जब ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीन हुआ सिनेमा, लाइट्स के कारण जल जाता था वहीदा रहमान का चेहरा; खुद सुनाया था अनुभव

रंगीन सिनेमा को शूट करने में जिन लाइट्स का इस्तेमाल किया जाता था उनकी चमक इतनी होती कि चमड़ी जल जाती थी। कलर सिनेमा का अपना अनुभव अभिनेत्री वहीदा रहमान ने एक बार सुनाया था।

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'चौदहवीं का चांद' वहीदा रहमान की पहली कलर फिल्म थी (Photo-YouTube)

भारत में ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा का दौर उस वक्त खत्म होने लगा जब 1937 में मोती बी गिदवानी ने ‘किसान कन्या’ का निर्माण किया। यह पहली हिंदी कलर फिल्म थी। लोगों को ब्लैक एंड व्हाइट की जगह रंगीन सिनेमा पसंद तो आया लेकिन फिल्म में काम करने वाले कलाकारों की मुश्किलें बढ़ गईं। रंगीन सिनेमा को शूट करने में जिन लाइट्स का इस्तेमाल किया जाता था उनकी चमक इतनी होती कि चमड़ी जल जाती थी। कलर सिनेमा का अपना अनुभव अभिनेत्री वहीदा रहमान ने सुनाया था।

अभिनेत्री ने The Kapil Sharma Show पर बताया था कि जब सिनेमा रंगीन हुआ तो वो बहुत परेशान हो गईं थीं। वहीदा रहमान का कहना था, ‘मुझे ठीक नहीं लगा क्योंकि उस वक्त बहुत ज्यादा लाइट्स इस्तेमाल होती थीं। उनकी फिल्म का इमल्शन कुछ ज्यादा था या कम था….कुछ ऐसी ही तकनीकी वजहें रही होंगी।’

उन्होंने आगे बताया था, ‘मुंह सारा जल जाता था। हम बर्फ की बाल्टी में एक खास तरह का लेदर डालकर रखते थे फिर हर टेक से पहले उसे मुंह पर लगाते रहते थे। मैं कहती थी- कहां फंस गए हम। इतनी ज्यादा गर्मी होती थी। और उस वक्त एसी तो था नहीं, बुरा हाल होता था। मैं तो कहती थी, कलर में शुरू कर दी पिक्चर.. मर गए।’

आशा पारेख ने भी उसी दौरान अपना अनुभव बताया था। ‘हम हिंदुस्तानी’ आशा पारेख की पहली कलर फिल्म थी जिसके बारे में उन्होंने बताया था, ‘इतने बड़े बड़े लाइट्स आते थे और मुझे याद है…मुझे ऐसे खड़े रहना था और लाइट्स सीधे कंधे पर आती थीं। शाम को देखा तो पूरा कंधा जल गया था। रिफ्लेक्टर्स इतने लगते थे कि मेरी आंखें लाल हो जाती थी और लोग कहते थे कि तुम्हारी आंखें लाल कैसे होती है? शराब पीती हो क्या?’

वहीदा रहमान ने कलर सिनेमा को लेकर ही एक और किस्सा अनुष्का शर्मा को एनडीटीवी के लिए दिए एक इंटरव्यू में बताया था। उन्होंने बताया था कि गुरुदत्त के साथ उनकी पहली कलर फिल्म, ‘चौदहवीं की चांद’ पर सेंसर बोर्ड की कैंची चल गई थी। एक सीन को लेकर सेंसर ने आपत्ति जताई और कहा था कि वहीदा रहमान इसमें कामुक लग रहीं हैं।

वहीदा ने बताया था, ‘उन दिनों कलर फिल्में बननी शुरू हुई थी। गुरुदत्त जी ने सोचा मैं इसके (चौदहवीं का चांद’) टाइटल सॉन्ग को कलर में शूट करके लगाऊंगा तो फिल्म ज्यादा चलेगी। फिर सेंसर वालों ने कहा कि ये सीन काट दीजिए। उस सीन में मैं लेटी थी जिसके बाद गुरुदत्त जी आकर मेरे कंधे पर हाथ रखते हैं। हमने पूछा कि क्या खराबी है सीन में? तो कहते हैं कि वहीदा रहमान की आंखें बहुत लाल हैं, ये कामुक लग रहा है।’

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