगर तलत ने कहा कि मुंबई में उनके कार्यक्रम तय हैं और उन्हें समय पर पहुंचना जरूरी है। नूरजहां को लगा कि तलत के इनकार की वजह शायद मेहनताना है। लिहाजा उन्होंने फिर से प्रस्ताव भिजवाया ब्लैंक चेक और इस संदेश के साथ कि तलत इस चेक पर मुंहमांगी रकम भर सकते हैं। मगर तलत ने मजबूरी बता कर इनकार कर दिया। इस तरह तलत और नूरजहां चाह कर भी नहीं मिल पाए। और संगीतप्रेमियों को तरन्नुम की मलिका और रेशमी आवाज के बादशाह को साथ सुनने का मौका नहीं मिल पाया।

दुनिया के कई देशों में जहां-जहां भारतीय बसे थे, तलत लोकप्रिय थे। लोग उनकी दर्द भरी आवाज के दीवाने थे। तलत ने 1961 से 1991 तक कई देशों में स्टेज शो किए, जिनकी टिकटें हाथोंहाथ बिक जाती थीं। किस्सा मशहूर है कि 1956 में ईस्ट अफ्रीका में तलत के छह स्टेज शो का आयोजन था, मगर उन्हें सुनने वालों की तादाद और फरमाइश इतनी ज्यादा थी कि तलत को छह के बजाय 25 स्टेज शो करने पड़े थे।

 

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