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हमारी याद आएगी: जब साहिर और शोमैन की सिफारिशें टकरार्इं

शोमैन राज कपूर चाहते थे कि ‘फिर सुबह होगी’ फिल्म में उनके पसंदीदा शंकर-जयकिशन संगीत दें। मगर फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी का मानना था कि फिल्म के विषय के लिहाज से इसमें शंकर-जयकिशन नहीं खय्याम का संगीत उपयुक्त होगा। साहिर और राज कपूर की सिफारिशें टकराई और जीत हुई साहिर की, जिसे शोमैन राज कपूर ने भी खुले दिल से स्वीकार किया।

साहिर लुधियानवी (8 मार्च, 1921- 25 अक्तूबर, 1980)

किस्सा 1956 का है। साहिर लुधियानवी एक दिन दिलीप कुमार को लेकर ‘शहीद’ (1948), अशोक कुमार को लेकर ‘समाधि’ और(1948), सुनील दत्त की पहली फिल्म ‘रेलवे प्लेटफॉर्म’ (1953) बना चुके निर्माता रमेश सहगल के साथ संगीतकार खय्याम के घर पहुंचे। साहिर ने खय्याम को बताया कि सहगल साब ‘फिर सुबह होगी’ नाम की एक फिल्म बना रहे हैं, जिसमें वह गीत लिख रहे हैं। इसके हीरो राज कपूर हैं और राज कपूर ने इस फिल्म में शंकर-जयकिशन को लेने के लिए कहा है।

साहिर ने खय्याम को बताया कि परेशानी यह है कि यह फिल्म दोस्तोवस्की के उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पर बन रही है और इसके लिए साहित्य की समझ रखने वाला संगीतकार जरूरी है। मैंने आपके नाम की सिफारिश की है मगर सहगल साब का कहना है कि उन्हें कोई एतराज नहीं होगा, अगर राज कपूर खय्याम की धुनें सुनें और उन्हें पास कर दें। आपके नाम का जिक्र भी राज कपूर से किया तो उन्होंने कहा कि खय्याम को भेज दें, धुनें सुनाने के लिए। अब आप उन्हें धुनें सुनाने जाएं। फिर साहिर ने उन्हें अपना लिखा गाना, ‘वो सुबह कभी तो आएगी…’ दिया। इतना छोटा पांच शब्दों का मुखड़ा देख कर खय्याम परेशान हो गए। खय्याम ने तैयारी की और अपनी बनाई हुए धुनें सुनाने के लिए दो म्यूजिशियनों को लेकर शोमैन राज कपूर के म्यूजिक रूम पहुंच गए। थोड़ी देर तक राज कपूर ने बात की और कहा कि लताजी ने उन्हें एक तंबूरा दिया है। जब से दिया है तभी से वह ऐसे ही रखा है।

पहले उसे मिला लो। खय्याम समझ गए कि राज कपूर उनकी परीक्षा लेना चाह रहे हैं। उन्होंने तंबूरा मिलाने के बाद कहा कि क्या अब वह अपनी बनाई हुई धुनें सुनाएं। राज कपूर ने स्वीकृति दे दी। खय्याम ने ‘वो सुबह कभी तो आएगी…’ समेत पांच गानों की धुनें राज कपूर को सुनार्इं। धुनें सुनने के बाद राज कपूर निर्माता सहगल को अपने साथ ले पास के कमरे में चले गए। काफी देर के बाद दोनों लौटे। सहगल ने खुशखुबरी सुनाई कि आप ही इस फिल्म का संगीत देंगे। दरअसल राज कपूर की ‘बरसात’, ‘आवारा’, ‘श्री 420’ और ‘चोरी चोरी’ जैसी फिल्मों में शंकर-जयकिशन ने हिट संगीत दिया था इसलिए वह अपनी फिल्मों के लिए शंकर-जयकिशन की सिफारिश करते थे। तो एक सिफारिश राज कपूर की शंकर जयकिशन के लिए थी और दूसरी सिफारिश गीतकार साहिर की संगीतकार खय्याम के लिए थी। आम तौर पर निर्माता हीरो की डिमांड का खास ध्यान रखता है। ऐसा न होने पर हीरो का अहंकार नखरों का रूप धर लेता है, जिसकी कीमत निर्माता को चुकानी पड़ती है।

मगर राज कपूर ने गुणवत्ता के आगे अपने अहंकार को पीछे कर दिया और खुले दिल से कहा कि इस फिल्म में खय्याम के सुनाए सभी पांचों गाने होंगे और अगर उन्हें संगीतकार नहीं बनाया तो इसका मतलब होगा कि हम संगीत के बारे में कुछ नहीं जानते। ‘फिर सुबह होगी’ प्रदर्शित हुई और बॉक्स आॅफिस पर धूम मच गई। ‘वो सुबह कभी तो आएगी…’ गाने को खूब लोकप्रियता मिली। साथ ही ‘चीनो- अरब हमारा, हिंदुस्तां हमारा, रहने को नहीं घर, सारा जहां हमारा…’ गाने की भी खूब चर्चा हुई। दरअसल 1958 तक आते-आते देश एक दशक की आजादी देख चुका था और लोगों के जीवन में कोई खास बदलाव नजर नहीं आ रहा था। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाएं जुटाने के लिए एक बड़े तबके को जितनी मशक्कत आजादी से पहले करनी पड़ रही थी, उसमें कमी नहीं आई थी। गांवों में रोजगार के साधन नहीं थे। सो गांव के युवाओं की जवानी काम-धंधे की तलाश में शहरों के फुटपाथों पर जीवन गुजार रही थी। साहिर ने जनमानस में उठते सवालों को ‘वो सुबह कभी तो आएगी’ और ‘चीनो अरब हमारा…’ गानों में जुबान दी। ‘वो सुबह…’ गाना मुंबई के विक्टोरिया टर्मिनस के सामने फुटपाथों पर सोए लोगों पर रात में फिल्माया गया था।

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