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जब रितिक के दादाजी ने फिल्मों का प्रस्ताव ठुकराया

यति के खेल निराले होते हैं। शैलेंद्र को ना चाहते हुए भी सिनेमा में गीत लिखना पड़ा और उन्हीं राज कपूर की ‘बरसात’ में उन्होंने गीत लिखे, जिन्हें वह उनकी फिल्म ‘आग’ के लिए अपनी कविता ‘जलता पंजाब’ देने से इनकार कर चुके थे।

संगीतकार रोशनलाल नागरथ

आज संगीतकार रोशन होते तो उनका सौवां जन्मदिन होता। लगभग दो दशकों तक दिल की बीमारी से लड़ने वाले रोशन के संगीत को मिठास के कारण ही अनिल बिस्वास ने ‘शहद का छत्ता’ कहा था। जब संगीत में मधुरता की बात चलती है तो रोशन कई संगीतकारों से आगे नजर आते हैं। ‘कव्वाली का बादशाह’ कहे जाने वाले रोशन की कव्वाली तक में मधुरता महसूस की जा सकती है। ‘खुशी खुशी कर दो विदा…’ (अनोखी रात) जैसा विदाई गीत हो, ‘न तो कारवां की तलाश है…’ (बरसात की रात) जैसी कव्वाली हो, ‘ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी…’(नौबहार) जैसा भजन हो या ‘लागा चुनरी में दाग …’ (दिल ही तो है) जैसी पक्की चीज, रोशन ने अपने हर गाने में मधुरता उड़ेली है।
यति के खेल निराले होते हैं। शैलेंद्र को ना चाहते हुए भी सिनेमा में गीत लिखना पड़ा और उन्हीं राज कपूर की ‘बरसात’ में उन्होंने गीत लिखे, जिन्हें वह उनकी फिल्म ‘आग’ के लिए अपनी कविता ‘जलता पंजाब’ देने से इनकार कर चुके थे। आर्थिक संकटों के कारण शैलेंद्र को राज कपूर के पास 500 रुपए उधार मांगने के लिए जाना पड़ा था। कुछ ऐसा ही संगीतकार रोशनलाल नागरथ (राकेश-राजेश रोशन के पिता और रितिक रोशन के दादा) के साथ हुआ था।  दस साल की उम्र से संगीत की ओर झुकाव के कारण गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) में पैदा हुए रोशन ने लखनऊ के मॉरिस कॉलेज में प्रोफेसर पंडित एसएन रतनजनकर से संगीत सीखा। फिर भी संगीत की प्यास नहीं बुझी तो मैहर जाकर मशहूर सरोदवादक उस्ताद अलाउद्दीन खान से संगीत सीखने लगे। दो महीने सीखने के बाद एक दिन उस्ताद ने पूछा, ‘मेरे सिखाने के अलावा कितने घंटे रियाज करते हो।’ रोशन बोले,‘दो घंटे सुबह, दो घंटे शाम।’ उस्ताद उखड़ गए,‘अगर आठ घंटे रियाज कर सकते हो तो यहां रुको वरना बोरियाबिस्तर बांध लो।’

उस्ताद के गुस्से को देख कर भावुक रोशन की आंखें भर आई तो खान साहब ने कहा, ‘रोने से काम नहीं चलेगा। एक काम करो। जब मैं रियाज करने बैठूं तो मेरे सामने बैठ जाया करो। कान में कुछ जाएगा, तो मेरा भी फर्ज निभ जाएगा।’ इस तरह एक साल तक रोशन रात दस बजे से सुबह के चार बजे तक उस्ताद के सामने बैठते थे और उस्ताद आनंद राग का रियाज करते थे।
समय के साथ रोशन आल इंडिया रेडियो में कार्यक्रम निर्माता ख्वाजा खुर्शीद अनवर के सहायक के रूप में काम करने लगे थे। एक बार लखनऊ आए मशहूर निर्माता निर्देशक केदार शर्मा ने रेडियो पर संगीत का एक कार्यक्रम सुना तो पूछा कि यह कौन बजा रहा है। पता चला कि एक लड़का है जो जलतरंग बजा रहा है। शर्मा ने किसी तरह रोशन को ढूंढ़ ही लिया और मिलते ही उन्हें अपनी अगली फिल्म में संगीत देने का प्रस्ताव दिया। मगर रोशन ने विनम्रता से इनकार कर दिया कि उन्हें फिल्मों का संगीत देने में दिलचस्पी नहीं है वह शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं। यह 1945 के आसपास की बात है।

तीन साल बाद 1948 में रोशन मुंबई आ गए। इससे पहले उन्होंने अपनी सहकर्मी इरा मोइत्रा नामक एक बांग्लाभाषी लड़की से शादी कर ली। इरा ने ही रोशन को मुंबई आने के लिए तैयार किया। मुंबई में शुरू हुआ संघर्ष। रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था, तो हुस्नलाल-भगतराम के गैरेज में कुछ दिन बिताए। बढ़ती जरूरतों ने रोशन को उन्हीं केदार शर्मा के पास पहुंचा दिया, जिनके प्रस्ताव को उन्होंने ठुकरा दिया था। शर्मा ने ‘नेकी और बदी’ (1949) में रोशन को संगीतकार बना दिया, मगर फिल्म बुरी तरह विफल रही। रोशन इतने निराश हुए कि जान देने की बात करने लगे, तो केदार शर्मा ने उन्हें ढांढस बंधाया।

अगले साल जब केदार शर्मा ने दो फिल्में एक साथ शुरू कीं तो अपने नियमित संगीतकार स्नेहल भाटकर से कहा कि वह कुछ दिन छुट्टी पर चले जाएं, जिससे एक फिल्म रोशन को मिल जाए क्योंकि उन्हें काम की जरूरत है। मुबारक बेगम से ‘कभी तनहाइयों में हमारी याद आएगी…’ जैसा गाना गवाने वाले भाटकर ने कहा कि ठीक है एक फिल्म रोशन को दे दो। मगर फिल्म के वितरक इसके खिलाफ थे क्योंकि रोशन की पहली फिल्म विफल हुई थी। फिर भी केदार शर्मा ने रोशन पर भरोसा जताया और उन्हें ‘बावरे नैन’ (1950) का संगीतकार बना दिया, जिसके संगीत ने धूम मचा दी। ‘खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते…’, ‘तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं…’ और ‘सुन बैरी बलम सच बोल रे…’ गानों ने धूम मचा दी और फिर रोशन ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

 

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