रविवार, 12 अप्रैल को दिग्गज गायिका आशा भोसले का निधन हो गया। इसके साथ ही एक ऐसे युग का अंत हो गया जिसने दशकों तक भारतीय सिनेमा के संगीत को एक नई दिशा दी। उन्होंने अलग-अलग भाषाओं और फिल्म इंडस्ट्री में जो योगदान दिया, वह बेमिसाल है। 1940 के दशक से ही उन्होंने समय के साथ अपने गाने के अंदाज को बदला और हर पीढ़ी के दिलों में जगह बनाई।
उनका कहना था कि खुद को लगातार बदलते रहना ही उनके लंबे करियर का सबसे बड़ा राज था, जो 80 साल से भी ज्यादा चला। एक बार उन्होंने खुद बताया था कि आखिर क्यों उन्हें अपने गाने की शैली को बदलना पड़ा।
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आशा भोसले ने बताई थी वजह
अपने बचपन को याद करते हुए आशा भोसले ने एक बार कहा था, “बचपन में हम बहनों की आवाज एक जैसी पतली थी।” उन्होंने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा, “कुछ गाने गाने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मुझे अपने गाने का अंदाज बदलना पड़ेगा, क्योंकि दीदी तो पहले से ही मौजूद थीं और उनका गाना शानदार था। मैं उनके साथ मुकाबले में नहीं आना चाहती थी।”
आशा ने आगे बताया, “मुझे इंग्लिश फिल्में देखने और इंग्लिश गाने सुनने की आदत थी। वे बहुत ही ओपेरा-अंदाज में गाते हैं। लेकिन, जब हम यहां भारत में गाते हैं, तो हमारी आवाज में कोई कंपन नहीं होता। भारतीय गाने सीधे-सीधे गाए जाते हैं। मैं हर तरह के गाने गाना चाहती थी। इसलिए, मैं वेस्टर्न गायन शैली को भारत ले आई। फिर मैंने उसी हिसाब से खुद को तैयार किया।”
इस प्रयोग करने की इच्छा ने ही उन्हें समय के साथ नई पीढ़ी से जोड़कर रखा। आशा भोसले ने कहा था, “युवा लड़कों को मेरे गाने बहुत पसंद आते थे। जब वे बड़े हो जाते हैं, तो उन्हें शास्त्रीय अंदाज का गायन ज्यादा पसंद आता है। इसलिए मैं हमेशा आने वाली पीढ़ियों के साथ खुद को ढालती रही हूं। जैसे आज मैं ‘काला चश्मा’ जैसे गानों पर गाती और थिरकती हूं। अब नई पीढ़ी का स्टाइल फिर से बदल रहा है।”
जब स्टूडियो छोड़कर चले गए थे मजरूह सुल्तानपुरी
आशा भोसले ने अपनी बहन लता मंगेशकर के साथ काम करने की चुनौतियों और उन्हें अक्सर मिलने वाले गानों की प्रकृति के बारे में भी खुलकर बात की। रिपब्लिक भारत के साथ बातचीत में आर डी बर्मन के साथ अपने सहयोग के बारे में बताते हुए, उन्होंने खुलासा किया कि उन्होंने बर्मन से इस बारे में बात की थी कि वह अक्सर उन्हें बोल्ड गाने क्यों देते थे, जबकि ज्यादा पारंपरिक धुनें लता को मिलती थीं।
1971 की फ़िल्म ‘कारवां’ के मशहूर गाने “पिया तू अब तो आजा” को याद करते हुए, उन्होंने बताया कि गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी अपने ही लिखे शब्दों से असहज महसूस करते हुए बीच में ही स्टूडियो छोड़कर चले गए थे। उन्होंने याद करते हुए कहा, “मजरूह सुल्तानपुरी स्टूडियो छोड़कर चले गए और मुझसे कहा कि बेटी, मैंने गंदा गाना लिखा है। मेरी बेटियां बड़ी होंगी और यह गाना गाएंगी।” लेकिन आशा ने कहा कि उन्होंने रिकॉर्डिंग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता निभाई। गायिका ने कहा, “मुझे पता था कि गाने का संगीत अच्छा है, लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि यह गाना इतनी बड़ी हिट साबित होगा।”
