आज के दौर में फिल्मों में सितारों का ग्लैमरस लुक, महंगे कॉस्ट्यूम और स्टाइलिश स्क्रीन प्रेजेंस चर्चा का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। सोशल मीडिया पर किसी फिल्म के रिलीज होने से पहले ही उसके हीरो-हीरोइन के लुक वायरल होने लगते हैं।

फिल्मों में हीरो और हीरोइन कई अलग लुक्स में दिखते हैं। फिर उनका वो स्टाइल फैशन बन जाता है। अब एक्टर्स अपने काम के साथ-साथ अच्छे कपड़े से लोगों को प्रभावित करते हैं। मगर पहले ऐसा नहीं था।

हिंदी सिनेमा का एक ऐसा दौर भी था, जब स्टारडम चमकदार कपड़ों या फैशन से नहीं, बल्कि दमदार अभिनय से तय होता था। उस समय कलाकार अपने किरदारों में ऐसे ढल जाते थे कि दर्शक उनके चेहरे या कपड़ों से ज्यादा उनकी अदाकारी को याद रखते थे।

जब अभिनय ही असली पहचान था

50 से 80 के दशक तक हिंदी फिल्मों में कलाकारों का फोकस किरदार की गहराई पर होता था। साधारण शर्ट-पैंट, धोती-कुर्ता या आम आदमी जैसा लुक होने के बावजूद ये कलाकार पर्दे पर छा जाते थे। उनकी आंखों की भाषा, संवाद बोलने का अंदाज और भावनाओं को दिखाने की क्षमता ही उन्हें स्टार बनाती थी।

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दिलीप कुमार: ट्रेजेडी किंग की सादगी

दिलीप कुमार को हिंदी सिनेमा का ट्रेजेडी किंग कहा जाता है। उन्होंने अपने करियर में कई फिल्मों में बेहद साधारण किरदार निभाए। ‘देवदास’, ‘गंगा जमुना’ और ‘नया दौर’ जैसी फिल्मों में उनका पहनावा बेहद सामान्य था, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस इतनी प्रभावशाली रही कि दर्शक किरदार के दर्द को महसूस करने लगे। यही वजह थी कि उन्हें अभिनय का विश्वविद्यालय कहा जाने लगा।

बलराज साहनी: रियलिस्टिक एक्टिंग का चेहरा

बलराज साहनी उन कलाकारों में शामिल थे जिन्होंने अभिनय को पूरी तरह वास्तविकता से जोड़ा। फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ में उनका साधारण किसान वाला लुक आज भी याद किया जाता है। बिना किसी ग्लैमर के उन्होंने ऐसा अभिनय किया कि दर्शकों को लगा जैसे पर्दे पर सचमुच एक संघर्ष करता किसान मौजूद हो।

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संजीव कुमार: हर किरदार में जान डालने वाले अभिनेता

संजीव कुमार ने कभी अपने लुक्स को स्टारडम का आधार नहीं बनाया। वे हर उम्र और हर तरह के किरदार में फिट हो जाते थे। ‘आंधी’, ‘कोशिश’ और ‘शोले’ में ठाकुर का उनका किरदार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। साधारण कपड़े और गंभीर व्यक्तित्व के बावजूद उनकी स्क्रीन प्रेजेंस बेहद मजबूत थी।

नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी: एक्टिंग स्कूल कहे जाने वाले सितारे

नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी ने समानांतर सिनेमा को नई पहचान दी। ये वो कलाकार थे जिन्होंने साबित किया कि हीरो बनने के लिए परफेक्ट लुक जरूरी नहीं है। ‘अर्ध सत्य’, ‘स्पर्श’ और ‘जाने भी दो यारों’ जैसी फिल्मों में उनके किरदार आम आदमी जैसे दिखते थे, लेकिन अभिनय इतना दमदार होता था कि दर्शक उनसे जुड़ जाते थे।

अमिताभ बच्चन: एंग्री यंग मैन की सादगी

अमिताभ बच्चन का शुरुआती दौर भी इसी सोच का उदाहरण था। ‘दीवार’, ‘जंजीर’ और ‘काला पत्थर’ जैसी फिल्मों में उनका लुक बेहद सिंपल था। कई फिल्मों में वे साधारण शर्ट और पैंट में नजर आए, लेकिन उनकी आवाज, डायलॉग डिलीवरी और गुस्से से भरा अंदाज उन्हें बाकी सितारों से अलग बना देता था।

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राज कपूर और गुरु दत्त: भावनाओं से बना जादू

राज कपूर और गुरु दत्त ने भी सादगी को अपनी फिल्मों की ताकत बनाया। राज कपूर का आम आदमी वाला इमेज और गुरु दत्त की भावुक अदायगी दर्शकों के दिल में बस गई। इन कलाकारों ने यह दिखाया कि असली स्टार वही है जो किरदार को जीवंत बना दे।

उस दौर की फिल्मों में क्यों दिखती थी अलग सच्चाई?

पुराने दौर के सिनेमा में कहानी और अभिनय सबसे मजबूत पक्ष माने जाते थे। कैमरा कलाकार के चेहरे के भावों पर टिकता था, न कि केवल उनके स्टाइल पर। यही वजह थी कि उस समय के अभिनेता अपने अभिनय के दम पर दशकों तक लोगों के दिलों में बने रहे।

आज भले ही फिल्मों में तकनीक, फैशन और बड़े सेट्स का दौर हो, लेकिन हिंदी सिनेमा के पुराने कलाकारों ने यह साबित किया था कि स्टारडम की असली नींव अभिनय होती है। सादे कपड़ों में भी ये सितारे दर्शकों के दिलों पर राज करते थे और उनकी यही सादगी उन्हें आज भी खास बनाती है।