ताज़ा खबर
 

जब बेटे ने पिता की साख बचाई

‘बॉबी’ हिंदी सिनेमा में कोमल प्यार की दास्तान वाली पहली फिल्म थी। इस फिल्म ने ‘बेताब’, ‘लव स्टोरी’ और ‘मैंने प्यार किया’ जैसी टीनेज लव स्टोरियों का रास्ता खोला। शोमैन राज कपूर ने ‘बॉबी’ ‘मेरा नाम जोकर’ की असफलता का कर्ज उतारने के लिए बनाई थी। ऋषि न सिर्फ अपने पिता के लिए लकी साबित हुए बल्कि बाद में कई और लोगों के लिए भी।

‘मेरा नाम जोकर’ बनने में छह साल लग गए थे

गणेशनंदन तिवारी

फिल्म इंडस्ट्री में किसी भी निर्माता की साख इस बात से मापी जाती है कि उसकी पिछली फिल्म हिट थी या फ्लॉप। सो जब ‘मेरा नाम जोकर’ (1970) पिटी तो राज कपूर आर्थिक संकटों में घिर गए और उन्हें अपनी साख बचानी भारी पड़ रही थी। धक्का इतना तगड़ा था कि कपूर परिवार की तीन पीढ़ियों (पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर और रणधीर कपूर) को मंजीरा बजाते ‘कल आज और कल’ (1971) में एक साथ उतरना पड़ा। मगर उससे भी काम नहीं चला। फिल्म औसत दर्जे का कारोबार कर पाई। कर्ज चुकाने की जुगत भिड़ा रहे शोमैन की बड़ी इच्छा थी कि राजेश खन्ना को लेकर अगली फिल्म बनाएं, जो तब ‘आराधना’, ‘सफर’, ‘अंदाज’, ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी एक के बाद एक दर्जन भर हिट फिल्में देकर सफलता के शिखर पर इतने ऊपर पहुंच गए थे कि उनकी फीस तक देना राज कपूर के लिए भारी था। ऋषि कपूर ने देखा कि कैसे उनके पिता मन मसोस कर राजेश खन्ना का खयाल दिल से निकाल कर उन पर दांव लगाने की तैयारी कर रहे हैं। एक दिन राज कपूर ने ऋषि कपूर और एक नई लड़की डिंपल कापड़िया को लेकर कम बजट की ‘बॉबी’ (1973) की घोषणा कर दी। प्राण ने शोमैन की स्थिति समझी थी और मात्र एक रुपया साइनिंग अमाउंट लेकर ‘बॉबी’ साइन की थी।

यह विसंगति ही थी कि 18 साल के ऋषि कपूर ने 1970 में ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरस्कार स्वीकार किया था। वजह यह थी कि ‘मेरा नाम जोकर’ बनने में छह साल लग गए थे। छह सालों में ऋषि ने अपने पिता को लगातार मुसीबतों से जूझते देखा था।

‘बॉबी’ बनी और सुपर हिट साबित हुई। राज कपूर के बेटे ने उनकी साख बचा ली। ऋषि कपूर शोमैन राज कपूर के लिए लकी साबित हुए। इसके बाद यह चॉकलेटी हीरो कई निर्माता, निर्देशकों और हीरोइनों के लिए लकी साबित हुआ। जूनियर शोमैन कहे जाने वाले सुभाष घई जब पहली बार ‘कर्ज’ (1980) से निर्माता बने तो टीना मुनीम के साथ उसके हीरो ऋषि ही थे। 1987 में राकेश रोशन ‘खुदगर्ज’ से निर्देशक बने तो उसके हीरो भी ऋषि कपूर थे। फिल्म खूब चली और रोशन बड़े डाइरेक्टर बन गए। ऋषि नई हीरोइनों के लिए भी लकी रहे हैं। ‘बॉबी’ से डिंपल कापड़िया के लिए, ‘लैला मजनूं’ से रंजीता के लिए, ‘बारूद’ से शोमा आनंद के लिए, ‘हम किसी से कम नहीं’ से काजल किरण के लिए, ‘हिना’ से जेबा बख्तियार के लिए।

ऋषि ने आर्थिक कारणों से अपने पिता को राजेश खन्ना को साइन न कर पाने का अफसोस करते देखा था। लिहाजा जब ऋषि कपूर 1999 में निर्देशक बने तो उन्होंने अपनी फिल्म ‘आ अब लौट चलें’ (अक्षय खन्ना-ऐश्वर्या राय) के लिए राजेश खन्ना को सबसे पहले साइन कर अपने पिता की उस अधूरी इच्छा को पूरा किया। आरके बैनर के इतिहास में दो फिल्मों (बूट पॉलिश और अब दिल्ली दूर नहीं) को छोड़ दें, तो सभी फिल्मों में कपूर परिवार का कोई न कोई कलाकार रहा। ऋषि कपूर ने आरके बैनर की और अपनी इकलौती निर्देशित फिल्म ‘आ अब लौट चलें’ में कपूर परिवार के किसी भी व्यक्ति को नहीं लिया था।

ऋषि कूपरः  (4 सितंबर, 1952-30 अप्रैल, 2020)

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 फिल्में ही सब कुछ थीं ऋषि कपूर के लिए
2 पर्दे पर प्यार ही बरसाया
3 कहा सुना माफ चिंटू सर: सलमान खान